A Dark Secret – Chapter 285
पीछे, चौथी बेंच की तरफ़, सफ़ेद शर्ट वाले तीन आदमी एक साथ हिले। एक ने दूसरे की तरफ़ देखा। दूसरे ने घुटने पर रखी फाइल दबाई। तीसरे ने जेब से फ़ोन निकाला, फिर वापस रख दिया, जैसे अदालत के अंदर निकालना भूल गया हो। और उसी बेंच पर बैठे साफ़-सुथरे आदमी ने सिर्फ़ काग़ज़ की तरफ़ देखना जारी रखा, पर उसकी उँगली, जो लिफ़ाफ़े पर टपटपा रही थी, एक पल के लिए रुक गई।
एक ड्राइवर ने धीरे से कहा — "कौन?"
और दूसरे ने वापस कहा — "पता नहीं। पर इस नाम के साथ देवा भाई का हाथ काँप रहा है।"
एक तीसरी आवाज़ ने कहा, "राठौर लॉजिस्टिक्स। काँच की इमारत वाला।"
और चौथी आवाज़ ने, देवा भाई के अपने एक ड्राइवर की, बस इतना कहा — "बाप रे। तो हम ग्यारह साल से उस काँच के दफ़्तर के पीछे सिर्फ़ पीली गाड़ियाँ ढो रहे थे?"
मजिस्ट्रेट ने मेज़ पर हाथ रखा। "कृपया।"
खुसफुसाहट एक झटके में मर गई।
"विक्रम राठौर कौन है?" मजिस्ट्रेट ने पूछा। "हमें साफ़ बताइए।"
देवा भाई ने कहा, "साहब, मैं शहर का सबसे बड़ा आदमी नहीं हूँ। लोग समझते हैं मैं हूँ, क्योंकि मेरी गाड़ियाँ हर नाके पर दिखती हैं। मेरा आदमी हर ढाबे पर चाय पीता है। मेरे नाम की मोहर हर काग़ज़ पर लगती है। पर साहब, जो मोहर हर काग़ज़ पर लगती है, वो मोहर नहीं होती — वो ढाल होती है। असली नाम कभी काग़ज़ पर नहीं आता।"
"तो वो क्या करता है?"
"राठौर लॉजिस्टिक्स, साहब। सबसे बड़ी ट्रांसपोर्ट कंपनी। साफ़-सुथरा दफ़्तर, काँच की इमारत, अंग्रेज़ी में बात करने वाले लोग, हर मंच पर भाषण — हमें सड़कों को सुरक्षित बनाना है। और उसी इमारत के पीछे, साल में दो बार, अनाज की खेप और दवा की खेप ग़ायब होती है। कभी पूरी, कभी आधी, कभी बीच रास्ते में गाड़ी जल जाती है। और फिर उसी खेप का काग़ज़ बीमा दफ़्तर जाता है और उस पर लिखा होता है — रास्ते का नुक़सान।"
"रास्ते का नुक़सान," मजिस्ट्रेट ने दोहराया।
"जी साहब। जो खेप चोरी हुई, वो हमसे चोरी नहीं हुई। वो उसी ने उतरवाई थी। और जो बीमा का पैसा आया, वो उसी की जेब में गया। हम सिर्फ़ गाड़ी, ड्राइवर और हादसे का काग़ज़ देते थे। मंसूर उसका हाथ था। मैं उसका दूसरा हाथ। और ऊपर से — मैं उसका छोटा हाथ भी नहीं था।"
मैंने रुक्मा दीदी की तरफ़ देखा। वो मेरे बगल वाली बेंच पर बैठी थीं। उनके हाथ में भोला का कटा पहिया था, जिसे उन्होंने काग़ज़ की तरह सीने से लगाया हुआ था। देवा भाई का नाम सुनकर उनका चेहरा वैसा ही रहा था, जैसे पत्थर पर लिखा हुआ हो। पर जब "राठौर लॉजिस्टिक्स" बोला गया, तब उन्होंने अपनी पलक झपकाई। और मैंने देखा — उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और बहुत धीरे से सिर हिलाया।
एक ही सिर हिलाना। पर उसका मतलब साफ़ था — ये वही नाम है।
"आपके पास इसके सबूत हैं?" मजिस्ट्रेट ने पूछा।
"साहब, मैंने ग्यारह साल सबूत की तरह जिए हूँ," देवा भाई ने कहा। "मेरे पास उसके ख़िलाफ़ कुछ काग़ज़ हैं। बहुत ज़्यादा नहीं। पर इतने हैं कि अगर मैं मर जाऊँ, तो वो अकेला नहीं मरेगा। मैंने वो काग़ज़ अपनी जान की गारंटी की तरह संभालकर रखे हैं। मेरे दफ़्तर के गोदाम के पीछे वाले कमरे में, एक हरी लोहे की अलमारी है।"
"वो अलमारी तो अभी हमारे पास है," मजिस्ट्रेट ने कहा। "कल सुबह खुलेगी। उसका बाहरी ताला तो साधारण है, हमने देखा है।"
"बाहरी ताला साहब," देवा भाई ने कहा, "सिर्फ़ यही दिखाने के लिए है कि ये अलमारी आम अलमारी है। अंदर एक और ताला है। लकड़ी की पट्टी के पीछे। दूसरी परत। वो ताला सबसे अलग है। पर वो भी अब खुल जाएगा।"
"किस चाबी से?"
