A Dark Secret – Chapter 286
"मेरा बेटा आज मेरे सामने बैठा है," देवा भाई ने कहा।
उस कमरे में ऐसी आवाज़ हुई जैसे किसी ने एक साथ सौ काग़ज़ फाड़ दिए हों। ड्राइवर एक-दूसरे की तरफ़ देखने लगे। रुक्मा दीदी ने अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा — इस बार उनका हाथ काँप रहा था। नैना ने अपना कलम नीचे रख दिया और कैमरे की तरफ़ हाथ बढ़ाया, पर मजिस्ट्रेट ने सिर हिलाकर मना कर दिया। नैना ने हाथ पीछे खींच लिया।
मैंने कबीर को देखा।
वो हिला नहीं। वो उठा नहीं। वो कुछ बोला नहीं। उसने बस अपनी गोद में रखी बही को और कसकर पकड़ लिया, इतना कसकर कि उसकी उँगलियों की गाँठें सफ़ेद पड़ गईं। और उसकी आँखें — उसकी आँखें एक पल के लिए भर आईं, फिर उसने पलक झपकाकर उन्हें सुखा दिया।
मेरे हाथ से मेरी कॉपी फिसल गई। मैंने उसे पकड़ा, पर पन्ने खुल गए। और उन पन्नों पर, सातवें घर के नीचे, जहाँ मैंने घड़ी और तारीख़ लिखी थी, अचानक वो सब बहुत छोटा लगने लगा।
क्योंकि मैं जिस आदमी के साथ चार महीने से ट्रक के नीचे सो रहा था, जिसके साथ मैंने पंचर की दुकान पर रात काटी थी, जिसने मुझे बीस हज़ार का उधार दिया था, जिसने अपनी अम्मा को मेरे सामने बिठाया था — वो अचानक मेरे सामने नहीं, दूसरी बेंच पर बैठा था।
और मुझे याद आया — वो वाला दिन। काँच की इमारत के नीचे, कबीर का फ़ोन बजा था और स्क्रीन पर "माँ" की जगह कोई और नाम था। "शांति"। मैंने उस वक़्त सोचा था कि कोई पुराना नाम है। अब समझ आ रहा था कि वो पुराना नाम नहीं था — वो पूरा नाम था। शांति देवी। और शांति देवी कोई और नहीं, देवेंद्र ठाकुर की पहली पत्नी थी।
मेरे होंठ अपने आप खुल गए। मैंने कुछ कहना चाहा, पर आवाज़ नहीं निकली।
नैना ने मेरी तरफ़ देखा। उसने मेरे चेहरे पर सब पढ़ लिया। उसने बहुत धीरे से कहा — "तुम ठीक हो?" और मैंने सिर हिलाया, जो ठीक नहीं था।
"आपका बेटा?" मजिस्ट्रेट ने पूछा। "नाम क्या है?"
देवा भाई ने कबीर की तरफ़ देखा। कबीर ने उनकी तरफ़ देखा। और उस कमरे में दो आँखों की एक लंबी चुप्पी बह गई।
"साहब," देवा भाई ने धीरे से कहा, "मैंने उसे दुनिया से छिपाकर रखा था। ग्यारह साल पहले मैंने उसका नाम बदला, उसका शहर बदला, उसका स्कूल बदला। मैंने उसे अपने दुश्मनों से दूर रखा। मैंने उसे अपना बेटा नहीं कहा। मैंने उसे अपना बेटा नहीं बनने दिया। क्योंकि उस दिन, अगर राठौर को पता चलता कि देवेंद्र ठाकुर का कोई बेटा है, तो वो मेरे पास आता, मेरी मेज़ पर बैठता, मेरे बेटे के स्कूल की फीस पूछता। और फिर बाहर जाते वक़्त, बहुत धीरे से, बहुत मुश्किल से, ये कहता — भाई साहब, आपके बेटे की गाड़ी का पिछला पहिया ठीक नहीं लगता।"
अदालत में सन्नाटा था। और उस सन्नाटे में मैंने अपने पीछे एक औरत के रोने की आवाज़ सुनी। मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा, पर मुझे लगा कि वो कोई ड्राइवर की बीवी है, जिसका आदमी सताईस को गया था और लौटा नहीं।
"तो आपने उसे छिपाया," मजिस्ट्रेट ने कहा।
"जी साहब।"
"और आज आपने उसे पहचान लिया?"
देवा भाई ने कबीर की तरफ़ देखा।
"साहब," उन्होंने कहा, "आज मैंने उसे पहली बार अपने सामने बैठे देखा है। ग्यारह साल में पहली बार, वो मुझसे बीस क़दम की दूरी पर है। पहले भी वो मेरे शहर में ही रहता था, साहब, और मैं जानता था। पर मैं जानबूझकर उसके पास नहीं जाता था। मैं हर महीने उसकी दुकान की तरफ़ से गुज़रता था, गाड़ी की खिड़की खुली रखता था, और सुनता था — कैलकुलेटर के बटनों की आवाज़। टक, टक, टक। और मैं अंदर नहीं जाता था। क्योंकि अगर मैं अंदर गया, तो वो मुझे देख लेगा, और फिर उसकी ज़िंदगी में वही सब लौट आएगा जिससे मैंने उसे बचाया था।"
कबीर ने अपना सिर झुका लिया। उसके कंधे हिल रहे थे। एक बार। दो बार। फिर रुक गए।
"आपने उसे छिपाया," मजिस्ट्रेट ने कहा, "लेकिन उसको आपका हिसाब रखने के लिए मेरे मुवक्किल — माफ़ कीजिए, मेरे सामने वाले आदमी के पास भेजा?"
