A Dark Secret – Chapter 266
"मैं भागा। मैं गैराज की तरफ़ भागा। मैंने तीन दिन तक घर में घुसने से मना कर दिया। मैं बाहर गली में सोया। क्योंकि घर में मेरी बेटी थी। और मैं उसकी आँखों में देख नहीं पा रहा था।"
भीड़ में कुछ औरतें रो रही थीं। मैंने देखा — एक बूढ़ी औरत अपने बेटे का सिर सहला रही थी, जैसे वो भी कहीं चला गया हो।
"और ये सब आदेश था," चाचा ने कहा। "मंसूर अली आदेश नहीं देता। वो सिर्फ़ हाथ है। आदेश ऊपर से आया था।"
उसने भीड़ को देखा, फिर पीछे मंच के कोने की तरफ़ देखा।
"देवा भाई से भी ऊपर से," उसने कहा।
उस शाम मैंने चाचा को पहली बार देखा, वाक़ई देखा। सस्ती शर्ट, कॉलर से लटकता धागा, वो भूरी चप्पल जो उसने अभी भी हाथ में पकड़ी हुई थी, जैसे उसे उठाकर लाया हो और अब क्या करे, नहीं जानता। उसकी आँखों में वो थकान थी जो तीन साल की नींद के बाद पहली बार सोने से आती है।
मुझे उससे नफ़रत हो रही थी।
और उसी वक़्त…
पता नहीं।
कुछ तो था।
मैं उसका चेहरा नहीं देख पा रहा था और मैं उससे नज़र नहीं हटा पा रहा था। एक साथ।
उसने माइक नीचे किया।
और भीड़ में से कोई बोला — "मंसूर कहाँ है?"
भीड़ हिली। एक हल्की सी लहर, जैसे पानी में पत्थर गिरा हो। सब गर्दनें घूमीं। सब आँखें बाहर की तरफ़ भागीं।
मैं भी मुड़ा।
और मैंने उसे देखा।
भीड़ के बाहर, ढाबे की चारदीवारी के बाहर, सफ़ेद बड़ी गाड़ी के पास, एक आदमी खड़ा था।
देवा भाई।
मैंने उन्हें पहले कभी इस तरह नहीं देखा था।
हमेशा वो सफ़ेद कुर्ता-पाजामा, सोने की अँगूठी, चश्मा जेब में, मीठी आवाज़। हमेशा "बेटा" कहने वाली वो बोली, जिसमें ज़हर घुला होता था पर पता नहीं चलता था।
आज नहीं।
आज उनकी मुस्कान ग़ायब थी।
आज उनके चेहरे पर वो चीज़ थी जिसका नाम मैं नहीं जानता। डर नहीं। गुस्सा नहीं। कुछ और। जैसे कोई आदमी सालों से एक ही रस्सी पर चल रहा हो और अचानक नीचे देख ले कि रस्सी कितनी पतली है।
उन्होंने मंच की तरफ़ नहीं देखा। उन्होंने भीड़ को नहीं देखा। उन्होंने चाचा को नहीं देखा।
उन्होंने मुझे देखा।
एक पल के लिए, बस एक पल। और उस पल में मैंने उनकी आँखों में देखा कि वो अब सब जानते हैं। कि उनका खेल खत्म हो गया। कि अब जो होगा, सिर्फ़ काग़ज़ पर नहीं होगा।
फिर वो पल बीत गया।
देवा भाई ने अपनी गर्दन उस आदमी की तरफ़ नहीं घुमाई — उनका आदमी पहले से उनके पीछे खड़ा था। काले कपड़े में। सोने की ज़ंजीर में। गोलू।
वो देवा भाई के पीछे खड़ा था, हाथ पीछे बँधे, साँस रोके।
देवा भाई एक कदम पीछे हटे। अपने आदमी के पास। मैंने देखा उन्होंने अपना मुँह उसके कान के पास ले जाकर कुछ कहा।
बहुत धीमे। इतना धीमा कि मैं सुन नहीं पाया।
पर मैंने होंठ पढ़े।
मेरे होंठों में वो शब्द अपने आप बन गए, जैसे मैं उस धूल भरी शाम में ढाबे के शोर और कड़ाही की चटकार और भीड़ की साँसों के बीच, बस उन होंठों को देख रहा था।
"अब इसे अंदर नहीं, बाहर निपटाना है।"
गोलू ने सिर हिलाया। उसका हाथ जेब की तरफ़ गया। फिर रुका। फिर नीचे आ गया।
देवा भाई एक कदम और पीछे हटे। फिर दूसरा। फिर तीसरा। भीड़ के बाहर की तरफ़। उनकी गाड़ी का दरवाज़ा पहले से खुला था।
उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
वो गाड़ी में बैठ गए।
दरवाज़ा बंद हुआ — बहुत हल्की आवाज़, बहुत नरम इंजन, वो इंजन जो किसी तरह की जल्दबाज़ी नहीं दिखाता।
गाड़ी चली।
सफ़ेद बड़ी गाड़ी, पीछे नीला गोल निशान, धीरे-धीरे भीड़ को चीरती हुई बाहर निकली, और फिर सड़क पर मुड़ गई, और फिर अंधेरे में।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। फोन निकाला। रुक्मा दीदी ने मेरी तरफ़ देखा।
"माइक चालू है," मैंने धीरे से कहा।
उसने सिर हिलाया।
नैना पहले ही आगे आ चुकी थी। उसका कैमरा अब भी चालू था। उसने मेरी तरफ़ देखा और बिना बोले एक काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया — कुछ लिखा हुआ। मैंने पढ़ा — "देवा के होंठ। तुमने पढ़ा?"