देवा भाई ने पहली बार अपनी दाहिनी तरफ़ देखा। उनकी नज़र उस मेज़ पर गई जहाँ पीतल की छोटी चाबी रखी थी, जिसे मैंने सुबह अदालत में जमा किया था।
"उसी से, साहब," उन्होंने कहा। "वो चाबी मंसूर अली की थी। वो हर वक़्त अपने पास रखता था। बारह साल से। वो चाबी कभी किसी को नहीं दी, पर कल भीड़ में वो अपना रुमाल गिरा बैठा। और चाबी रुमाल से बाहर आ गई। अगर वो कल नहीं गिरती, तो साहब, कल सुबह मैं आपसे यही कहने आता कि अलमारी का दूसरा ताला मेरे पास है, पर चाबी मंसूर के पास है। पर अब सवाल ही नहीं है।"
मजिस्ट्रेट ने अपनी फाइल में कुछ लिखा। तिवारी मेज़ के दूसरी तरफ़ खड़े सीधे मुँह देखे जा रहे थे। उनकी उँगली अब अपनी फाइल के नीचे नहीं थी।
"ठाकुर साहब," मजिस्ट्रेट ने धीरे से कहा। "आपने इतने साल चुप क्यों रहा? आपके पास काग़ज़ थे, आपके पास आदमी थे, आपके पास पैसा था — फिर भी आप बोले नहीं?"
देवा भाई ने एक लंबी साँस ली। और इस बार उस साँस में वो सब था जो ग्यारह साल में किसी ने नहीं सुना था।
"साहब," उन्होंने कहा, "डरता था।"
बस इतना कहकर वो रुक गए। उन्होंने अपना मुँह पोंछा, फिर उँगलियों को एक-दूसरे में फँसाया।
"राठौर के पास हर बड़े आदमी का काला काग़ज़ है। हर नेता का, हर अफ़सर का, हर उस आदमी का जिसकी तस्वीर अख़बार में आती है। मेरे पास? मेरे पास एक अलमारी थी, साहब। और उसी में कुछ काग़ज़ थे — चार, पाँच, शायद छह। वो भी सिर्फ़ इस डर से कि कहीं मेरे बाद मेरी अलमारी कोई खोले तो सच बाहर आ जाए। पर मैं उन काग़ज़ों को लेकर कभी बाहर नहीं निकला। क्योंकि मुझे पता था — जिस दिन मैं निकलूँगा, उस दिन बीमा दफ़्तर में एक नई पर्ची छपेगी। और उस पर्ची पर मेरी गाड़ी का नंबर होगा।"
"क्या राठौर ने आपको कभी सीधे धमकाया?"
"साहब, वो कभी धमकाता नहीं। वो जिस आदमी को धमकाना होता है, उसे चाय पर बुलाता है। दो घंटे बैठता है। उसकी बीमार माँ की दवा पूछता है। उसके बेटे के स्कूल की फीस पूछता है। और फिर बाहर जाते वक़्त, दरवाज़े पर, बड़ी मुश्किल से, बहुत धीरे से बोलता है — भाई साहब, आपकी गाड़ी का पिछला पहिया ठीक नहीं लगता। ठीक करा लीजिए। बस इतना। और साहब, उसके बाद आप खुद ही ठीक करा लेते हैं।"
अदालत में कोई नहीं हँसा। ये मज़ाक नहीं था। पर मेरे पीछे एक ड्राइवर ने धीरे से कहा — "मेरे पिछले पहिये की बात उसने मुझसे भी कही थी।" और मैंने सुना कि उसकी आवाज़ में हँसी नहीं, डर था।
"अब मेरी बात सुनिए," मजिस्ट्रेट ने कहा। "आप कह रहे हैं कि आपको डर लगता था। लेकिन आज आप बोल रहे हैं। क्या बदला?"
देवा भाई ने अपना सिर उठाया और पहली बार उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। सीधे。 एक पल। फिर उनकी नज़र मेरे पीछे चली गई — दूसरी बेंच, तीसरी बेंच, चौथी बेंच।
और फिर उनकी नज़र एक चेहरे पर टिक गई।
कबीर।
कबीर उस वक़्त अपनी सिली बही सीने से लगाए बैठा था। उसके हाथ अचानक सख़्त हो गए थे। उसने एक बार पलक झपकाई और फिर सीधा देखता रहा।
देवा भाई ने उसकी तरफ़ देखकर एक लंबी साँस ली। जैसे कोई ग्यारह साल की सड़क पर चलकर अपने घर के दरवाज़े पर पहुँच गया हो और चाबी पहली बार खोलने में झिझक रहा हो।
"साहब," उन्होंने धीरे से कहा, "मेरे पास एक बेटा है।"
मजिस्ट्रेट ने कलम रोक दी।
"कहाँ है वो?"
"यहीं, साहब। इसी कमरे में। इसी बेंच पर। मेरे सामने।"
और उन्होंने अपना हाथ उठाया। यह उँगली नहीं थी जो भीड़ पर घूम रही थी। यह सिर्फ़ एक हाथ था, उठा हुआ, और वो सीधे कबीर की तरफ़ इशारा कर रहा था।
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