A Dark Secret – Chapter 271
गाड़ी पुल के मोड़ पर आकर रुकी।
मैंने ब्रेक नहीं दबाया। मैंने गाड़ी धीमी की, और वो अपने आप रुक गई, जैसे किसी ने पीछे से कंधा पकड़ लिया हो।
लालटेन जल रही थी।
तीसरे खंभे के नीचे, सूखी नदी की रेत पर, एक छोटी लौ। हवा चल रही थी, पर लौ नाच नहीं रही थी। मतलब कोई उसे रोज़ की तरह नहीं जला गया था। कोई उसे संभालकर जला गया था। किसी ने उसे ऐसे रखा था जैसे दुकान के बाहर तख़्ती रखी जाती है — यहाँ है, आ जाओ।
"रुक क्यों गया?" नैना ने पीछे से पूछा।
"गाड़ी रोकी नहीं," मैंने कहा। "गाड़ी ने खुद रोकी।"
"ये क्या बात हुई?"
"मज़ाक कर रहा हूँ," मैंने कहा। "पर आधा सच है। मेरा पैर ब्रेक पर चला गया था, दिमाग़ ने बोला नहीं।"
मैंने इंजन बंद किया।
और तभी मैंने वो सुना।
इंजन बंद होने के बाद भी, एक पल के लिए, हवा में कुछ बचा रह गया। बहुत पतला। बहुत दूर। किसी गाड़ी के जाने के बाद जो आवाज़ हवा में अटक जाती है, वो सिर्फ़ उसी को सुनाई देती है जो उसे ढूँढता है।
लोहे की घरघराहट।
धीमी। दबी हुई। जैसे कोई बूढ़ा आदमी सोते-सोते खाँस रहा हो।
मैंने आँख बंद की।
कबीर ने दरवाज़ा खोला।
"क्या हुआ?" उसने पूछा।
"चुप।"
वो चुप हो गया।
मैंने सुना। तीन चीज़ें थीं। पहली — रेत पर फिसलती हुई पतली हवा। दूसरी — पानी की एक बूँद जो कहीं पत्थर पर गिर रही थी, बहुत नियम से, गिनती जैसे। तीसरी — वो घरघराहट।
और चौथी थी, जो मुझे सबसे ज़्यादा चुभी।
नई साइलेंसर की शांति।
नया साइलेंसर आवाज़ को खाता है। वो चीख को निगल जाता है। पर उसके नीचे जो पुराना पाइप है, वो अपनी आदत नहीं छोड़ता। नई चीज़ ऊपर बैठती है, पुरानी चीज़ नीचे बैठकर हिसाब माँगती है।
मैंने आँख खोली।
"कबीर।"
"हाँ।"
"देवा भाई की गाड़ी का साइलेंसर नया लगा है।"
कबीर ने मेरी तरफ़ देखा।
"तुझे कैसे पता?"
"क्योंकि नई साइलेंसर के नीचे से पुराने पाइप की आवाज़ आ रही है," मैंने कहा। "और वो आवाज़ अभी-अभी यहाँ से गई है। पैंतालीस मिनट नहीं हुए। शायद बीस।"
नैना ने अपना बैग खींचा।
"मतलब वो यहाँ था?"
"वो यहाँ था," मैंने कहा। "और उसने लालटेन जलाई। और फिर वो चला गया। और गाड़ी चलाते वक़्त उसने साइलेंसर नया लगवाया था, ये बात वो भूल गया कि नीचे का पुराना पाइप अभी भी बोलता है। आदमी जब जल्दी में होता है, तो वो अपने सबसे पुराने हिस्से को भूल जाता है।"
मैं गाड़ी से उतरा।
रेत चप्पल में भर गई। ठंडी थी। नदी सूखी थी, पर रेत में नमी बची थी, और नमी में ख़ुशबू बची थी — मिट्टी की, लोहे की, और कुछ तेल की।
मैं पुल के नीचे गया।
नैना मेरे पीछे थी। उसने टॉर्च जलाई, पर टॉर्च की रोशनी लालटेन के सामने फीकी पड़ रही थी।
"देख," मैंने कहा।
रेत पर टायर के निशान थे।
दो लंबे निशान। चौड़े। मोटी गाड़ी के। और निशान नए थे — किनारे की रेत अभी ढही नहीं थी, अभी बही नहीं थी।
"गाड़ी यहाँ आई," मैंने कहा। "रुकी। फिर उलटी घूमी, और वापस गई। देखो, जहाँ उलटी है, वहाँ रेत दो बार दबी है। पहले आगे का पहिया, फिर पीछे का। उलटते वक़्त आदमी ने एक बार गाड़ी रोकी भी थी — ये रुकने का निशान है।"
कबीर झुका।
"इतना कैसे देख लेता है तू?"
"देखता नहीं," मैंने कहा। "सुनता हूँ। निशान भी बोलते हैं। बस उनकी आवाज़ रेत की होती है, धातु की नहीं।"
नैना ने कैमरा निकाला।
उसने लालटेन की तरफ़ कैमरा उठाया।
"एक मिनट," उसने कहा।
कैमरे की लाल बत्ती जलने लगी। फिर एक बार जल-बुझ गई। फिर जल गई।
"बैटरी?" मैंने पूछा।
"लगभग ख़त्म," उसने कहा। "आज सुबह चार्ज किया था, पर सारी रात रिकॉर्डिंग चली।"
"तो कितना बचा?"
