A Dark Secret – Chapter 269
"पता है," उसने कहा। "पर तू भी उसे मारने मत देना। न अपने हाथ से, न अपने गुस्से से।"
उसने गिलास मेरी तरफ़ बढ़ाया।
मैंने पानी पिया। पानी में भी उस ढाबे की बू थी — धुआँ, मसाला और मिट्टी का तेल।
मैं बाहर लौटा।
भीड़ अब जुगनू के तीनों तरफ़ जमा थी। कार्टन का टुकड़ा ज़मीन पर रख दिया गया था और लोग उस पर एक-एक करके हाथ से नाम लिख रहे थे। किसी की लिखाई टेढ़ी थी, किसी की टूटी। एक बूढ़े ड्राइवर ने पेंसिल माँगी, फिर बोला, "मेरा हाथ काँपता है, तू मेरा नाम लिख दे। पर मेरा नंबर मत भूलना — चार पाँच नौ, सात दो एक।"
जुगनू लिखता गया।
तभी एक औरत आगे आई। दुबली, सिर पर सूती दुपट्टा, हाथ में फटा हुआ थैला।
"मेरा नाम सुनीता," उसने कहा। "मेरे पति की गाड़ी थी छह तीन आठ, चार सात एक।"
जुगनू ने लिखना शुरू किया।
"वो ड्राइवर थे," सुनीता ने कहा। "अब नहीं हैं। पर उनकी गाड़ी का नंबर अभी भी मेरे नाम पर चलता है, और मैं खुद चलाती हूँ। उस नंबर को भी लिख लो।"
जुगनू ने लिखा।
मैंने नैना की तरफ़ देखा। उसका कैमरा अभी ऊँचा था। लाल बत्ती जल रही थी।
उसकी बैटरी पर मैंने नज़र डाली। वो चौथाई बची थी।
नैना ने मुझे देखा और होंठ हिलाए — "चल जाएगा।"
मैंने सिर हिलाया।
भीड़ अब शोर नहीं कर रही थी। अब वो धीमी थी। और उस धीमेपन में मुझे एक चीज़ सुनाई दी।
एक आवाज़, बहुत हल्क़ी — जैसे चाँदी की कड़ी किसी लोहे से टकराए। पर मैं कह नहीं सकता था कि कहाँ से आई।
मैं मुड़ा।
और उस वक़्त मैंने देखा।
भीड़ के दूसरे किनारे पर, ढाबे के दरवाज़े की तरफ़, कुछ सफ़ेद हिला। एक रुमाल। सफ़ेद कपड़ा, हल्का नीचे लटका हुआ — और वो रुमाल एक शर्ट की जेब से आधा बाहर निकला था।
वो शर्ट सफ़ेद थी। वो चाल थी लंगड़ी। वो कदम दरवाज़े की तरफ़ खिसक रहे थे — धीरे, बिना हड़बड़ी के, जैसे कोई आदमी भीड़ में से निकल रहा हो, किसी को दिखे बिना।
मंसूर अली।
मेरे पैरों ने खुद सोच लिया। मैंने नैना की कलाई पकड़ी।
"दरवाज़ा," मैंने कहा।
"क्या?"
मैंने इशारे से दिखाया।
नैना ने देखा।
"कैमरा वहाँ नहीं पहुँचेगा," उसने कहा। "भीड़ बहुत घनी है।"
"फिर भी रख," मैंने कहा।
मैं आगे बढ़ा। चार क़दम भी नहीं चल पाया था कि भीड़ का एक जना मेरे कंधे से टकराया और मैं एक तरफ़ झुक गया।
जब मैं संभला, मंसूर अली दरवाज़े के पास बिल्कुल था। उसका कंधा दरवाज़े की सलाख से टकराया और वो एक पल रुका।
और उसी पल जुगनू वहाँ पहुँच गया।
मुझे नहीं पता वो वहाँ कैसे पहुँचा। शायद वो मेरे पीछे ही रहा होगा। शायद उसने मेरी आँखों में कुछ देखा होगा। जुगनू में एक बात थी — वो मेरी आँखें पढ़ लेता था, बिना बोले।
वो ज़मीन पर झुका।
और जब उठा, उसके हाथ में सफ़ेद रुमाल था।
मंसूर अली दरवाज़े से बाहर निकल चुका था।
जुगनू मेरे पास भागा और उसने रुमाल मेरी हथेली पर रख दिया।
वो रुमाल गीला था। उस पर कढ़ाई का धुँधला निशान था — वही निशान जो चार आदमियों की पुरानी फोटो में दिखा था। और रुमाल के एक कोने से एक छोटी चाबी बँधी थी, एक पतले सूती धागे से, दो गाँठ में।
मैंने उसे उँगलियों में उठाया।
छोटी चाबी। मेरी छोटी उँगली के जोड़ जितनी। पीतल की। दाँते घिसे हुए, जैसे बहुत साल एक ही ताले में घूमे हों। सिरे पर एक धुँधला अंक, जो मिट गया था।
मेरा हाथ ठंडा हो गया।
क्योंकि ये चाबी मैंने कहीं सुनी नहीं थी — मैंने इसे टटोला था। हरी लोहे की अलमारी के अंदरूनी ताले में। जब कबीर ने अपना पेचकस डालकर अलमारी का बाहरी ताला खोला था, तब अंदर एक दूसरा ताला मिला था। बाहरी ताला नकली था। असली ताला अंदर था। और उस असली ताले में कोई चाबी नहीं लग रही थी।
अमरीक सिंह ने उस शाम मंच पर कहा था — "अलमारी के अंदरूनी ताले की चाबी मंसूर के पास है।"
और अब वो चाबी मेरी हथेली पर थी।
मैंने उसे रुमाल से खोला। मेरे हाथ काँप रहे थे और मुझे ये पसंद नहीं आया। मैंने एक गहरी साँस ली और उसे अपनी कमीज़ की जेब में डाला।
"जुगनू," मैंने कहा।
"हाँ।"
"ये रुमाल तूने कहाँ से उठाया?"