मैंने सिर हिलाया।
उसने फिर लिखा — "क्या?"
मैंने काग़ज़ लिया। उस पर लिखा — "अब इसे अंदर नहीं, बाहर निपटाना है।"
नैना ने पढ़ा। उसके चेहरे पर वो भाव आया जो आता है जब कोई रिपोर्टर समझ जाता है कि उसने एक बहुत बड़ी चीज़ पकड़ी है, और उसी वक़्त ये भी समझ जाता है कि ये बहुत ख़तरनाक है।
उसने काग़ज़ जेब में रखा।
मैं मंच की तरफ़ मुड़ा।
चाचा अभी भी वहीं खड़े थे। माइक उनके हाथ में। वो मुझे देख रहे थे। उनकी आँखों में सवाल था — अब क्या?
मैंने उनकी तरफ़ कदम बढ़ाया।
इस बार रुक्मा दीदी ने मेरा हाथ नहीं पकड़ा।
मैं सीढ़ियाँ चढ़ा। तख़्ता चरमराया। मैंने चाचा के सामने आकर खुद को रोका। मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने सिर्फ़ उनके हाथ से माइक लिया।
चाचा ने छोड़ दिया।
उनका हाथ नीचे गिरा।
मैंने माइक अपने मुँह के पास लाया।
"सबने सुना?" मैंने भीड़ से पूछा।
भीड़ ने सिर हिलाया। किसी ने हाँ नहीं कहा, पर सबने सिर हिलाया।
"आज का दिन अब ऐसे खत्म नहीं होगा," मैंने कहा। "आज यहाँ एक आदमी ने अपना सच बोला है। उसका नाम है महेंद्र यादव। मेरे पापा का भाई। और उसने जो बोला है, उसका पूरा हिसाब अब काग़ज़ पर जाएगा।"
मैंने रुककर भीड़ को देखा।
"देवा भाई अभी यहाँ से गए हैं। उन्होंने सबके सामने सफ़ेद मुँह नहीं दिखाया। वो भागे हैं। मैंने उनके होंठ पढ़े। उन्होंने अपने आदमी से कहा — 'अब इसे अंदर नहीं, बाहर निपटाना है।'"
भीड़ में गुस्से की एक लहर उठी। मैंने हाथ उठाया।
"मैं नहीं चाहता कि कोई आज रात किसी के घर जाए," मैंने कहा। "मैं नहीं चाहता कि कोई आज रात पत्थर उठाए। मैं चाहता हूँ कि कल सुबह सब अपने-अपने ट्रक पर अपना नाम लिखें। जो डरता है, वो न लिखे। जिसका बच्चा छोटा है, वो न लिखे। जिस पर कर्ज़ है, वो न लिखे। पर जो लिखेगा — वो सिर्फ़ नाम नहीं लिखेगा। वो सबके सामने ये बात लिखेगा कि उसने सत्ताईस तारीख़ की रात क्या देखा था।"
मैंने ढाबे के कोने में खड़े बल्लू की तरफ़ देखा।
"बल्लू भाई," मैंने कहा, "तुमने क्या देखा था?"
बल्लू ने आगे कदम बढ़ाया। उसका लंगड़ाता पैर आज और भारी लग रहा था।
"मैंने काले धागे वाले आदमी को अपने ट्रक के पास देखा था," उसने कहा। "उस रात। मैं डर गया था। मैंने किसी को नहीं बताया। दो साल चुप रहा।"
"अब बताओ," मैंने कहा।
"अब बताता हूँ," उसने कहा।
मैंने सुनीता की तरफ़ देखा, जो कोने में खड़ी थी।
"सुनीता दीदी," मैंने कहा, "तुम्हारे पति की गाड़ी कब पलटी थी?"
"दो साल पहले," उसने कहा। "सत्ताईस सितंबर को।"
"किसने कहा था हादसा है?"
"पुलिस ने," उसने कहा। "तिवारी ने। कहा कि ब्रेक फेल हो गया।"
"तिवारी ने आज तक तुम्हें वो रिपोर्ट दी?"
"नहीं," उसने कहा।
मैंने रुक्मा दीदी की तरफ़ देखा।
"रुक्मा दीदी," मैंने कहा, "तुम्हारे भोला के पहिये पर कितने निशान थे?"
"तीन," उसने कहा। "सीधे। समान दूरी पर।"
"पन्नालाल के पहिये पर भी तीन थे," मैंने कहा। "बल्लू के ट्रक की केबल कटी थी। मेरे पापा के पहिये पर भी तीन निशान थे। और आज सबको सुनना है — देवा भाई नहीं चाहते कि ये सब एक जगह बैठे। वो कल सुबह से पहले कुछ करेंगे।"
मैंने भीड़ को देखा।
"मैं एक बात कहता हूँ," मैंने कहा, "जो मेरे साथ रात में चलना चाहता है, वो मेरे साथ चले। जो नहीं चल सकता, वो अपने घर जाए, अपने बच्चों के पास। पर कल सुबह दस बजे जो यहाँ आएगा, मैं उसे वो काग़ज़ दिखाऊँगा जो आज तक मैंने किसी को पूरा नहीं दिखाया। और मैं उसके साथ थाने चलूँगा। टोल नहीं। थाना छब्बीस नंबर।"
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