A Dark Secret – Chapter 265
"सुनो," उसने कहा, "मैं उस रात से पहले का सच बताता हूँ। उस वक़्त मेरे सिर पर कर्ज़ था। बीस हज़ार का। बीस हज़ार उस ज़माने में मेरे लिए… मेरे लिए वो बीस हज़ार पहाड़ था। ब्याज लगता था, ब्याज का ब्याज लगता था। मेरी दुकान का शटर उठता था तो सबसे पहले साहूकार का आदमी आता था। हर सुबह। हर सुबह वही आदमी, वही बात — 'महेंद्र भाई, आज का हिसाब?'"
चाचा की आवाज़ भारी हो रही थी।
"और फिर एक रात देवा भाई का आदमी मेरे घर आया। कालू। तुम सब उसे जानते हो। काले धागे वाला, भौंह पर कटा निशान। उसने मेरे सामने एक लिफ़ाफ़ा मेज़ पर रखा। बीस हज़ार। बिल्कुल बीस हज़ार। कहा — भाई साहब का पैसा है। साहूकार को दे दो।"
उसने अपनी रुकी हुई घड़ी की तरफ़ देखा, जैसे वो उस रात का समय बता रही हो।
"मैंने पूछा, बदले में क्या? कालू हँसा। बोला — कुछ नहीं, बस एक छोटा सा काम। तुम्हारे भाई की गाड़ी है ना? कल रात उसे बाईस नंबर टोल से पहले वाली लाइन पर लगाना है। बस। इतना। मैंने पूछा — गाड़ी का क्या? उसने कहा — कुछ नहीं, उसे रास्ते में रुकना है, देर होनी है, उसी बहाने एक खेप पीछे छूट जाएगी। भाई साहब को डिलीवरी का समय साधना है। इतनी सी बात है। मैं… मैंने…"
उसकी आवाज़ रुँध गई।
"मैंने हाँ कर दी। बीस हज़ार के लिए। अपने भाई की गाड़ी की लाइन बदल दी।"
मेरे हाथ की मुट्ठी बंध गई। नाखून हथेली में घुस गए। मैंने हाथ नीचे नहीं किया।
"मुझे नहीं पता था," चाचा ने कहा। "भगवान मेरी क़सम, मुझे नहीं पता था। मुझे लगा बात ट्रक की देरी की है। कुछ दिन का हिसाब है। किसी को कुछ नहीं होगा। बस एक खेप लेट होगी। मैं उस रात अपनी बेटी के कमरे के बाहर बैठा रहा। सुबह होते ही टोल की तरफ़ भागा। और जब ट्रक पलटा हुआ देखा…"
वो रुका। उसने आँखें बंद कर लीं।
"ट्रक के नीचे मेरा भाई था।"
चुप्पी।
बहुत लंबी चुप्पी। उतनी लंबी कि मुझे लगा मैं उसमें डूब जाऊँगा। कड़ाही का तेल चटक रहा था, पर उसकी आवाज़ भी दूर लग रही थी, जैसे किसी और गली से आ रही हो।
"और मैंने क्या किया?" चाचा ने आँखें खोलकर कहा। "मैंने कुछ नहीं किया। मैं खड़ा रहा। भीड़ में खड़ा रहा। पुलिस आई, मैं वहीं था। रघुवीर की लाश उठाई गई, मैं वहीं था। उसका चेहरा ढका गया, मैं वहीं था। मुझसे कोई कुछ नहीं पूछ रहा था, पर मैं जानता था कि अगर मैंने मुँह खोला, तो सब खत्म। बीस हज़ार का कर्ज़ खत्म हुआ था, पर मेरी ज़िंदगी का कर्ज़ शुरू हो गया था।"
उसने माइक को दूसरे हाथ में लिया, क्योंकि पहला हाथ काँप रहा था।
"देवा भाई ने मुझे इस गैराज पर बैठा दिया। यादव मोटर गैराज। जो मेरे भाई का था, वो मुझे दे दिया। कहा — महेंद्र, अब तू हमारा आदमी है। हर महीने का हिसाब मुझे देना। हर आदमी को जो गैराज पर आए, उसका नाम मुझे बताना। और जब तेरा भतीजा आए…"
वो रुका।
"तो उसे अपने पास रखना।"
मुझे लगा मेरे भीतर कुछ टूटा।
"मैंने तुम्हें बुलाया, अर्जुन," उसने मेरी तरफ़ देखकर कहा। "मैंने कहा — भईया तेरे पापा ने मेरे लिए क्या किया, अब मैं तेरे लिए करूँगा। और मैंने तुम्हें अपने घर की छत पर कमरा दिया। मैंने तुम्हारे हाथ का खाना खाया। मैंने हर रविवार तुम्हारे साथ बैठकर खाया। और हर रविवार… हर रविवार मैं तुम्हारे चेहरे पर अपने भाई का चेहरा देखता था।"
उसकी आवाज़ टूट गई।
"तुम्हारे पापा जैसे बोलते थे तुम वैसे ही बोलते हो। तुम्हारी हँसी वैसी ही है। तुम अपनी कलाई पर उनकी घड़ी बाँधते हो, वो पाँच मिनट आगे चलती है, जैसे उनकी थी। तुम्हें पता है मैं क्या करता था? जब तुम दुकान पर होते थे, मैं वहाँ से निकल जाता था। दूसरी तरफ़। तुम्हारे सामने खड़ा नहीं हो पाता था।"