"एक तस्वीर," उसने कहा। "शायद दो।"
"तो एक ही लो," मैंने कहा। "सोचकर लो। बाद में पछताना मत।"
उसने सोचा। फिर कैमरा नीचे किया?
"नहीं," उसने कहा। "लालटेन की तस्वीर लेने से क्या होगा। लालटेन तो कोई भी जला सकता है। मुझे चाहिए वो चीज़ जो सिर्फ़ यहाँ हो।"
"तो ढूँढ," मैंने कहा।
हम तीनों ने ढूँढा।
पुल के नीचे जो कुछ पड़ा था, वो सब पहले से मुझे पता था। पत्थर। सूखी लकड़ी के टुकड़े। कीचड़ में धँसी एक पुरानी चप्पल। टूटी बोतल का मुँह, जो हमेशा से वहीं था।
फिर मेरा पैर किसी चीज़ पर पड़ा और वो चीज़ घिसटी।
मैं झुका।
माचिस का डिब्बा था।
आधा जला। एक कोना पूरा जलकर काला था, बाक़ी बचा था। डिब्बे पर नीले रंग में कुछ छपा था, और धुँधला होने के बाद भी अक्षर पढ़े जा रहे थे।
सिमरिया कोल्ड स्टोरेज।
मैंने उसे उठाया। डिब्बा अभी हल्का गरम था। इतना नहीं कि हाथ जले, पर इतना ज़रूर कि पता चले कि यहाँ से अभी-अभी एक ज़िंदा आग गुज़री है।
"अम्मा के क़स्बे का डिब्बा," मैंने कहा। "मतलब आज रात कोई सिमरिया से आया है।"
"या कोई सिमरिया गया है," नैना ने कहा।
"दोनों," कबीर ने कहा। "एक गया, एक आया। दोनों ने एक ही डिब्बे की माचिस इस्तेमाल की। ये कोल्ड स्टोरेज से मुफ़्त में बाँटते हैं। मेरे यहाँ भी एक डिब्बा पड़ा है, पिछले साल का।"
मैं हँसा।
नहीं, ठीक से हँसा नहीं। मेरे मुँह से एक आवाज़ निकली, जो हँसी जैसी थी पर हँसी नहीं थी। थकान की आवाज़।
"कबीर," मैंने कहा। "तू ऐसी बातें कैसे जानता है?"
"मैं दुकान चलाता हूँ," उसने कहा। "दुकान पर लोग माचिस भूल जाते हैं, पता नहीं चलता किसका है। साल भर में एक हज़ार डिब्बे जमा हो जाते हैं। उन्हीं से मैंने सीखा है कि माचिस झूठ नहीं बोलती।"
मैंने माचिस का डिब्बा नैना को दिया।
"लो," मैंने कहा। "एक तस्वीर इसकी।"
उसने ली।
लाल बत्ती जली। एक बार क्लिक हुआ। फिर बत्ती बुझ गई और वापस नहीं जली।
"गई," उसने कहा।
"क्या गई?"
"कैमरा।"
उसने बैटरी निकाली और हथेली पर रखी। फिर उसने बैटरी को ज़ोर से सहलाया, जैसे कोई बीमार बच्चे का सिर सहलाता है।
कबीर ने अपनी जेब से वो मोटी कटी-फटी कॉपी निकाली।
"मेरे पास लिखने की चीज़ है," उसने कहा।
"लिख," मैंने कहा।
वो रेत पर बैठ गया। घुटने मोड़कर। कॉपी घुटने पर रखी। और लिखने लगा।
"माचिस का डिब्बा," वो बोलते-बोलते लिख रहा था। "सिमरिया कोल्ड स्टोरेज। आधा जला। लालटेन के नीचे मिला। बाईं तरफ़ से दूसरा खंभा। गरम था। टायर के निशान दो, चौड़े, नए। गाड़ी उलटी घूमी।"
वो रुका।
"और क्या?"
"रुक," मैंने कहा।
मैं लालटेन के पास गया।
लालटेन के नीचे, रेत में, कुछ दबा था।
काग़ज़ का टुकड़ा।
बहुत छोटा। फाड़ा हुआ। किनारे जले हुए नहीं थे, फटे हुए थे — जैसे किसी ने जल्दी में फाड़कर फेंका हो।
मैंने उसे उठाया।
उस पर पेंसिल से लिखा था। हाथ की लिखाई, तेज़, टेढ़ी।
ऊपर — आठ तारीख़।
नीचे — अलमारी।
बस इतना। आगे पीछे कुछ नहीं।
मैंने उसे पलटा। पीछे कुछ नहीं था। सिर्फ़ काग़ज़ का रेशा।
मैंने उसे कबीर की तरफ़ बढ़ाया।
"लिख," मैंने कहा। "काग़ज़ का टुकड़ा। पेंसिल। आठ तारीख़। अलमारी। लालटेन के नीचे, रेत में दबा।"
कबीर लिख रहा था।
"अर्जुन," नैना ने कहा। "ये आठ तारीख़ वही है न?"
"वही है," मैंने कहा। "मंसूर के पास आठ तारीख़ की फ़ाइल है। पापा की रसीद पर लिखा था — फ़ाइल आठ को आएगी। रुक्मा दीदी के लिफ़ाफ़े में पर्ची थी — बाक़ी काग़ज़ आठ को। और अब ये।"
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