A Dark Secret – Chapter 284
"साहब, क्या मैं कुछ एक मिनट कह सकता हूँ?"
"कहिए।"
फिर माहौल सबसे अजीब हुआ। चाचा ने अपनी उँगली उठाई और उँगली देवा की तरफ़ मुड़ गई। कमरे में हर आदमी का सिर उसी तरफ़ मुड़ा।
"मैं ये नाम नहीं लेने आया हूँ," चाचा ने कहा। "मेरे भतीजे ने काग़ज़ लाए हैं। उसके पास हर काग़ज़ है। मेरे पास कुछ नहीं है। पर मैं ये ज़रूर कहूँगा — ये नाम नहीं लेगा।"
"क्यों नहीं लेगा?" मजिस्ट्रेट ने पूछा।
"क्योंकि इसके ऊपर भी कोई बैठा है," चाचा ने कहा। "और वो कोई ऐसा आदमी है जो इससे भी झूठ नहीं बोलता। वो ऊपर बैठा है, साहब। जब मैं सुबह गैराज खोलता था, तब भी वो वहीं बैठा था। जब मैं गुटखा खाता था, वहीं बैठा था। ग्यारह साल में एक बार भी मैंने उसे देखा नहीं, पर वो मुझे हर महीने देखता रहा। मैं उसका नाम नहीं जानता। मैं इतना जानता हूँ कि मंसूर और देवा भाई दोनों उस से डरते हैं।"
चाचा की उँगली देवा की तरफ़ ही टिकी रही। "और आप, देवा भाई । मैं आपके घर खाने पर गया। आपने मुझे बेटा कहकर बुलाया। मैं एक बात कहूँ? जब मैंने पहली बार ये सोचा कि सब कबूल कर दूँ, तब आपने मुझे गैराज दिया। और आज मैंने कबूल किया, तो आपकी उँगली काँप गई। आप भी उसी रस्सी में बँधे हैं जिसमें मैं था। मैं तो रस्सी को ढीला करके बाहर आ गया, पर आप नहीं आ सके। भतीजे का भी कोई क़ुसूर नहीं।"
देवा ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
यही वो पल था। मैंने देखा कि उनके वकील की कलम रुक गई। उनकी मेज़ पर रखा दूसरा फ़ोन एक बार बजा और फिर चुप हो गया। और देवा ने आँखें बंद करके अपना सिर थोड़ा पीछे किया, जैसे कोई अंधेरे कमरे में पहली बार आँख मूँद कर बैठा हो।
मैंने चाचा को देखा। वो बेंच की तरफ़ जा रहे थे। उनकी चप्पल फिर घिसटी और आज मुझे वो आवाज़ सुनाई दी जो ग्यारह साल में कभी नहीं सुनी — बस एक छोटी सी, टूटी हुई साँस।
और मैंने मन में कहा — पापा, अब अगला नाम आपका भाई लिया, पर अगली सुबह अलमारी खुलेगी। और उस अलमारी में जो अंदरूनी ताले वाला दरवाज़ा है, उसके पीछे आपका हिसाब पूरा होगा।
मैंने अपनी कलाई पर हाथ रखा। घड़ी अब भी पाँच मिनट आगे थी।
और पीछे, आख़िरी बेंच पर बैठे साफ़-सुथरे आदमी ने अपनी घड़ी देखी और फिर अपना काला चमड़े का बैग खोला। उसने उसमें से एक पतली सफ़ेद लिफ़ाफ़ा निकाला, उसे अपनी गोद में रखा और अपनी उँगली से उस पर एक बार टपटपाया — ठीक वैसे ही, जैसे देवा की उँगली मेज़ पर टपटपाती थी।
मैंने नैना की तरफ़ देखा। उसने भी वो देखा। उसने अपनी कलम उठाई और अपनी कॉपी के आख़िरी पन्ने पर कुछ लिखा।
मैंने देखा कि वो क्या लिख रही है — "चौथी बेंच, सफ़ेद लिफ़ाफ़ा, वक़्त ठीक, आवाज़ नहीं।"
मजिस्ट्रेट ने अपनी पीतल की छोटी घंटी मेज़ पर रखी और काग़ज़ों की तरफ़ देखा।
"अगला गवाह," उन्होंने कहा, "कल सुबह अलमारी खुलेगी। उससे पहले, आज की सुनवाई में एक बात दर्ज की जाएगी — इस अदालत में एक ऐसा नाम आया है जो काग़ज़ पर नहीं है। मंसूर अली।"
मैंने सामने देखा।
और उस कमरे में, जहाँ तीन पंखे धीरे-धीरे घूम रहे थे और बाहर गाड़ियों के हॉर्न सड़क पर बज रहे थे, एक नाम हवा में लटक गया — जिसे अब कोई भी आदमी आसानी से उतार नहीं सकता था।
॥
"देवेंद्र ठाकुर," मजिस्ट्रेट ने नाम पुकारा। "कटघरे में आइए।"
मैंने अपनी कुर्सी की तरफ़ हाथ रखा और महसूस किया कि उँगलियाँ पसीने में फिसल रही हैं।
देवा भाई उठे। वो उठे तो उस कमरे में पंखों की आवाज़ भी सुनाई देनी बंद हो गई। दो सौ से ज़्यादा ड्राइवर एक साथ साँस लेना भूल गए। किसी ने खाँसा नहीं। किसी की चप्पल नहीं घिसटी। बस चार क़दम की दूरी थी उनकी कुर्सी से कटघरे तक, पर वो चार क़दम उन्होंने ऐसे चले जैसे कोई बूढ़ा आदमी अपने ही घर की सीढ़ियाँ उतर रहा हो।
आज उनका सफ़ेद कुर्ता भी वैसा साफ़ नहीं था। कॉलर पर पसीने की एक पतली लकीर थी और कमर पर कुर्ता पहली बार थोड़ा सिकुड़ा हुआ लटक रहा था। सोने की अंगूठी आज उँगली पर ढीली लग रही थी। चश्मा जेब में था, पर उन्होंने निकाला नहीं।
कटघरे के अंदर जाकर वो खड़े रहे। मजिस्ट्रेट की तरफ़ नहीं देखा। उन्होंने पहले फ़र्श देखा। फिर मेज़ की तरफ़ देखा, जहाँ कालू का लाल प्लायर रखा था। फिर उनकी नज़र सात बीमा पर्चियों पर पड़ी, जो मैंने एक-एक करके सीधी रखी थीं।
"आपका नाम?" मजिस्ट्रेट ने पूछा।
"देवेंद्र ठाकुर।"
"पेशा?"
