A Dark Secret – Chapter 272
"मतलब आठ तारीख़ को कुछ होगा," कबीर ने कहा।
"मतलब आठ तारीख़ एक तारीख़ नहीं है," मैंने कहा। "आठ तारीख़ एक धमकी है। हर काग़ज़ पर एक आदमी लिखता है — आठ को। जैसे कोई कहे, तेरी साँस आठ तारीख़ तक चलेगी।"
नैना ने मेरी तरफ़ देखा।
"और अलमारी?"
"अलमारी वो है," मैंने कहा। "जिसकी चाबी अभी मेरी जेब में है।"
मैंने जेब से वो कपड़ा निकाला।
रुक्मा दीदी ने कपड़े में लपेटकर दिया था। कपड़ा मोटा था, ढाबे के किसी पुराने तौलिये का टुकड़ा। अंदर पीतल की छोटी चाबी थी — छोटी उँगली के जोड़ जितनी, दाँते घिसे, सिरे पर धुँधला अंक।
मैंने उसे लालटेन की रोशनी में पकड़ा।
नैना ने देखा।
"इसकी एक तस्वीर चाहिए थी," उसने कहा।
"कैमरा गया," मैंने कहा।
"मुझे पता है," उसने कहा। "मैं बस बोल रही हूँ। बोलने से कम लगता है।"
कबीर ने कॉपी बंद की और खड़ा हुआ।
"अर्जुन," उसने कहा। "मुझे एक बात समझ नहीं आ रही।"
"पूछ।"
"अगर देवा भाई यहाँ थे," उसने कहा, "अगर उन्होंने लालटेन जलाई, अगर उन्होंने ये काग़ज़ छोड़ा, तो वो चाहते क्या हैं? वो चाहते हैं कि हम सिमरिया जाएँ?"
मैंने लालटेन की तरफ़ देखा।
लौ अभी भी नाच नहीं रही थी।
"वो चाहते हैं कि हम सिमरिया जाएँ," मैंने कहा। "रात में। अंधेरे में। उस गोदाम में जहाँ उनका बोर्ड लगा है और जहाँ मंसूर अली, क़सूर और कालू बैठे हैं।"
"तो हम नहीं जाएँगे?" नैना ने कहा।
मैंने आसमान की तरफ़ देखा।
तारे नहीं थे। बादल थे। बादल के नीचे एक पतली लाल लकीर थी, शहर की तरफ़ — टोल नाके की रोशनी।
"नहीं जाएँगे," मैंने कहा।
कबीर ने साँस छोड़ी। जैसे उसने भीतर ही भीतर इंतज़ार किया हो कि मैं क्या कहता हूँ।
"तू डर रहा था?" मैंने पूछा।
"हाँ," उसने कहा, बिना झिझक। "मैं डर रहा था। और मुझे ये बताते हुए शर्म नहीं आ रही, क्योंकि मैंने आज रात देखा है कि डर कैसा दिखता है। भीड़ में खड़े आदमी का डर, मंच पर खड़े आदमी का डर, और उस आदमी का डर जो लालटेन जलाकर भाग गया।"
"अच्छा," मैंने कहा।
"अच्छा क्या?"
"अच्छा ये कि तू डरा हुआ है," मैंने कहा। "डरा हुआ आदमी जल्दी में गाड़ी नहीं भगाता। वो रुककर सोचता है। और सोचने वाला आदमी मेरे काम आता है।"
मैंने लालटेन उठाई।
"अब सुन," मैंने कहा। "ये जाल है। मुझे इसमें नहीं जाना है। जो आदमी लालटेन जलाकर इंतज़ार करता है, वो गलती कर चुका है। क्योंकि उसने मुझे बता दिया कि वो मेरे आने का इंतज़ार कर रहा है। और जो इंतज़ार करता है, वो अपनी जगह पकड़कर बैठा रहता है। वो अपनी जगह नहीं बदलता। और अगर वो जगह नहीं बदलता, तो उसे पकड़ना आसान है।"
"तो अब क्या?" नैना ने पूछा।
"अब हम लौटेंगे," मैंने कहा। "और सुबह दस बजे थाना छब्बीस नंबर पर सारे काग़ज़ जमा करेंगे। सब। एक भी पीछे नहीं।"
कबीर ने कहा, "सब?"
"सब," मैंने कहा। "क्योंकि अब जितने काग़ज़ मेरे पास हैं, उतने ही मेरे ऊपर ख़तरे भी हैं। जो चीज़ जेब में है, वो मेरी है और मेरी जान भी माँगती है। जो चीज़ थाने में है, वो किसी की नहीं और सबकी है।"
नैना ने अपना बैग सीधा किया।
"मुझे एक बात कहनी है," उसने कहा। "अगर हम सब काग़ज़ थाने में जमा करेंगे, तो वो काग़ज़ हमारे हाथ से चले जाएँगे। तिवारी के हाथ में।"
"मुझे पता है," मैंने कहा।
"और तिवारी आज सुबह गैराज आकर आग को शॉर्ट सर्किट बता गया।"
"मुझे पता है।"
"तो तू ऐसा क्यों कर रहा है?"