"पर तुमने मुझे अपने घर में रखा," मैंने कहा। मेरी आवाज़ मेरे कानों में भी अजीब लगी। बहुत धीमी। बहुत शांत। बहुत ख़तरनाक।
"हाँ," चाचा ने कहा।
"तुमने मुझे अपनी बेटी के सामने बैठाया।"
"हाँ।"
"तुम्हारी बेटी मुझे पापा से बड़ा मानती है," मैंने कहा।
चाचा का चेहरा टूट गया।
"वो…" उसने माइक नीचे किया, फिर ऊपर उठाया, जैसे अब बोलने के लिए उसे माइक की ज़रूरत न हो, बस उसकी आवाज़ बाहर निकलनी है, "वो रोज़ मुझसे पूछती है — पापा, अर्जुन भैया कब आएँगे? अर्जुन भैया ने मुझे गाड़ी की आवाज़ पहचानना सिखाया है। अर्जुन भैया ने कहा है कि मैं बड़ी होकर ड्राइवर बनूँ तो वो अपनी गाड़ी मुझे दे देंगे।"
उसने आँखें पोंछीं। किसी ने उसे रुमाल नहीं दिया। कोई आगे नहीं आया।
"मेरी बेटी तुम्हें उस आदमी से बड़ा मानती है, अर्जुन, जो मेरी क़िस्मत में पापा था। और मैं… मैं उस बच्ची के मुँह पर आज तक नहीं देख पाया। क्योंकि जब वो तुम्हारी तारीफ़ करती है, मुझे लगता है वो मेरे भाई की लाश पर खड़ी होकर मेरी तारीफ़ कर रही है।"
मेरे भीतर कुछ चटका।
मुट्ठी और कस गई। ज़ोर से। इतनी ज़ोर से कि मेरा पूरा बाजू काँपने लगा। मैंने दाँत भींचे। मैंने सुना — ढाबे का शोर, गाड़ियों के हॉर्न, चाय के कटोरे की खनक, सब एक साथ। पर मेरे भीतर एक आवाज़ और थी — पापा की। जो मुझे बचपन में सिखाते थे, बेटा, गुस्सा आए तो पहले दस तक गिन लेना।
मैंने दस तक नहीं गिना।
मैंने बीस तक नहीं गिना।
मैंने उसकी तरफ़ कदम बढ़ाया।
पहला कदम। दूसरा कदम।
और तभी — हाथ।
रुक्मा दीदी का हाथ। मेरी मुट्ठी पर।
उसने मेरी कलाई पकड़ी। कसकर। मुँह से कुछ नहीं बोला। बस पकड़ा।
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
उसकी आँखें सूखी थीं। बिल्कुल सूखी। और उसी में वो सब था जो वो मुझसे कहना चाहती थी — ये भीड़ है। ये काग़ज़ वाला खेल है। यहाँ हाथ उठाया तो सब हाथ उठाएँगे।
मैंने साँस ली। लंबी।
और मेरी मुट्ठी ढीली हो गई।
उसने अभी भी कलाई नहीं छोड़ी।
अच्छा हुआ।
क्योंकि अगर उसने उस वक़्त नहीं पकड़ा होता, तो चाचा उस शाम वहाँ से मंच से नहीं उतरता।
चाचा ने मुझे हाथ नीचे करते देखा। उसने कुछ कहना चाहा, पर उसकी आवाज़ साथ नहीं दी। फिर उसने गला साफ़ किया और माइक में बोला।
"मैं बस एक बात कहने आया था," उसने कहा। "क़ानून मुझे सज़ा देगा या नहीं, मुझे नहीं पता। पर इस भीड़ के सामने एक आदमी को मुँह पर सच बोलना है। जो मैंने किया, वो मैंने किया। मेरे भतीजे ने नहीं। मेरे भतीजे को कोई उँगली नहीं उठानी चाहिए। उसने आज तक मेरी बेटी का पापा मानकर मेरे घर में खाना खाया है। उसे कुछ नहीं पता है। उसे कुछ नहीं पता था।"
उसने सीधा मेरी आँखों में देखा।
"मेरे भाई का बेटा," उसने कहा, "आज तक मेरी इज़्ज़त करता रहा। मैंने उस इज़्ज़त के लायक़ होने के लिए कुछ नहीं किया। मैंने वो कर्ज़ उतारने की कोशिश भी नहीं की जो उसके पापा ने मेरे लिए चुकाया था।"
वो फिर रुका। उसने माइक को दोनों हाथों से पकड़ा, जैसे अब कुछ बोलने के लिए उसे दोनों हाथ चाहिए।
"और अब," उसने कहा, "केबल वाले का नाम।"
भीड़ में सुई गिरने की भी जगह नहीं थी।
"उस रात मंसूर अली ट्रक के नीचे था," चाचा ने कहा। "देवा भाई का सफ़ेद रुमाल, देवा भाई का वो हर आदमी जो आज मंच पर सोने की अंगूठी उठाकर बैठा है, वो आदमी उस रात ट्रक के पिछले पहिये के पास झुका था। मैंने अपनी आँखों से उसे केबल काटते देखा। मैंने कुछ नहीं कहा। क्योंकि मैं उस वक़्त इसलिए चुप था कि मैं खुद उस ट्रक के नीचे था।"
उसकी आवाज़ फट गई।
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