A Dark Secret – Chapter 275
सफ़ेद कुर्ता-पाजामा। सोने की अंगूठी। चश्मा जेब में। चेहरे पर वही शांति जो उनके चेहरे पर हमेशा होती है — जैसे उन्होंने दुनिया को माफ़ कर दिया हो।
मैंने उनकी उँगली देखी।
उनका दायाँ हाथ मेज़ पर था, और उनकी तर्जनी धीरे-धीरे मेज़ पर थप-थप कर रही थी। इतनी धीमी कि सिर्फ़ वही सुन सकता था जो सुनने की आदत रखता है।
थप।
थप।
थप।
मैंने सोचा — देवा भाई, आपकी उँगली आपके चेहरे से ज़्यादा सच बोल रही है।
कबीर सबसे पीछे बैठा था।
और मैंने देखा — देवा की नज़र एक बार पीछे गई, कबीर पर पड़ी, और ऐसे हट गई जैसे किसी ने किसी काग़ज़ पर से नज़र हटाई हो।
अंदर कुछ और भी था जो मुझे तब समझ नहीं आया, बहुत बाद में आया।
मजिस्ट्रेट आए।
उम्र पचास के आसपास। पतला चेहरा। सफ़ेद शर्ट। सामने मेज़ पर तीन फाइलें, पानी का एक मिट्टी का गिलास, और एक छोटी पीतल की घंटी।
उन्होंने बैठकर चश्मा पहना।
"एक-एक करके," उन्होंने कहा। "जल्दी। इस कमरे में मुझे सिर्फ़ काग़ज़ सुनना है, भाषण नहीं।"
फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"नाम?"
"अर्जुन यादव।"
"काम?"
मैंने एक पल सोचा।
"ट्रक मैकेनिक," मैंने कहा। और फिर, धीरे से, "और मज़दूर।"
कमरे में हल्की हलचल हुई।
देवा का वकील उठा।
लंबा आदमी, चमकता चेहरा, काले कोट की कली बहुत साफ़, हाथ में चमड़े का पोर्टफोलियो जो हर वक़्त खुला रहता था। वो पहले मजिस्ट्रेट की तरफ़ मुस्कुराया, फिर मेरी तरफ़।
"माई लॉर्ड," उसने कहा। "माफ़ कीजिए, मैं सिर्फ़ रिकॉर्ड के लिए पूछ रहा हूँ। ये सज्जन अपने आपको मज़दूर कह रहे हैं। और साथ ही एक लाख से ज़्यादा के काग़ज़ात अदालत में पेश कर रहे हैं। मैं यही समझना चाहता हूँ कि एक मज़दूर के पास इतने काग़ज़ कहाँ से आए?"
कमरे में कोई नहीं हँसा।
लेकिन वकील हँसा। अपनी हँसी पर खुद हँसा, वैसे जैसे बड़े लोग अपने मज़ाक पर पहले खुद हँसते हैं, ताकि बाकी लोगों को हँसना पड़े।
मैं मुस्कुराया।
"साहब," मैंने कहा। "काग़ज़ मज़दूर के पास ही आते हैं। जिनके पास ज़मीन होती है, उनके पास काग़ज़ होते हैं। जिनके पास ज़मीन नहीं होती, उनके पास सिर्फ़ रसीदें होती हैं। और रसीदें ही तो काग़ज़ हैं।"
वकील की मुस्कान ज़रा सी रुकी।
"और हाँ," मैंने कहा। "जी साहब, मज़दूर ही हूँ। और यही मेरी सबसे बड़ी डिग्री है। मेरे पास कोई और डिग्री नहीं है — न कोई बड़ा स्कूल, न कोई बड़ा दफ़्तर। लेकिन इस कमरे में जितने काग़ज़ आज सामने रखे जाएँगे, उनमें से ज़्यादातर मैंने अपनी उँगलियों से उठाए हैं। और मेरी उँगलियाँ ऐसी ही हैं।" मैंने अपने हाथ उठाए। "धोने से भी साफ़ नहीं होतीं।"
मजिस्ट्रेट ने एक पल मेरे हाथ देखे।
फिर उन्होंने कहा, "वकील साहब, आप अपनी आपत्ति काग़ज़ आने के बाद रखिए। अभी नाम चल रहा है।"
वकील बैठ गया।
"अगला," मजिस्ट्रेट ने कहा।
तिवारी खड़ा हुआ।
उसने अपनी पूरी फाइल उठाई।
वो उसे लेकर आगे आया और मेज़ पर रख दिया। फाइल मोटी थी — बहुत मोटी। जैसे कोई चार साल की नींद से उठकर आई हो।
"सर," उसने कहा। "ये मेरी फाइल है। ये सारी रिपोर्टें मेरे पास हमेशा से थीं।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"हमेशा से?" मैंने कहा।
"हाँ, हमेशा से," उसने मेरी तरफ़ देखकर कहा, और उसकी मूँछ में वही सरकारी लहज़ा था जो हमेशा होता है। "काग़ज़ पर सब लिखा है बेटा।"
"सर," मैंने कहा। "मैं आपका बेटा नहीं हूँ। मैं रघुवीर यादव का बेटा हूँ। और वो काग़ज़ कल तक थाने की दराज़ में थे। आज अदालत में हैं। इसके बीच जो हुआ, वो भी काग़ज़ पर लिखा है।"
तिवारी ने मेरी तरफ़ देखा।
बहुत देर तक देखा।
