A Dark Secret – Chapter 283
मजिस्ट्रेट ने मेरी तरफ़ देखा। "कहिए।"
"मुझे एक सवाल पूछना है," मैंने कहा। मेरी आवाज़ सुनने में स्थिर थी, पर मेरे होंठ सूखे थे। "एक ही सवाल।"
"पूछिए।"
मैंने चाचा की तरफ़ देखा।
"उस रात मंसूर ने केबल काटी। आप लाइन बदलकर भाग गए। ठीक है। पर बाद में? दूसरे दिन? उसके बाद?" मैंने उनके चटके चश्मे से आगे उनकी आँखों में देखा। "जब आपको पता चल गया कि आवाज़ देवा की थी। जब आपको पता था कि केबल कटी थी और मंसूर ने काटी। तब भी आप कुछ नहीं बोले। फ़ोन तो सिर्फ़ डराता है, चाचा। फ़ोन आपका मुँह नहीं बंद कर सकता। मुँह तो आदमी खुद बंद करता है।"
चाचा ने मेरी तरफ़ देखा। उनके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। फिर निकली, बहुत धीमी।
"क्योंकि मैं तुमसे डर गया था।"
"मुझसे?"
"तेरे कानों से।" चाचा ने कहा। "तू जब छोटा था, तब भी गाड़ी की आवाज़ सुनकर बता देता था कि कौन सी गाड़ी गाँव में नई आई है। सिमरिया में तेरे पापा हँसते थे और कहते थे, इसका कान रघुवीर के कान से भी तेज़ है। मैंने सोचा था तू दिल्ली आएगा, गैराज में काम करेगा, और कुछ दिनों में तेरा कान मेरी गाड़ियों पर भी लगेगा। मैंने सोचा था कि तू एक दिन उस गाड़ी की आवाज़ सुनेगा जो उस रात मंडी की तरफ़ गई थी। और फिर तेरे पापा का नाम तेरे मुँह से सुनकर मैं तो और डर गया था। तू बस पूछता था — चाचा, पापा की गाड़ी का टायर कौन बदलता था? चाचा, पापा का ब्रेक किसने चेक किया था? मैं हर बार कोई न कोई बहाना बना देता था।"
"तो आप मुझसे डरे," मैंने कहा। "और मैं आप पर भरोसा करता रहा।"
"हाँ।" उन्होंने सिर हिलाया। "और यही सबसे बड़ा गुनाह है। मैंने तुम्हें अपने घर में इसलिए रखा, कि कहीं तुम सच तक न पहुँच जाओ।"
कमरे में सन्नाटा था। नैना ने कलम नीचे रख दी। कबीर ने रजिस्टर अपनी गोद में रख लिया और अपनी आँखें सीधी सामने की दीवार पर टिका दीं।
मजिस्ट्रेट ने कुर्सी की पीठ से टेक ली। "महेंद्र यादव, एक बात साफ़ कर लें। आपने कहा कि मंसूर अली ने केबल काटी। कालू ने भी आज सुबह यही कहा — कि मंसूर अली ने उसे दो हज़ार में केबल काटने को कहा था। पर सवाल यही है कि मंसूर अली के ऊपर कौन था?"
चाचा ने अपनी जेब की तरफ़ हाथ डाला, तो याद आया कि वहाँ कुछ नहीं है।
"साहब," उन्होंने कहा, "मैं उस आदमी का नाम नहीं जानता।"
"आपको उसकी आवाज़ पहचानी?"
"मैंने उसे एक बार सुना है। एक साल पहले।" चाचा ने कहा। "रात के ग्यारह बजे मंसूर मेरे गैराज पर आया था। कहने को वो काग़ज़ लेने आया था। उसके साथ एक आदमी और था। लंबा, सफ़ेद बाल, महँगा चश्मा, धीमी आवाज़। वो मुझसे ज़्यादा मंसूर से बोल रहा था, मुझे ऐसे देख रहा था जैसे कुर्सी देख रहा हो। जाते वक़्त उसने मुझे एक सफ़ेद काग़ज़ दिया था। उस पर कुछ नहीं लिखा था, बस नीचे एक नीला गोल निशान था। उसने कहा था, ये अपनी जेब में रख लेना। जब ज़रूरत होगी, तो कोई इसे देखकर तुझे पहचान लेगा।"
"वो काग़ज़ कहाँ है?"
"जला दिया।" चाचा ने कहा। "मैं हर चीज़ जलाता आया हूँ, साहब। यही मेरी पूरी ज़िंदगी है — जलाना। काग़ज़ जलाता रहा, और पेट के अंदर एक आग को दबाए रखा।"
मजिस्ट्रेट ने काग़ज़ पर कुछ लिखा। फिर उन्होंने देखा, "और केबल?"
