A Dark Secret – Chapter 267
भीड़ में एक आवाज़ आई — "अर्जुन, अगर वो तुम्हें रास्ते में रोकें तो?"
मैं मुस्कुराया।
मुझे पता है वो मुस्कान कैसी दिखी होगी। ठीक वैसी नहीं जैसी ढाबे पर चाय पीते वक़्त दिखती है।
"मुझे अगर कोई रोकेगा," मैंने कहा, "तो वो पहले जुगनू को रोकेगा। जुगनू को रोकने के लिए उसे रात भर ये ढाबा घेरकर बैठना पड़ेगा। और अगर वो सच में रात भर यहाँ बैठा तो फिर वो उस गाड़ी को नहीं रोक पाएगा जो चार बजे यहाँ से निकलेगी।"
इस बार भीड़ में हँसी आई।
पहली बार उस शाम, हँसी आई।
मैंने माइक नीचे किया।
चाचा वहीं खड़े थे। वो मेरी तरफ़ देख रहे थे।
मैं उनके पास आया।
"तुम आज घर जाओ," मैंने कहा। "चाची को बताओ। बिटिया को बताओ।"
"अर्जुन," उन्होंने कहा। आवाज़ फटी हुई। "मैं…"
"आज कुछ नहीं," मैंने कहा। "आज तुम घर जाओ।"
उन्होंने सिर हिलाया।
वो मंच से उतरे। सीढ़ियाँ चरमराईं। वो भीड़ के बीच से निकले। इस बार भी लोग हटे, पर इस बार किसी ने उनके कंधे पर हाथ नहीं रखा।
वो ग़ायब हो गए।
मैंने नैना की तरफ़ देखा।
"रिकॉर्डिंग चालू थी ना?" मैंने पूछा।
"तीन बजे से," उसने कहा।
"तो अब देवा भाई के पास कोई रास्ता नहीं बचा," मैंने कहा। "सिर्फ़ एक।"
"कौन सा?"
मैंने ढाबे के बाहर की तरफ़ देखा। उस अंधेरे की तरफ़ जिसमें देवा भाई की गाड़ी ग़ायब हो चुकी थी।
"बाहर निपटाना," मैंने कहा। "और मुझे पता है वो कहाँ निपटाएँगे।"
"कहाँ?"
मैंने अपनी कलाई पर पापा की घड़ी देखी। वो अब भी पाँच मिनट आगे थी। मैंने उसे ठीक नहीं किया।
"वहीं जहाँ हर बड़े फ़ैसले से पहले मैं जाता हूँ," मैंने कहा।
रुक्मा दीदी ने मेरी तरफ़ देखा।
"पुराना पुल," मैंने कहा।
रुक्मा दीदी ने एक लंबी साँस ली।
"जाओ," उसने कहा। "पर पहले चाय पी लो। चाय के बग़ैर मैं किसी को नहीं जाने देती।"
मैं हँसा।
"दीदी," मैंने कहा, "तुम्हारी चाय की एंट्री तो अब कॉपी में है।"
"तो क्या हुआ?" उसने कहा। "कॉपी में लिखने से चाय ठंडी नहीं होती।"
और उसने मेरी तरफ़ एक मिट्टी का कटोरा बढ़ाया।
मैंने उसे थामा।
कटोरा गरम था।
दस साल बाद भी, मुझे आज भी लगता है कि उस शाम की चाय का स्वाद मुझे आज भी मुँह में रहता है। क्योंकि वो सिर्फ़ चाय नहीं थी।
वो वो पल था जब मुझे पता चला कि मेरे पास अब सिर्फ़ सच नहीं, बहुत सारे लोग हैं।
और बहुत सारे लोग होने का मतलब ये है कि देवा भाई अब सिर्फ़ एक आदमी से नहीं, पूरे शहर से लड़ेंगे।
और मैंने कटोरा खत्म किया।
फिर मैंने फोन निकाला।
फोन पर एक ही मिस्ड कॉल थी।
अम्मा की।
बीस मिनट पहले की।
मैंने दबाया।
एक घंटी। दो घंटी। तीन घंटी।
"हाँ बेटा," अम्मा की आवाज़ आई।
"अम्मा," मैंने कहा। "वो डिब्बा — जो पापा ने छोड़ा था। मत खोलना। अभी मत खोलना।"
"क्यों बेटा?"
"क्योंकि मैं आ रहा हूँ," मैंने कहा। "और मैं उसे खुद खोलूँगा। और जब खोलूँगा, तब तुम मेरे साथ रहना।"
अम्मा एक पल चुप रही।
"अच्छा," उसने कहा। "और बेटा — जो आदमी दोपहर में गाँव में आया था। जिसका सफ़ेद रुमाल था। वो अभी भी यहीं है। बस स्टैंड के पीछे। उसने पूछा कि तू कब आएगा।"
मेरा हाथ कस गया।
मंसूर अली।
"अम्मा," मैंने धीरे से कहा, "दरवाज़ा बंद कर लेना। पीछे वाला टूटा दरवाज़ा भी। और किसी को अंदर मत आने देना।"
"मैंने पहले ही लगा दिया है बेटा," अम्मा ने कहा। "मैं सिर्फ़ ये देख रही थी कि तू कब फोन करेगा।"
मेरी आँख भर आई।
"अम्मा," मैंने कहा।
"हाँ बेटा?"