और मैंने उसकी आवाज़ सुनी — नहीं, मैंने उसकी साँस सुनी। उसकी साँस में वो काँप नहीं थी जो झूठ में होती है। उसमें वो थकान थी जो सच को छिपाते-छिपाते आ जाती है।
वो कुछ नहीं बोला।
मजिस्ट्रेट ने फाइल खोली।
और फिर वो तारीख़ें पढ़ने लगे।
"सत्ताईस सितंबर — मोती, चालक बलदेव सिंह, ब्रेक फेल।"
बेंच पर कहीं से एक आवाज़ आई — किसी ने बल्लू का नाम सुना और हल्का सा धक्का दिया। बल्लू सबसे आगे बैठा था। उसका लंगड़ाता पैर सीधा किया हुआ। वो सामने देख रहा था, और उसके होंठ हिल रहे थे, जैसे वो कोई दुआ पढ़ रहा हो।
"सत्ताईस अगस्त — गाड़ी नंबर छह छह नौ दो, चालक की मौके पर मौत।"
मैंने पीछे की तरफ़ काग़ज़ का सरसराहट सुनी।
"सत्ताईस जुलाई — गाड़ी नंबर चार दो छब्ब एक, हादसा।"
मेरा शरीर ठंडा हो गया।
चार दो छब्ब एक।
वही गाड़ी।
वही गाड़ी जो मेरी कॉपी में सात जगह है। वही गाड़ी जो पापा की डायरी में लाल घेरे में है। वही गाड़ी जिसका दोहरा बीमा दावा कबीर की फाइल में था।
मैंने अपनी कॉपी खोली।
और मैंने ऊँगली से पन्ने पलटे — सत्रह, तेईस, अट्ठाईस। और मैंने वो सब अपने आगे रख दिया, सीधा, जैसे रुक्मा दीदी ने कहा था।
मजिस्ट्रेट पढ़ते रहे।
"सत्ताईस जून। सत्ताईस मई। सत्ताईस अप्रैल।"
वो रुके।
उन्होंने चश्मा उतारा।
"तिवारी," उन्होंने कहा। "ये तारीख़ें किसने लिखी हैं?"
"सर, रिपोर्ट पहले से छपी आती है।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
इतना गहरा सन्नाटा कि मुझे तीसरे पंखे की ढीली बेल्ट की चीख साफ़ सुनाई दी।
"पहले से छपी आती है," मजिस्ट्रेट ने दोहराया।
"जी सर। हमें सिर्फ़ नाम और गाड़ी का नंबर भरना होता है।"
देवा के वकील ने अपनी कुर्सी पर हल्का सा सरका।
और मैंने देवा भाई की उँगली देखी।
थप।
थप।
थप।
अब तेज़।
बहुत हल्का तेज़। कोई और नहीं सुन रहा था। लेकिन मैं सुन रहा था।
मजिस्ट्रेट ने मेरी तरफ़ देखा।
"तुम्हारे पास क्या है?"
मैं उठा।
और मैंने अपना थैला मेज़ पर रखा।
धीरे।
फिर मैंने एक-एक करके चीज़ें निकालनी शुरू कीं।
"ये सात बीमा पर्चियाँ हैं, सर," मैंने कहा। "ये सब सत्ताईस सितंबर की हैं। अलग-अलग साल की। एक भी नाम नहीं है इन पर।"
मैंने उन्हें एक कतार में रख दिया।
"ये आठवीं पर्ची है। ये नई है। इस पर सत्ताईस नहीं, इक्कीस सितंबर की मुहर है।" मैंने उसे सबसे आगे रखा। "और इस पर गाड़ी नंबर चार दो छब्ब एक लिखा है। रकम चार लाख उन्नीस हज़ार।"
वकील उठा।
"आपत्ति, माई लॉर्ड। ये पर्चियाँ कहाँ से आईं, इसका कोई हिसाब नहीं—"
"बैठिए," मजिस्ट्रेट ने कहा।
वकील बैठ गया।
मैंने तीसरी चीज़ निकाली।
"ये पापा की डायरी है, सर। काली जिल्द वाली। इसमें सत्ताईस तारीख़ की लाइनें हैं। और यहाँ—" मैंने पन्ना पलटा, "—यहाँ इसी गाड़ी चार दो छब्ब एक पर लाल घेरा है। और पापा ने नीचे लिखा है — ये गाड़ी नहीं, सबूत है।"
मैंने डायरी खोलकर रख दी।
"और ये, सर।" मैंने आख़िरी चीज़ निकाली। "ये काग़ज़ राठौर लॉजिस्टिक्स के हैं। इन पर भी सत्ताईस सितंबर है। और इन पर ये निशान है — नीला गोल।"
मैंने उसे सबसे ऊपर रखा।
"ये बयालीस काग़ज़ हैं, सर। मैंने रात भर में गिने हैं। इनमें से उनतालीस पर सत्ताईस सितंबर है। और तीन पर तारीख़ ही नहीं है — जैसे तारीख़ की ज़रूरत ही न पड़ी हो, क्योंकि हर महीने की सत्ताईस तारीख़ वैसे ही आती है।"
कमरा चुप।
पूरा कमरा।
लेकिन चुप्पी में भी आवाज़ें होती हैं — मैं उन्हें सुन सकता हूँ। बल्लू का पैर ज़मीन पर खिसकना। रुक्मा दीदी की साँस। नैना के कैमरे का हल्का हम। जुगनू का नंगा पैर लकड़ी पर।
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