चाचा ने मन ही मन हिम्मत की, फिर कहा, "साहब, मैंने मंसूर अली को केबल काटते देखा था। मैंने चहरे में प्लायर भी देखा था, वो लाल। और मैंने चाची से भी पहले कहा था कि गाड़ी के नीचे मेरा काम था। अर्जुन ने जब पहली बार सुबह गैराज में आकर पूछा, तो मैंने उसे झूठ बोला कि कुछ नहीं। मैंने एक झूठ को तीन कमरों में रखा। हर कमरे का एक ताला और चाबी थी। तीनों ताले खुले।"
चाचा ने एक लंबी साँस ली। "और अब मुझे बताना है कि देवा भाई मेरे लिए क्या हैं।"
मजिस्ट्रेट ने रुककर सुना।
"देवा भाई ने मुझे गैराज दिया, हर महीने का हिसाब दिया और एक डर दिया। डर का हिसाब हफ़्ते में दिया जाता था। सोमवार को आवाज़, बुधवार को लिफ़ाफ़ा, शनिवार को कोई आदमी गैराज के बाहर खड़ा। ग्यारह साल में मैंने अपने भाई के बेटे को देखा, और अपना नाम उसके सामने नहीं लिया।" उनके होंठ काँपे। "ये मैं नहीं कह रहा कि मैं मजबूर था। नहीं, मजबूर तो पहले हफ़्ते तक ही था। दूसरे महीने से तो मैं आदी हो गया। आदमी सबसे ज़्यादा अपने आदी होने पर शर्मिंदा होता है।"
मजिस्ट्रेट ने सिपाही को बोलकर एक नई पानी की बोतल मँगवाई और चाचा की तरफ़ बढ़वाई। चाचा ने लेने से मना कर दिया।
"मैं एक बात और कहूँगा," चाचा ने कहा।
"कहिए।"
"मंसूर अली सिर्फ़ हाथ हैं," चाचा ने कहा। "वो हाथ जिसे पैसे दिए जाते हैं। जब कालू ने यहाँ कहा कि मंसूर ने उसे दो हज़ार दिए थे, तो मैं ये जानता हूँ कि मंसूर ने वो दो हज़ार कहीं से लिए हैं। दो हज़ार किसी का पैसा नहीं होता। दो हज़ार तो काग़ज़ का एक टुकड़ा है। असली रकम उस सफ़ेद काग़ज़ के पीछे है।"
"आपको मंसूर और उस लंबे आदमी के अलावा किसी और का नाम पता है?"
"मुझे नहीं पता," चाचा ने कहा। "पर मैं इतना जानता हूँ कि देवा भाई भी उस आदमी से डरते हैं।"
कमरे में पहली बार देवा की तरफ़ से आवाज़ आई। "महेंद्र!" उनका मुँह खुला रह गया। उनके वकील ने उनके कंधे पर हाथ रखा और धीरे से कुछ कहा, पर देवा ने उनकी तरफ़ नहीं देखा। "महेंद्र, तू जो कह रहा है…"
चाचा ने देवा की तरफ़ नहीं देखा। वो सीधे मजिस्ट्रेट को देखते रहे।
"साहब, मैं एक बात कहूँ?" चाचा ने कहा। "मैं उस आदमी का नाम नहीं जानता जो उस सफ़ेद काग़ज़ पर नीला निशान लगाता है। मैंने उसे कभी देखा नहीं। पापा की डायरी में भी यही नाम आधा-अधूरा है, एक अक्षर — म।" मजिस्ट्रेट ने अर्जुन की तरफ़ नहीं देखा, पर उनकी उँगली काग़ज़ पर रुकी। "पर मैं ये जानता हूँ कि जब ये लड़का आज यहाँ तक पहुँच गया है, तो एक नाम टूटेगा।"
चाचा ने फिर एक लंबी साँस ली।
"साहब, मैंने अपने भाई की गाड़ी की लाइन बदली, और फिर ग्यारह साल तक मैंने उस लड़के को इसलिए अपने पास रखा कि वो सच तक न पहुँचे। मुझे पता है कि ये कितना बड़ा गुनाह है। मैं जानता हूँ कि मेरा भाई मेरी वजह से गया। मैं यही कहने आया हूँ। और मैं इतना कहने आया हूँ कि जो मैंने किया, मेरे भतीजे ने नहीं किया। मुझे दंड दीजिए, पर मेरे भतीजे का नाम किसी भी काग़ज़ पर दोषी की जगह मत लिखिए।"
कमरे में साँस लेने की आवाज़ बढ़ गई। किसी ने पीछे की बेंच पर धीरे से कहा, "महेंद्र भाई साहब…" और फिर चुप हो गया।
मजिस्ट्रेट ने काग़ज़ उठाया और फिर रख दिया।
"महेंद्र यादव, आपने कहा कि मंसूर अली ने केबल काटी, और कालू ने भी आज यही कहा। पर आपने यह भी कहा कि आपने लाइन बदली थी। ये दोनों बातें अलग-अलग अपराध हैं। आप समझते हैं?"
"समझता हूँ।"
"आपको गिरफ़्तार किया जा सकता है। आपको पता है?"
चाचा ने सिर हिलाया। "पता है। मैं ग्यारह साल से अपनी गिरफ़्तारी में ही चल रहा हूँ। सिर्फ़ काग़ज़ नहीं था। आज काग़ज़ भी आ गया।"
मजिस्ट्रेट ने एक सिपाही की तरफ़ देखा, फिर काग़ज़ पर लिखा। "फ़िलहाल आप अपनी बेंच पर जाकर बैठिए। जो कहा, वो दर्ज कर लिया गया है।"
चाचा ने सिर हिलाया और मुड़ गए। एक कदम चले, फिर रुक गए। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनके हाथ काँप रहे थे और उन्होंने मुँह खोला, पर कुछ नहीं बोले। फिर उन्होंने मजिस्ट्रेट की तरफ़ देखा।
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