A Dark Secret – Chapter 274
तिवारी ने फाइल दी।
और मैंने देखा — जब फाइल तिवारी के हाथ से निकली, तो उसके नीचे से वो मुड़ा हुआ पीला नोट फ़र्श पर नहीं गिरा। तिवारी ने उसे पहले ही अपनी मुट्ठी में दबा लिया था। बहुत तेज़। बहुत आदत से।
साफ़-सुथरे आदमी ने फाइल खोली।
उसने पन्ने उलटे। एक पन्ना। दूसरा। तीसरा।
उसकी उँगली एक जगह रुकी।
फिर वो ऊपर देखकर बोला, "सब पर एक ही तारीख़?"
तिवारी ने कुछ नहीं कहा।
"मैंने पूछा," उसने कहा। "इन सब पर एक ही तारीख़ क्यों है?"
"साहब, हादसे की तारीख़ होती है—"
"और हर हादसा महीने की सत्ताईस तारीख़ को ही क्यों होता है?" उसने फाइल बंद कर दी। ज़ोर से नहीं, बस बंद कर दी। और वो ज़ोर से बंद करना ही सबसे डरावनी आवाज़ थी।
भीड़ में कोई खाँसा।
बाकी सब चुप।
"दो बजे," साफ़-सुथरे आदमी ने कहा। "मजिस्ट्रेट साहब दो बजे बैठेंगे। ये सारा काग़ज़ अंदर जाएगा।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "तुम्हारे पास जो कुछ भी है — काग़ज़, रसीद, पर्ची, फोटो, रिकॉर्डिंग — सब मेज़ पर रखा जाएगा। एक भी चीज़ जेब में नहीं।"
"मेरी नक़ल जेब में रहेगी," मैंने कहा।
वो रुका।
"क्यों?"
"क्योंकि जो काग़ज़ जेब में रहता है, वो कभी नहीं जलता साहब।"
कुछ देर वो मुझे देखता रहा। फिर उसने कहा, "ठीक है। नक़ल रखो।"
और फिर, मुड़ते-मुड़ते, बिना मेरी तरफ़ देखे, उसने एक बात कही जो मेरे अंदर कहीं ठहर गई।
"तुम्हारे पिता भी काग़ज़ों वाले आदमी थे। उन्होंने भी नक़ल रखी थी।"
मेरी साँस एक पल के लिए रुकी।
"आप उन्हें जानते थे?"
वो नहीं रुका।
वो सफ़ेद गाड़ी की तरफ़ चलता गया, गाड़ी का दरवाज़ा खुला, वो बैठा, और गाड़ी धूल उड़ाती हुई निकल गई।
मैं वहीं खड़ा रह गया, हाथ में पापा की घड़ी, जो हमेशा पाँच मिनट आगे चलती है।
आज भी पाँच मिनट आगे थी।
लेकिन आज पहली बार लगा कि वो मुझसे आगे नहीं, मेरे पीछे रह गई है।
भीड़ धीरे-धीरे टूटने लगी। लोग गाड़ियों की तरफ़ लौटने लगे। रुक्मा दीदी ने अपनी साड़ी का पल्ला कमर में ठोंका और बिना किसी से कुछ कहे ढाबे की तरफ़ चल पड़ीं। अमरीक सिंह पन्नालाल का कटा पहिया लिए खड़े थे, जैसे उन्हें समझ नहीं आ रहा हो कि उसे कहाँ रखें। चाचा भीड़ के पीछे खड़े थे, सिर झुकाए, और जब मेरी नज़र उनसे मिली, तो उन्होंने तुरंत दूसरी तरफ़ देख लिया।
तभी एक बूढ़ी औरत मेरे पास आई।
सत्तर के ऊपर। घुटने मुड़े हुए। सिर पर सफ़ेद चुन्नी। हाथ में एक काग़ज़ का टुकड़ा, जिस पर जुगनू ने अपने टेढ़े अक्षरों में कुछ लिखा था।
उसने वो काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"मैंने भी लिखवाया है, बेटा," उसने कहा। "मेरे बेटे की गाड़ी पलटी थी। नौ साल पहले। सत्ताईस तारीख़ को।"
मैंने काग़ज़ लिया।
"आपका नाम?"
"नाम से क्या होगा," उसने कहा। "नाम तो उसने भी मिटा दिया था।" उसने मेरी कलाई पर बँधी घड़ी देखी। "तेरे पापा की घड़ी है?"
"जी।"
"वो भी पाँच मिनट आगे चलती थी," वो हँसी, दाँत एक भी नहीं था, बस मसूड़े। "रघुवीर कहता था — जो आदमी पाँच मिनट आगे चले, उसे कोई धोखा नहीं दे सकता।"
मैंने कुछ कहना चाहा।
आवाज़ नहीं निकली।
"बोल मत," वो बोली। "अभी मत बोल। दो बजे बोलना। और सुन — जब तू बोले, तो उन्हें मत देखना जो मेज़ के पीछे बैठे हैं। उन्हें देखना जो बेंच पर बैठे हैं। क्योंकि मेज़ वाले आज भी बदल जाएँगे। बेंच वाले नहीं बदलेंगे।"
वो चली गई।
धीरे-धीरे। घुटने मोड़कर।
और मैं थाने की सीढ़ी पर बैठ गया, और मैंने अपनी कॉपी निकाली, और मैंने उस औरत के काग़ज़ को उसमें रख दिया — तेईसवें पन्ने पर, जहाँ एक खाली जगह थी।
जुगनू मेरे पास आकर बैठ गया।
"कितने नाम?" मैंने पूछा।
"एक सौ अठतालीस," उसने कहा, बिना रुके, जैसे समाचार पढ़ रहा हो। "क्योंकि बूढ़ी अम्मा ने अभी लिखवाया। और एक नाम ऐसा है जो मैंने खुद जोड़ा है।"
"किसका?"
