A Dark Secret – Chapter 270
"नहीं," मैंने कहा। "डरा हुआ आदमी भागता है। वो भाग नहीं रहा। वो तय कर रहा है। और जो आदमी रात में तय करता है, वो सुबह से पहले कुछ करता है।"
मैं जुगनू के पास गया। कार्टन का टुकड़ा अब नामों से भरा हुआ था। तीन तरफ़ से, दोनों तरफ़ से, ऊपर तक।
"कितने?" मैंने पूछा।
"मैंने गिनना छोड़ दिया," जुगनू ने कहा। "पर एक सौ सैंतालीस लोगों ने नाम लिखवाया है। तेरह लोगों ने नहीं लिखवाया।"
"कौन?"
"तीन तो वो हैं जो देवा की गाड़ी के पास खड़े थे," उसने कहा। "बाक़ी दस वो हैं जिनके हाथ काँप रहे थे।"
मैं मुस्कुराया।
"अच्छा," मैंने कहा। "जो हाथ काँपा, वो कल आएगा। और जो नहीं काँपा, वो याद रखेगा कि उसने क्या खोया।"
मैंने कार्टन का टुकड़ा उठाया। मैंने उसे देखा। उसमें एक नाम ऐसा भी था जो टूटे हाथों से लिखा गया था — महेंद्र यादव। चाचा ने खुद लिखा था। अपने हाथ से। मेरे सामने।
मैंने उसे मोड़ा और जुगनू को दिया।
"ये काग़ज़," मैंने कहा, "किसी और के हाथ में नहीं जाएगा। तेरे पास रहेगा। तू सोएगा साथ में। तू नहाता है तो मेरे पास देकर जाएगा। समझा?"
जुगनू ने सिर हिलाया।
"और बल्लू," मैंने कहा, उसकी तरफ़ मुड़कर। "तू इस काग़ज़ की एक नक़ल करवा देगा। कल सुबह सात बजे, लाला जी की दुकान पर। और वो नक़ल तू अपनी जेब में रखेगा, और असली तू जुगनू की जेब में।"
बल्लू ने पान का कटोरा एक तरफ़ रखा।
"अर्जुन," उसने कहा। "मेरी एक बात सुन।"
"बोल।"
"अगर कल मैं थाने पहुँचा, और मुझसे कोई पूछे कि उस रात मैंने कालू को देखा था या नहीं — तो मैं हाँ कहूँगा। पहली बार।"
उसका मुँह काँपा।
"डर लग रहा है?" मैंने पूछा।
"बहुत," उसने कहा।
"अच्छा," मैंने कहा। "डर के साथ बोलना। डर के बिना बोलने वाला आदमी अदालत में झूठा लगता है। और तू झूठा नहीं लगेगा।"
उसने कुछ कहना चाहा, फिर चुप हो गया, फिर ज़ोर से सिर हिलाया और अपना पान मुँह में डाल लिया।
रुक्मा दीदी मेरे पास आई। उसके हाथ में कपड़ा था।
"ये ले," उसने कहा। "इसी में चाबी लपेट। जेब में सीधी मत रख। जेब में रखेगा तो कोई कंधा मारेगा और चाबी गिर जाएगी।"
मैंने चाबी उस कपड़े में लपेटी।
"और सुन," उसने कहा। "ये चाबी अब तेरे पास नहीं रहेगी।"
"क्या मतलब?"
"अब ये चाबी काग़ज़ बन गई है," उसने कहा। "इसका सबूत बनना है। तू इसकी तस्वीर खिंचवा, इसकी पर्ची लिखवा, इसका लिफ़ाफ़ा बनवा, उस पर तारीख़ डाल, और सुबह दस बजे इसे थाने में जमा कर। तेरी जेब में रही तो ये चाबी रहेगी। थाने में गई तो सबूत हो जाएगी।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"तूने ये कहाँ से सीखा?"
"ग्यारह साल से एक ढाबा चला रही हूँ," उसने कहा। "यहाँ रोज़ कोई न कोई झूठ बोलता है। और जो झूठ काग़ज़ पर आ जाए, वो सच बन जाता है। इसीलिए मेरी कॉपी में हर आदमी का हिसाब है।"
मैंने सिर हिलाया।
मैंने नैना को बुलाया।
"तेरे पास वो छोटा गोल लेंस है?"