"आज कोई मेरे घर की तरफ़ आए," मैंने कहा, "तो उसे मेरी लाश से पहले तुम्हारी लाश मिलेगी।"
अम्मा एक पल चुप रही।
"बेटा," उसने कहा, "मैं दस साल तक उनकी लाश के साथ जिया हूँ। अब मैं तेरी लाश के लिए नहीं जीऊँगी। तू जल्दी आ। और वो क़सूर — वो अपने दरवाज़े पर चीते की तरह बैठा है। उसने कहा था — सौ बजे से अर्जुन आ ही जाएगा।"
क़सूर।
मन में एक नाम जगा। वो खनन विभाग वाला पतला आदमी, जिसने मुझे तीन आवाज़ें सिखाई थीं, जिसने मेरे पापा की नाम-मिटी रसीद दी थी।
"अम्मा," मैंने कहा, "क़सूर के साथ कोई और है?"
"दो," अम्मा ने कहा। "एक सफ़ेद कुर्ते में। और एक काले कपड़े में।和大 था। काले धागे वाला।"
कालू।
मंसूर और कालू।
दोनों सिमरिया में।
मेरी अम्मा के घर के बाहर।
मैंने आँखें बंद कीं।
और फिर मैंने फोन काट दिया।
मैंने नैना की तरफ़ देखा।
"सिमरिया," मैंने कहा। "अभी।"
नैना ने कैमरा जेब में रखा। रुक्मा दीदी ने मेरी तरफ़ एक लालटेन बढ़ाई। जुगनू ने अपनी बाँह पकड़ ली।
"मैं चलूँगा?"
"तू नहीं," मैंने कहा। "तू यहाँ रुकेगा। तू मेरी आँख है।"
जुगनू ने सिर हिलाया। उसकी आँखें नम थीं, पर वो रोया नहीं।
बल्लू आगे आया।
"मोती अभी ठीक है," उसने कहा। "मैं छोड़ दूँ?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"तू नहीं," मैंने कहा। "तू यहाँ रुक। तेरे बिना ये भीड़ नहीं संभलेगी।"
"तो कौन जाएगा?"
मैंने पीछे मुड़कर देखा।
खाली जगह पर।
किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
मैं मुड़ा।
कबीर।
उसके हाथ में साइकिल की चाबी थी। पसीना उसके माथे पर था। वो दौड़ता हुआ आया था।
"मैं जाऊँगा," उसने कहा।
मैंने उसे देखा।
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"मुझे पता है," उसने कहा। "तू मुझे अभी बर्दाश्त नहीं कर रहा। पर अभी इस वक़्त किसी को भी बर्दाश्त करने का मौक़ा नहीं है। और मेरी गाड़ी में तेल भी है और मेरे पास एक काग़ज़ भी है जिसे मैंने आज तक किसी को नहीं दिया।"
"कौन सा काग़ज़?"
उसने अपनी जेब से एक मुड़ा हुआ पन्ना निकाला।
"मंसूर अली के अलमारी की चाबी का नक़ल मेरे पास है," उसने कहा। "मेरे पास दो साल पहले आया था। मैंने सोचा था बेच दूँगा। पर आज रात इसका इस्तेमाल होगा।"
मैंने उसे पन्ना दिया।
मैंने रुक्मा दीदी की तरफ़ देखा।
उसने मेरी तरफ़ देखा।
उसने मेरी मुट्ठी पर हाथ रखा।
"जा," उसने कहा। "पर अबकी बार जब लौटे, तो गुस्से में न लौट। हिसाब लेकर लौट।"
मैंने सिर हिलाया।
मैंने लालटेन उठाई।
और सिमरिया की तरफ़ निकल पड़ा।
पीछे कबीर था। साथ में नैना थी।
और रास्ते में, पुराने पुल के नीचे, किसी ने एक लालटेन जलाई थी — मैंने देखा, दूर से, एक छोटी रोशनी, तीसरे खंभे के पास, जहाँ से धुआँ उठ रहा था।
कोई मेरा इंतज़ार कर रहा था।
कोई जानता था कि मैं उस रास्ते से ही आऊँगा।
मैंने गाड़ी नहीं रोकी।
मैंने रास्ता नहीं बदला।
क्योंकि पापा की घड़ी अभी भी पाँच मिनट आगे थी।
और मुझे पता था — जो भी उस पुल के नीचे बैठा है, वो उन पाँच मिनट का हिसाब नहीं जानता।
वो इस बात का हिसाब नहीं जानता कि मैंने उसे हिसाब देने के लिए रास्ता नहीं बदला।
मैंने उसे हिसाब लेने के लिए रास्ता नहीं बदला।
वो इस बात का हिसाब नहीं जानता कि उस शाम रातरानी ढाबे पर, चाचा के रोने के बाद, मैंने अमरीक सिंह से एक चीज़ माँगी थी — वो उनकी गाड़ी की चाबी।
और अमरीक ने बिना पूछे दे दी थी।
क्योंकि उनकी गाड़ी का इंजन अब भी ठीक था। और उनके पास अब भी एक और चाबी थी, जो सिर्फ़ एक आदमी के पास हो सकती थी।
और मुझे पता था — वो आदमी अब सिमरिया से दिल्ली लौट रहा है।
उसी पुराने पुल के रास्ते से।
क्योंकि हर बड़े फ़ैसले से पहले, वो भी वहीं आता है।
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