उसने अपनी जेब से एक काग़ज़ निकाला। कार्टन का फटा टुकड़ा। उस पर एक नाम लिखा था, बहुत साफ़ अक्षरों में, किसी बड़े आदमी की लिखाई जैसे।
नाम पढ़कर मेरा हाथ रुक गया।
"ये तूने किससे लिखवाया?"
"किसी से नहीं," जुगनू ने कहा। "ये मैंने खुद लिखा है। मुझे सब नाम याद हैं। ये भी याद है।"
उस काग़ज़ पर लिखा था — भोला।
"जुगनू," मैंने धीरे से कहा। "भोला तो…"
"पता है," उसने कहा। "मरा हुआ आदमी गवाही नहीं दे सकता। पर उसका नाम तो दे सकता है ना?" उसने मेरी तरफ़ देखा। "मेरे पापा का नाम भी है उसमें। तीस नंबर पर।"
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा।
उसके बाल धूल से भरे थे।
"ठीक है," मैंने कहा। "सब नाम जाएँगे।"
दो बजे से पहले का वक़्त बड़ा अजीब होता है।
न घर का, न सड़क का।
मैं ढाबे पर गया। रुक्मा दीदी चूल्हे पर रोटी बना रही थीं, और उनके हाथ रुक-रुककर जाते थे।
"दीदी।"
"हँ।"
"आप अंदर आ रही हैं?"
"क्यों नहीं आऊँगी?" उन्होंने तवा उठाया, फिर रख दिया। "मैं ग्यारह साल से उसी दिन का इंतज़ार कर रही हूँ। तू सोचता है मैं बाहर खड़ी रहूँगी?"
"आपको कुछ नहीं बोलना है दीदी।"
"क्यों?"
"क्योंकि जब आप बोलेंगी, तो वो सब बोलेंगे जो हम नहीं चाहते।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"अर्जुन। मैं ग्यारह साल से चुप हूँ। अब मुझे बोलने दे।"
"नहीं," मैंने कहा। "आज नहीं। आज सिर्फ़ काग़ज़ बोलेंगे। आप बोलेंगी तो काग़ज़ पीछे छूट जाएँगे। और मुझे आपकी ज़रूरत कल भी पड़ेगी। बहुत पड़ेगी।"
वो कुछ देर चुप रहीं।
फिर उन्होंने तवा उठाया और रोटी बनाने लगीं।
"जा," उन्होंने कहा। "और सुन — मेज़ पर जो काग़ज़ रखेगा, वो काग़ज़ उल्टा मत रखना। सीधा रखना। जज साहब भी आदमी ही हैं। उन्हें भी सीधा पढ़ना आसान लगता है।"
दो बजे से पाँच मिनट पहले मैं अदालत के कमरे में घुसा।
कमरा बड़ा था।
छत ऊँची, दीवारें पीली, और ऊपर तीन पंखे धीरे-धीरे चल रहे थे। इतने धीरे कि उनकी आवाज़ आती थी — जैसे कोई गाड़ी की छत पर बैठा हो और वो धीरे-धीरे चले। एक पंखे की बेल्ट ढीली थी। मैं उसे सुनकर बता सकता था — वो हर चक्कर पर एक हल्की चीख छोड़ता था।
मैंने पीछे बैठे कबीर से धीरे से कहा, "तीसरा पंखा।"
कबीर ने देखा। "क्या?"
"उसकी बेल्ट ढीली है। दो दिन में टूट जाएगी।"
कबीर ने मेरी तरफ़ देखा, और उसके चेहरे पर वो पुरानी हल्की मुस्कान आई। "तू अदालत में भी काम कर रहा है?"
"आदत है," मैंने कहा।
बेंच भरे हुए थे।
लकड़ी के बेंच। पुराने, घिसे हुए, जिनमें कहीं-कहीं लोहे की कीलें ऊपर निकली हुई थीं। उन पर ड्राइवर बैठे थे। कोई सफ़ेद कुर्ते में, कोई फटी शर्ट में, कोई लुंगी में। कोई बाल में तेल डाले, कोई नहा धोकर आया था, कोई सीधे गाड़ी से उतरकर आया था और उसके कपड़ों से डीज़ल की बू आ रही थी।
मैंने गिना।
एक सौ से ज़्यादा।
और सबसे पीछे, दीवार के सहारे, रुक्मा दीदी बैठी थीं। उनके हाथ में वो पुराना पीला लिफ़ाफ़ा था। उनके बगल में अमरीक सिंह, काले कोट में, जेब में लाल रुमाल, और उनके पैरों में पन्नालाल का कटा पहिया रखा था — वो उसे लेकर ही आए थे, किसी कीमत पर उससे अलग नहीं हुए।
नैना बगल में बैठी थी। उसका कैमरा उसकी गोद में था। फटा बैग कंधे पर। चश्मा नाक पर सरका हुआ।
सामने, मेज़ के उस पार, देवा भाई बैठे थे।
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