"ट्रांसपोर्ट।"
तीन शब्द। बस। न "बेटा", न "साहब", न कोई मीठी आवाज़। इतनी सपाट आवाज़ कि लगा जैसे कोई रेडियो पर बोल रहा हो जिसकी बैटरी ख़त्म हो रही है।
मेरे पीछे, दूसरी बेंच पर कोई ड्राइवर धीरे से बोला — "आज आवाज़ बदल गई।" और किसी ने तुरंत उसे चुप करा दिया।
"आपको पता है मंसूर अली कौन है?" मजिस्ट्रेट ने पूछा।
देवा भाई ने एक लंबी साँस ली। इतनी लंबी कि लगा कमरे की हवा भी उनके साथ खींच ली गई।
"पता है," उन्होंने कहा। "वो मेरे लिए काम करता था। ऊपर के काम नहीं करता था। जो काम कोई और नहीं करता, वो करता था। मैं उसे पैसे देता था। हर महीने। और जब कोई बड़ा काम होता, तो उसके ऊपर अलग।"
"कैसा बड़ा काम?"
"साहब, जो हादसे होते हैं ना, वो खुद होते हैं। सड़क पर सब होता है। गाड़ी पलटती है, आदमी मरता है, बीमा का दफ़्तर दावा देता है। पर जब एक ही महीने की सताईस तारीख़ को ग्यारह साल तक हादसा हो, तो साहब, वो हादसा नहीं होता। वो तारीख़ होती है। और तारीख़ किसी ने बनाई थी।"
अदालत में सन्नाटा ऐसा छा गया कि मुझे अपनी ही घड़ी की टिक-टिक सुनाई दी। पाँच मिनट आगे चलने वाली घड़ी। आज भी पाँच मिनट आगे।
"इसका मतलब आप ये कह रहे हैं," मजिस्ट्रेट ने धीरे से कहा, "कि ये हादसे साज़िश थे?"
"जी साहब।"
"आप उसमें शामिल थे?"
देवा भाई ने कोई बहाना नहीं बनाया। उन्होंने बस सिर हिलाया। "मैंने काग़ज़ संभाले, साहब। मैंने मंसूर को पैसे दिए, उसने आदमी ढूँढे, और मैंने हर हादसे को हादसा बनाकर दिखाया।"
"कैसे?"
"तीन चीज़ें थीं, साहब। पहली — हादसे की जगह। दूसरी — हादसे का वक़्त। तीसरी — हादसे का आदमी। अगर ये तीनों मिल जाएँ, तो काग़ज़ पर सच जैसा दिखता है। और काग़ज़ पर जो सच दिखता है, वो सच ही हो जाता है। असली सच किसी को याद नहीं रहता।"
मैंने नैना की तरफ़ देखा। उसकी कलम काग़ज़ पर टिकी हुई थी, हिल नहीं रही थी। वो बस सुन रही थी। और मैंने देखा कि उसके होंठ हिल रहे थे — वो अपने आप से कुछ दोहरा रही थी, ताकि भूल न जाए।
"सताईस सितंबर," मजिस्ट्रेट ने कहा। "ये तारीख़ किसने चुनी?"
देवा भाई ने पहली बार अपनी आँखें उठाईं। उन्होंने सीधा मजिस्ट्रेट की मेज़ की तरफ़ देखा।
"साहब, ये तारीख़ मैंने नहीं चुनी।"
"तो किसने?"
"जिसको आप अभी तक नहीं जानते।"
"नाम लीजिए।"
और यहाँ पहली बार देवा भाई की आवाज़ में वो कंपन आया, जो मैंने उनकी आवाज़ में कभी नहीं सुना था। दो सालों में नहीं। ग्यारह सालों में नहीं। उन्होंने मेज़ पर अपना हाथ रखा, फिर हाथ खींच लिया, जैसे काग़ज़ों को छूने से डर रहे हों।
"विक्रम राठौर," उन्होंने कहा।
नाम हवा में गिरा। और उस कमरे में जो हुआ, वो आवाज़ नहीं थी। वो कुछ और था।
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