मैंने लालटेन उसे पकड़ाई।
"क्योंकि काग़ज़ थाने में जमा होते ही काग़ज़ हमारे नहीं रहते, पर उनका हिसाब सबके सामने आ जाता है," मैंने कहा। "आज रात ढाबे पर एक सौ सैंतालीस आदमियों ने अपना नाम लिखवाया है। अगर मैं काग़ज़ लेकर भागूँगा, तो कल वो एक सौ सैंतालीस बोलेंगे कि अर्जुन भी भाग गया। और अगर मैं काग़ज़ जमा करूँगा, तो वो एक सौ सैंतालीस बोलेंगे कि काग़ज़ थाने में है, अब देखते हैं क्या होता है। दोनों में फ़र्क़ है। पहले में मैं अकेला आदमी हूँ। दूसरे में मैं एक गवाह हूँ।"
कबीर ने कहा, "और तीसरी शक्ल भी है।"
"क्या?"
"तीसरी शक्ल में तू वो आदमी है जो काग़ज़ जमा करके भी अपनी नक़ल रखता है," उसने कहा। "और यही शक्ल सबसे मज़बूत है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"तू आज बहुत समझदार हो गया है," मैंने कहा।
"मैं आज बहुत डरा हुआ हूँ," उसने कहा। "और डरा हुआ आदमी हिसाब लगाता है। यही मेरा काम है।"
हम गाड़ी में बैठे।
मैंने इंजन चालू किया। गाड़ी ने एक बार कराहा — वो कराह जो हर पुरानी गाड़ी उठने से पहले करती है, जैसे बूढ़ा आदमी कुर्सी से उठते वक़्त अपनी कमर को याद दिलाता है।
मैंने गाड़ी आगे बढ़ाई।
पीछे देखा। लालटेन अब भी जल रही थी। हम जा रहे थे, और लौ वहीं खड़ी थी, अकेली, बेकार — जैसे कोई चिट्ठी लिखकर छोड़ गया हो और पढ़ने वाले ने पढ़कर फेंक दी हो।
कबीर ने पूछा, "लालटेन को बुझा दें?"
"नहीं," मैंने कहा। "जलने दे। जिसने जलाई है, वो सोचेगा कि हम आए या नहीं। और वो सोचेगा तो उसकी नींद ख़राब होगी। मुझे उसकी नींद ख़राब चाहिए।"
हम रातरानी ढाबे की तरफ़ लौटे।
रास्ते में कोई नहीं बोला।
नैना ने खिड़की से बाहर देखा और उसका चश्मा नाक पर सरक आया और उसने उसे उँगली से ऊपर धकेला, और मुझे लगा कि वो रो रही है, पर वो नहीं रो रही थी। वो गिन रही थी।
कबीर ने कॉपी खोली और उस पर हाथ रखकर बैठा रहा, जैसे किसी बीमार आदमी का हाथ पकड़कर बैठा हो।
और मैं गाड़ी चला रहा था।
इंजन की आवाज़ में मुझे एक बात सुनाई दे रही थी जो किसी और को नहीं सुनाई देती। गाड़ी ठीक थी। पर उसके अंदर कहीं एक छोटी ठन-ठन थी, बहुत धीमी, बहुत नियम से — जैसे कोई बच्चा नाखून से लोहे की मेज़ खुरच रहा हो।
मैंने सोचा — कल सुबह सबसे पहले ये ठीक करूँगा।
और फिर मुझे लगा कि यही तो आदमी होता है। एक तरफ़ अलमारी की चाबी है, एक तरफ़ आठ तारीख़ की धमकी है, और वो सोच रहा है कि गाड़ी में ठन-ठन कहाँ से आ रही है।
पर सच यही था। मैं वही आदमी था। और मुझे इससे कोई शिकायत नहीं थी।
ढाबे पर पहुँचकर मैंने गाड़ी रोकी।
रुक्मा दीदी बाहर खड़ी थीं। उन्होंने चाय का बड़ा गिलास पकड़ा हुआ था, और उनकी उँगलियाँ गिलास से चिपकी हुई थीं, जैसे वो बहुत देर से वहीं खड़ी हों।
"कुछ मिला?" उन्होंने पूछा।
"मिला," मैंने कहा।
"अच्छा या बुरा?"
"दोनों," मैंने कहा। "पर कल जो होगा, वो अच्छा होगा।"
उन्होंने गिलास मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"पी," उन्होंने कहा। "और सो जा। तीन घंटे सो ले, तीन घंटे भी कम होंगे, पर तीन घंटे तो होते हैं।"
मैंने चाय पी।
फिर मैं बेंच पर लेट गया, जहाँ उन्होंने चटाई बिछाई थी। छत से टिन की छाया गिर रही थी। दूर कहीं टोल की तरफ़ से एक भारी गाड़ी गुज़री और उसकी आवाज़ हवा में रह गई।
मैंने आँख बंद की।
और नींद नहीं आई।
पर मैंने आँख बंद रखी, क्योंकि आँख बंद रखने से कम से कम दुनिया शांत लगती है।
सुबह आठ बजे रुक्मा दीदी ने मुझे उठाया।
"उठ," उन्होंने कहा। "नौ बजे बल्लू रद्दी वाली दुकान पर नामों की नक़ल करवाने जा रहा है। और तू दस बजे थाने पहुँचना है।"
मैं उठा।
नैना पहले से जागी हुई थी और अपने कैमरे की बैटरी चार्ज करने की कोशिश कर रही थी, जो किसी के यहाँ के पुराने चार्जर में लगी थी और जिसकी तार उलझी हुई थी।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno