A Dark Secret – Chapter 273
"चार्ज हो रहा है?" मैंने पूछा।
"धीरे," उसने कहा। "पर हो रहा है।"
"कितना?"
"एक घंटे में शायद आधा।"
"तो एक घंटे में आधा काफ़ी है," मैंने कहा। "क्योंकि आज हमें ज़्यादा तस्वीरें नहीं चाहिए। आज हमें सिर्फ़ चेहरे चाहिए।"
कबीर आ गया था।
उसके हाथ में एक मोटा बंडल था।
"क्या है?" मैंने पूछा।
"नक़लें," उसने कहा। "चार पैकेट। एक तेरा, एक नैना का, एक रुक्मा दीदी का, और एक…"
वो रुका।
"और एक किसका?"
"एक उस आदमी का," उसने कहा, "जिस पर मैं सबसे आख़िर में भरोसा करूँगा।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"तू खुद पर भरोसा नहीं करता?"
"मैं खुद पर करता हूँ," उसने कहा। "पर मैं जानता हूँ कि मैं क्या हूँ। और जो आदमी अपने आप को जानता है, वो अपने आप पर सबसे कम भरोसा करता है।"
मैं मुस्कुराया।
"चल," मैंने कहा। "थाना चलते हैं।"
थाना छब्बीस नंबर के बाहर, जब हम पहुँचे, तो मैंने गाड़ी धीमी की और मेरा हाथ स्टीयरिंग पर जम गया।
भीड़ थी।
सड़क के किनारे, थाने की चारदीवारी के बाहर, पचास नहीं, सौ नहीं — मुझे लगा दो सौ से ज़्यादा लोग खड़े थे। ट्रक वाले। ड्राइवर। हमाल। ढाबे वाले। बस्ती के लोग। कुछ औरतें भी थीं, सूती साड़ियों में, सिर ढके हुए।
और सबके हाथ में कुछ न कुछ था।
किसी के हाथ में काग़ज़। किसी के हाथ में रसीद। किसी के हाथ में टूटा हुआ पुर्ज़ा। किसी के हाथ में सिर्फ़ एक पुरानी तस्वीर।
जुगनू सबसे आगे खड़ा था।
उसके हाथ में वो कार्टन का टुकड़ा था, जिस पर कल रात एक सौ सैंतालीस लोगों ने अपने नाम और गाड़ी के नंबर लिखे थे। कार्टन अब और टेढ़ा हो गया था, किनारों से मुड़ गया था, पर वो उसे दोनों हाथों से ऊपर उठाए खड़ा था, जैसे कोई तख़्ती उठाकर खड़ा हो।
और उसके पीछे रुक्मा दीदी थीं।
उनके हाथ में वो पीला लिफ़ाफ़ा था — ग्यारह साल पुराना, खुला हुआ, जिसमें हादसा रिपोर्ट और राठौर का दावा था।
और उनके बगल में अमरीक सिंह खड़े थे।
काले कोट में। लाल रुमाल जेब में। और उनके हाथ में — एक कटा हुआ पहिया। छोटा पहिया, साइकिल या छोटी गाड़ी का नहीं, बल्कि उस पुराने यूनियन मुनीम पन्नालाल की गाड़ी का, जिस पर तीन सीधे कटे निशान थे।
अमरीक सिंह का चेहरा आज अलग था।
कल रात वो मंच पर खड़े होकर रोए थे। आज वो चुप खड़े थे। और मुझे लगा कि चुप खड़ा होना रोने से ज़्यादा मुश्किल है।
मैंने गाड़ी रोकी।
मैं उतरा।
भीड़ में से कोई चिल्लाया — "आ गया!"
और फिर भीड़ हिली, पर आगे नहीं बढ़ी। किसी ने किसी को रोका। किसी ने कहा — "पीछे रहो, पीछे रहो, उसने कहा था न, कोई लड़ाई नहीं।"
मैं थाने के फाटक तक गया।
तिवारी बाहर आए।
उनके हाथ में वही फाइल थी। वही मुड़ा हुआ पीला नोट उसके नीचे दबा था।
उन्होंने भीड़ देखी। फिर मुझे देखा।
"ये क्या तमाशा है?" उन्होंने कहा।
"तमाशा नहीं है साहब," मैंने कहा। "काग़ज़ जमा करने आया हूँ।"
"काग़ज़?"
"जी। कुछ काग़ज़ हैं। कुछ गवाह हैं। कुछ चीज़ें हैं जो आपको कल भी दिखानी चाहिए थीं, पर आपने उन्हें शॉर्ट सर्किट बताकर छोड़ दिया।"
तिवारी की मूँछ हिली।
"सुन बेटा," उन्होंने कहा। "यहाँ सब कुछ काग़ज़ पर लिखा जाता है। जो काग़ज़ पर नहीं, वो हुआ ही नहीं। तेरे पास क्या है?"
"मेरे पास बहुत कुछ है," मैंने कहा।
"जैसे?"