देवा भाई ने सिर हिलाया। "जी साहब। उसे मैंने ही अर्जुन के पास बैठाया था। अर्जुन के गैराज के पास उसकी पंचर की दुकान थी — मैंने ही करवाई थी। मैं चाहता था कि कोई मेरे बेटे को देखे, कोई उसकी परवाह करे। और मैं नहीं चाहता था कि वो मेरे किसी काम में पड़े।"
"तो आपने उसे जासूस की तरह भेजा?"
"साहब, जासूस नहीं।"
"तो क्या?"
देवा भाई रुके। उन्होंने कबीर की तरफ़ देखा। फिर उन्होंने बहुत धीरे से, इतना धीरे कि अदालत को सुनने के लिए झुकना पड़ा, कहा —
"साहब, मैंने उसे इसलिए भेजा, क्योंकि मैं चाहता था कि मेरे बेटे के पास कोई ऐसा आदमी हो जो उससे ज़्यादा मेरी परवाह करे। और साहब, ये बात मैंने आज तक अपने आप से भी नहीं कही थी।"
और उस कमरे में, सौ ड्राइवर, तीन पंखे, चार चपरासी, एक मजिस्ट्रेट, एक सफ़ेद शर्ट वाला साफ़-सुथरा आदमी, और मैं — हम सब एक साथ चुप हो गए।
मैंने कबीर की तरफ़ देखा।
कबीर ने अपनी आँखें उठाईं।
और उसने मेरी तरफ़ देखा। मेरी आँखों में। सीधे।
और उसकी आँखों में जो था, वो माफ़ी नहीं थी। वो डर भी नहीं था। वो कुछ और था। वो एक आदमी का चेहरा था, जिसने ग्यारह साल एक नाम के साथ जिया, और आज पहली बार उस नाम को उसके पीछे खड़ा देख रहा था।
मैंने बस इतना कहा — "कबीर।"
वो नहीं बोला।
और मेरे हाथ में जो पीतल की छोटी चाबी थी, वो मुझे अपनी हथेली में पहले से ज़्यादा भारी लगने लगी। क्योंकि अब मुझे पता था — उस चाबी से सिर्फ़ अलमारी नहीं खुलेगी।
उस चाबी से एक बेटे का नाम भी खुलेगा।
मजिस्ट्रेट ने अपनी छोटी घंटी उठाई। एक बार बजाई।
"अदालत सुनवाई कल सुबह नौ बजे तक के लिए स्थगित करती है," उन्होंने कहा। "ठाकुर साहब, आपको हिरासत में लिया जाता है। मंसूर अली की गिरफ़्तारी के आदेश जारी किए जा चुके हैं। और कल सुबह, अलमारी खुलेगी।"
देवा भाई ने अपना सिर हिलाया। वो एक पल के लिए कबीर की तरफ़ देखते रहे, फिर चपरासी उन्हें लेकर चला गया।
मैं बेंच पर बैठा रहा।
मेरे बगल में रुक्मा दीदी ने धीरे से कहा — "अर्जुन, तेरे हाथ में क्या है?"
मैंने हाथ खोला। चाबी। छोटी, पीतली, घिसी हुई।
"दीदी," मैंने कहा, "ये सिर्फ़ अलमारी की चाबी नहीं है।"
"तो क्या है?"
मैंने कबीर की तरफ़ देखा। वो अब भी वहीं बैठा था।
मैंने बहुत धीरे से कहा — "ये एक दरवाज़े की चाबी है, दीदी। और वो दरवाज़ा किसी अलमारी का नहीं। वो किसी भाई का है।"
और मैंने अपनी कलाई पर हाथ रखा। घड़ी अब भी पाँच मिनट आगे थी।
पापा, आज आपके भाई ने सच बोला। और आज मेरे सामने एक बेटा बैठा था, जो अपने पापा को नहीं पहचानता था — और उसका नाम मेरे पास था, मेरी जेब में, मेरी रिकॉर्डिंग में, और मेरे दोस्त के चेहरे पर।
कबीर ने उठते वक़्त मेरी तरफ़ नहीं देखा। उसने अपनी बही सीने से लगाई रखी थी और गली की तरफ़ चला गया।
मैंने पीछे सफ़ेद शर्ट वाले साफ़-सुथरे आदमी को देखा। वो अपना काला बैग बंद कर रहा था। उसने लिफ़ाफ़ा वापस बैग में रखा और अपनी घड़ी देखी।
उसकी घड़ी सही चल रही थी।
और मेरी घड़ी — जो पापा की थी — अब भी पाँच मिनट आगे थी, जैसे वो कह रही हो कि अर्जुन, तू ज़िंदगी में पाँच मिनट पहले ही पहुँच जाता है।
पर आज, पहली बार, मुझे लगा कि मैं पाँच मिनट पीछे रह गया हूँ। क्योंकि मुझे ये बात बहुत पहले पता होनी चाहिए थी।
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