"वहीं से," उसने कहा। "दरवाज़े के पास, जहाँ वो अंकल गए थे। ज़मीन पर पड़ा था।"
"किसी ने देखा?"
"देखा तो बहुत लोगों ने," जुगनू ने कहा। "पर समझा नहीं। समझते तो छीन लेते।"
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा।
"तू ठीक है?"
"मैं ठीक हूँ," उसने कहा। "बस मेरा हाथ काँप रहा है।"
"अच्छा है," मैंने कहा। "काँपता रहने दे। जो आदमी ऐसे वक़्त में नहीं काँपता, वो या तो बहुत बहादुर है या बहुत बेवकूफ़। और तू दोनों नहीं है।"
उसने हँसने की कोशिश की और हँसी आधी छूट गई।
तभी मुझे वो आवाज़ फिर सुनाई दी।
गाड़ी का दरवाज़ा। बहुत हल्का। इतना हल्का कि शोर में कोई नहीं सुनता। पर मैंने सुना — जैसे लोहे की अलमारी का दरवाज़ा बंद होता है, धीरे से, जिससे किसी को पता न चले।
मैंने सिर उठाया।
ढाबे के बाहर, सड़क के किनारे, वो सफ़ेद गाड़ी खड़ी थी। उसका इंजन पहले से चालू था — उसकी आवाज़ इतनी नरम थी कि मुँह पर कपड़ा रखे हुए लगती थी।
गाड़ी के पास गोलू खड़ा था। और गाड़ी के अंदर, पिछली सीट पर, खिड़की के शीशे के पीछे, देवा भाई।
उनका सफ़ेद कुर्ता था। उनकी सोने की अंगूठी थी। उनका एक हाथ खिड़की के किनारे रखा था।
और वो मुझे देख रहे थे।
मैंने आँख नहीं झुकाई। उन्होंने भी नहीं।
हम दोनों ने एक-दूसरे को देखा। सड़क की धूल, भीड़ का शोर, अड़सठ गाड़ियों की हेडलाइट, और उस सबके बीच दो आदमी, एक-दूसरे को देखते हुए, बिना हिले।
उनका चेहरा वैसा ही था — मीठा, शांत। पर उस शांति में एक दरार थी। उनकी उँगली, जो खिड़की के किनारे रखी थी, उसका सिरा हल्का-हल्का काँप रहा था। बहुत हल्का। इतना हल्का कि कोई नहीं देखता।
मैंने देखा।
क्योंकि मैंने उससे पहले भी काँपती उँगलियाँ देखी थीं — ऑफ़िस की हरी अलमारी के नीचे, नीलामी वाले हॉल में, जब वो पीतल का बोर्ड उतरवा रहे थे।
मैंने उनकी तरफ़ कोई इशारा नहीं किया। न हाथ उठाया, न सिर हिलाया।
बस खड़ा रहा।
और उन्होंने धीरे से अपना हाथ खींच लिया।
फिर मैंने उनके होंठ हिलते देखे।
उनके पास खड़ा आदमी झुका, सुनने के लिए।
और देवा भाई ने वही शब्द दोहराए जो उन्होंने उस शाम गोलू से कहे थे। मैंने उनके होंठ नहीं पढ़े। मैंने कुछ और सुना।
मैंने खिड़की के शीशे को ऊपर जाते सुना। वो एक चीज़ नहीं थी — वो सुने जाने वाली थी। शीशा ऊपर जाते वक़्त एक सीधी, बराबर आवाज़ करता है। जब अच्छा शीशा हो तो। और उस गाड़ी का शीशा अच्छा था। वो बिना चरमराए ऊपर गया और एक हल्के टक से बंद हुआ।
फिर गाड़ी आगे बढ़ी।
उसका इंजन वैसा ही नरम था। टायर सड़क पर से गए और उनकी आवाज़ धूल में घुल गई।
मैं वहीं खड़ा रहा। धूल मेरे चेहरे पर उड़ी और मैंने आँख नहीं झपकी।
नैना मेरे पास आई। उसका कैमरा अब भी चालू था।
"उसने क्या कहा?" उसने पूछा।
"बहुत धीरे कहा," मैंने कहा। "पर मैंने सुना।"
"क्या सुना?"
"यही कि अब इसे अंदर नहीं, बाहर निपटाना है।"
नैना ने कुछ नहीं कहा। उसने अपना चश्मा ऊपर धकेला और कैमरा बंद कर दिया। फिर उसने अपनी छाती से लगाकर कैमरा पकड़ा, दोनों हाथों से, जैसे कोई बच्चा पकड़ता है।
"उसने ये दूसरी बार कहा है," वो धीरे से बोली।
"हाँ," मैंने कहा।
"मतलब वो डर गया है।"
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