"जैसे सत्ताईस सितंबर," मैंने कहा। "दस साल पहले की रसीद। जिस पर मेरे पापा का हस्ताक्षर है। और जिस पर आपकी मुहर है।"
तिवारी ने फाइल पकड़कर रखी।
"मुझे वक़्त नहीं है," उन्होंने कहा। "आज बहुत काम है। तू कल आ।"
"कल नहीं," मैंने कहा।
"अरे मैं कह रहा हूँ—"
"कल नहीं," मैंने दोहराया। और मेरी आवाज़ धीमी हो गई, और जब मेरी आवाज़ धीमी होती है, तो मुझे खुद भी पता चल जाता है कि मैं गुस्से में हूँ। "आज। अभी। क्योंकि आज सुबह आपने मेरे गैराज में आग को शॉर्ट सर्किट कहा था। और शॉर्ट सर्किट की रिपोर्ट पर आपका नाम है। और मैं वो रिपोर्ट भी जमा करने आया हूँ।"
तिवारी का चेहरा बदला।
उसी वक़्त नैना आगे आई।
उसने अपना कैमरा उठाया।
"सर," उसने कहा। "एक सवाल।"
"क्या?"
"आज क्या तारीख़ है?"
तिवारी ने उसकी तरफ़ देखा।
"क्या?"
"तारीख़," नैना ने कहा। "आज क्या तारीख़ है? मैं इसलिए पूछ रही हूँ क्योंकि आपकी हर रिपोर्ट पर एक ही तारीख़ छपी है। सत्ताईस सितंबर। हर महीने की सत्ताईस तारीख़। और आज… आज कौन सी तारीख़ है सर?"
कैमरे की लाल बत्ती जल रही थी।
और तिवारी ने कैमरे की तरफ़ देखा, और उसका हाथ फाइल के ऊपर से हट गया, और उसका हाथ उस पीले नोट की तरफ़ चला गया, और फिर रुक गया।
भीड़ चुप थी।
इतनी चुप कि मुझे टोल नाके की आवाज़ सुनाई दे रही थी, दो किलोमीटर दूर से।
और फिर भीड़ में से किसी ने कहा।
एक आवाज़। बूढ़ी। काँपती। पर साफ़।
"महेंद्र," उस आदमी ने कहा। "महेंद्र यादव को भी अंदर बुला लो। वो भी आया है।"
मैंने पीछे देखा।
चाचा भीड़ के सबसे पीछे खड़े थे।
उन्होंने आज वही सस्ती शर्ट पहनी थी। कॉलर से वही धागा लटक रहा था। चश्मा वही चटका हुआ। और उनके हाथ में कुछ नहीं था — कोई काग़ज़ नहीं, कोई रसीद नहीं, कोई सबूत नहीं।
सिर्फ़ उनका चेहरा था।
और वो चेहरा आज पहली बार ऐसा था जैसा मैंने कभी नहीं देखा था। डरा हुआ नहीं। चालाक नहीं। बस… थका हुआ।
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और उन्होंने सिर हिलाया, बहुत हल्का, जैसे कोई कहे — मैं आ गया। जैसा कहा था।
और ठीक उसी वक़्त, भीड़ के पीछे से, एक सफ़ेद गाड़ी आकर रुकी।
उसमें से एक आदमी उतरा।
सफ़ेद शर्ट। इस्त्री किए हुए कपड़े। काले चमड़े का बैग। चश्मा जो नाक पर सही बैठा था। और चाल में वो ठहराव था जो सिर्फ़ उन लोगों में होता है जिन्हें हर जगह जगह मिल जाती है।
वो सीधा मेरे पास आया।
वो रुका। उसने मेरे हाथ देखे।
मेरे हाथ — जिन पर काले तेल की लकीरें थीं, जो साबुन से भी नहीं जातीं। जिनकी उँगलियों के नाखूनों के नीचे सालों की कालिख भरी थी। जिन पर एक पुरानी घड़ी बँधी थी, जो पाँच मिनट आगे चलती थी।
और वो हँसा।
हँसी बड़ी नहीं थी। छोटी थी। नाक से निकली, जैसे कोई गलती से हँस दे।
"ये क्या है?" उसने कहा। "ये क्या है तिवारी? ये आदमी कौन है?"
तिवारी ने कहा, "साहब, ये वही है—"
"मुझे पता है कौन है," उसने कहा। "मैं पूछ रहा हूँ कि ये क्या है। देखिए इसके हाथ।"
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"तुम मज़दूर हो?"
भीड़ चुप थी।
मैंने अपना हाथ नीचे नहीं किया। मैंने अपनी उँगलियाँ छिपाईं नहीं। मैंने उन्हें देखा, और फिर उसकी तरफ़ देखा।
और मैं धीरे से बोला।
"जी साहब, मज़दूर ही हूँ। और यही मेरी सबसे बड़ी डिग्री है।"
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"जी साहब, मज़दूर ही हूँ। और यही मेरी सबसे बड़ी डिग्री है।"
साफ़-सुथरे आदमी ने मेरी तरफ़ देखा।
इस बार वो नहीं हँसा।
उसने मेरे हाथ फिर देखे, फिर मेरी आँखों पर आया, और बहुत धीरे से बोला, "अच्छा।"
फिर वो तिवारी की तरफ़ मुड़ा।
"फाइल।"
तिवारी ने फाइल पकड़ी हुई थी। उसकी उँगलियाँ उस पर सफ़ेद पड़ गई थीं। "साहब, फाइल तो मैं लेकर चलूँगा, आप बोलिए—"
"तिवारी।" साफ़-सुथरे आदमी की आवाज़ न ऊँची थी, न धीमी। जैसे कोई किसी काग़ज़ पर लिखी लाइन पढ़ रहा हो। "फाइल मेरे हाथ में दो।"
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