"है," उसने कहा।
"तो चाबी की तस्वीर खींच। मेरी उँगली के साथ। जिससे अदालत में पता चले कि ये कितनी छोटी है। और एक तस्वीर सिर्फ़ चाबी की। और एक तस्वीर रुमाल की, कढ़ाई के साथ।"
"रोशनी कम है," उसने कहा।
"तो गाड़ी की हेडलाइट जला," मैंने कहा। "उसका पीला उजाला सबसे साफ़ होता है।"
हमने वही किया।
नैना ने गाड़ी की हेडलाइट के सामने चाबी रखी, मेरी उँगली के साथ। उसने तीन तस्वीरें खींचीं।
और उस दौरान मैं वहीं खड़ा रहा, और मेरे अंदर एक आवाज़ चल रही थी — वो आवाज़ जो अब तक मेरे अंदर हर बार चलती थी जब कुछ बड़ा होने वाला होता था।
पापा की घड़ी।
मैंने कलाई देखी। घड़ी पाँच मिनट आगे थी। हमेशा की तरह।
उस वक़्त रात के ग्यारह बजकर पैंतालीस मिनट हुए थे। यानी घड़ी के हिसाब से ग्यारह बजकर पचास।
और मुझे सिमरिया जाना था।
मैंने चारों तरफ़ देखा। भीड़ छँट रही थी। लोग अपनी गाड़ियों की तरफ़ जा रहे थे, कुछ मेरे पास आकर हाथ जोड़ रहे थे, कुछ कुछ कह रहे थे जो मैं सुन नहीं रहा था। एक बूढ़ा ड्राइवर मेरे पास आया और उसने मेरा कंधा थपथपाया। बस थपथपाया, कुछ कहा नहीं। और चला गया।
अमरीक सिंह अपनी गाड़ी के पास खड़े थे, पर गाड़ी अब मेरे पास थी, इसलिए वो बल्लू की मोती के पास खड़े थे और कुछ सोच रहे थे।
मैं उनके पास गया।
"अमरीक भाई।"
"हाँ।"
"गाड़ी मैं ले जा रहा हूँ।"
"ले जा।"
"और कल…"
"कल मैं दस बजे पहुँच जाऊँगा," उन्होंने कहा। "तू चिंता मत कर। मैंने ग्यारह साल में बहुत झूठ बोला है। अब एक सच बोलने की बारी है। और सच बोलने में देर नहीं करनी चाहिए, क्योंकि सच भी बासी हो जाता है।"
मैंने उनका हाथ पकड़ा। उन्होंने दबाया नहीं, बस हाथ छोड़ दिया।
मैं गाड़ी की तरफ़ बढ़ा।
कबीर दरवाज़े के पास खड़ा था। उसके हाथ में साइकिल की चाबी थी और वो उसे घुमा रहा था।
"तू साइकिल से आया था?" मैंने पूछा।
"हाँ।"
"तो साइकिल यहीं छोड़ दे। गाड़ी में चल।"
उसने एक पल मेरी तरफ़ देखा।
"तू मुझे ले जा रहा है?"
"मेरे पास वक़्त नहीं है," मैंने कहा। "और तेरे पास वो चाबी है जो मेरे पास नहीं है। इसलिए हाँ, मैं तुझे ले जा रहा हूँ।"
उसने साइकिल एक तरफ़ खड़ी की और चाबी जेब में डाली।
नैना पीछे की सीट पर बैठी।
मैंने लालटेन उठाई।
रुक्मा दीदी आख़िरी में आई।
उसने मेरी मुट्ठी पर हाथ रखा। उसका हाथ गरम था, कड़ाही जैसा।
"अबकी बार जब लौटे," उसने कहा, "तो गुस्से में न लौट। हिसाब लेकर लौट।"
"हिसाब लेकर ही लौटूँगा," मैंने कहा।
"नहीं," उसने कहा। "तू मेरी बात पूरी सुन। हिसाब लेकर लौट, पर गुस्सा घर पर छोड़कर जा। क्योंकि गुस्सा साथ ले जाएगा तो वहीं रह जाएगा।"
मैंने सिर हिलाया।
मैं गाड़ी में बैठा।
दरवाज़ा बंद किया।
चाबी घुमाई।
और इंजन ने वही आवाज़ दी — वो आवाज़ जिससे ये दस मिनट शुरू हुए थे। जैसे कोई आदमी उठने से पहले एक बार कराहता है।
मैंने गाड़ी आगे बढ़ाई।
सामने सड़क थी, धूल थी, और सड़क के आगे पुराना पुल।
और उस पुल के तीसरे खंभे के नीचे, दूर, एक छोटी रोशनी दिख रही थी।
लालटेन।
जो किसी ने मेरे पहुँचने से पहले जलाई थी।
और अब मैं जानता था कि उस रोशनी के पीछे कौन था। वो वही आदमी था जिसकी जेब से आज रात सफ़ेद रुमाल गिरा था, और जिसकी चाबी अब मेरी जेब में कपड़े में लिपटी थी।
और उस शहर में सबको पता था कि हर बड़े फ़ैसले से पहले वो भी उसी पुल पर आता है।
क्योंकि मैंने उसकी आवाज़ सुनी थी — नहीं, उसकी गाड़ी की आवाज़ सुनी थी — जब वो सिमरिया से दिल्ली लौट रहा था।
और उस गाड़ी की आवाज़ में एक चीज़ थी जो मैंने पहले कभी नहीं सुनी थी।
उसका साइलेंसर नया था।
नया साइलेंसर धीमी आवाज़ करता है। पर उसके नीचे, बहुत नीचे, पुराने पाइप की एक घरघराहट बची रहती है।
और वो घरघराहट मैंने उस रात पहली बार नहीं सुनी थी।
मैंने गाड़ी की रफ़्तार बढ़ाई।
लालटेन की रोशनी पास आने लगी।
और मेरे अंदर एक आवाज़ थी, बहुत साफ़ — पापा की घड़ी की नहीं, मेरी अपनी।
वो कह रही थी — देख लेना। लालटेन जलाने वाला इंतज़ार कर रहा है। पर वो इस बात का इंतज़ार नहीं कर रहा है कि मैं आऊँ।
वो इस बात का इंतज़ार कर रहा है कि मैं क्या लेकर आया हूँ।
और मैं उसके पास वो लेकर जा रहा था जो उसने अपनी अलमारी में सबसे अंदर छिपाकर रखा था।
एक छोटी पीतल की चाबी।
जो अब काग़ज़ बनने वाली थी।
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