A Dark Secret – Chapter 264
"ये लिफ़ाफ़े मुझे हर महीने मिलते हैं," उसने कहा। "हर महीने की सत्ताईस तारीख़ को। ग्यारह साल से। एक भी महीना नहीं छूटा।"
उसने लिफ़ाफ़ा हवा में उठाया। वो मोटा था, बंद, बिना नाम।
भीड़ में किसी ने कहा, "कितने पैसे?"
"पहले बारह हज़ार पाँच सौ थे," अमरीक ने कहा। "अब भी बारह हज़ार पाँच सौ हैं। मेरे बेटे टिंकू का इलाज चल रहा है। उसका पहला ऑपरेशन पैंतालीस हज़ार का था। मैंने अपनी गाड़ी बेच दी थी, अपनी ज़मीन गिरवी रख दी थी, फिर भी नहीं हुआ। और फिर एक दिन ये लिफ़ाफ़ा आया।"
उसकी आवाज़ टूटी। उसने फिर रुमाल निकाला।
"मैंने सोचा, एक महीना। बस इस महीने। फिर अगले महीने फिर आया। और मैं चुप रहा। मैंने तुम्हारे सामने खड़े होकर कहा कि हम किसी से नहीं डरते, और उसी शाम मेरी जेब में ये लिफ़ाफ़ा होता था।"
सुनीता ने आगे से कहा, "अमरीक भाई, ये लिफ़ाफ़ा देवा देता है?"
अमरीक ने सिर हिलाया, धीरे, दो बार।
"नहीं," उसने कहा। "देवा भाई खुद नहीं देता। मैंने उन्हें कभी लिफ़ाफ़ा देते नहीं देखा। लिफ़ाफ़ा देता है सफ़ेद रुमाल वाला आदमी। जो लंगड़ाता है। मंसूर।"
मेरे अंदर कुछ ठंडा हुआ।
मंसूर अली।
"और एक बात," अमरीक ने कहा। "तुम सब सोचते हो कि देवा का दफ़्तान सबसे ऊपर है। नहीं है। देवा की अलमारी है, पर उस अलमारी का अंदरूनी ताला किसी और के पास है। और उस ताले की चाबी मंसूर की जेब में है। देवा को पता भी नहीं।"
भीड़ में वो आवाज़ आई जो बहुत कम आती है। किसी ने कुछ नहीं कहा, बस शोर अचानक ग़ायब हो गया, जैसे किसी ने रेडियो बंद कर दिया हो।
उस सन्नाटे में एक पतली आवाज़ आई।
"भाषण लंबा, चाय ठंडी।"
सब मुड़े। जुगनू था, उलटे ढोल पर बैठा, हाथ में स्टील के गिलास लिए, और वो चुपचाप लोगों को पानी बाँट रहा था।
किसी को हँसी आई। एक बूढ़े ने कहा, "अरे, ये लड़का कहाँ से आया?"
जुगनू ने बिना रुके कहा, "कंधा बस्ती से। और आपकी गाड़ी की बेयरिंग घरघरा रही है, उसे आज ही दिखवा लीजिए, कल शोर बढ़ेगा।"
वो बूढ़ा हँसा, और उसकी हँसी में कुछ नरमी आ गई। और मुझे लगा कि उस शाम उस हँसी की बहुत ज़रूरत थी। डर भरी भीड़ को तोड़ने के लिए कभी-कभी एक छोटी सी बात काफ़ी होती है।
अमरीक सिंह ने गिलास लिया, एक घूँट पिया, और फिर उसने गिलास वापस नहीं किया। उसने उसे उसी तरह हाथ में पकड़े रखा, जैसे कोई सहारा पकड़ता है।
"दीदी," उसने रुक्मा की तरफ़ देखकर कहा, "मैं जानता हूँ मेरे बोलने का हक़ नहीं है। पर एक बात कहनी है। तुम्हारे भोला की गाड़ी के पहिये पर तीन निशान थे। मेरे पास एक और पहिया है। वो मेरे ही यूनियन के एक आदमी का है, जो ग्यारह साल पहले ग़ायब हो गया था। उसका नाम भोला नहीं था। उसका नाम पन्नालाल था।"
रुक्मा दीदी ने उसे देखा।
"वो यूनियन का मुनीम था," अमरीक ने कहा। "वो रुक्मा के ढाबे पर एक कॉपी देकर गया था। और उसके बाद उसकी गाड़ी बिना चालक पलटी मिली। मैं उस दिन से जानता हूँ कि ये हादसा नहीं है। और मैं चुप रहा, क्योंकि मेरे बेटे का इलाज चल रहा था।"
उसने साँस ली।
"अब नहीं चुप रहूँगा," उसने कहा।
भीड़ में से कोई बोला, "अमरीक भाई, सच बोलो, अब क्या होगा?"
"मुझे नहीं पता," उसने कहा। "पर एक बात का पता है। जिसने मेरे हाथ में ये लिफ़ाफ़ा रखा, वो आज इसी भीड़ में खड़ा है।"
उसने उँगली उठाई।
उँगली हवा में थी, और वो हिल रही थी। वो किसी एक आदमी पर नहीं थी। वो पूरी भीड़ पर फिर रही थी, जैसे कोई तलाश कर रहा हो।
और फिर वो रुकी।
मंच से बहुत दूर नहीं, भीड़ के पीछे, नीम के पेड़ की दूसरी तरफ़।
मैं मुड़ा।
भीड़ धीरे-धीरे हटी। जैसे पानी किनारा छोड़ता है।
वहाँ, सबके पीछे, एक आदमी खड़ा था।
सस्ती शर्ट। कॉलर से लटकता धागा। बाईं कलाई पर रुकी हुई पुरानी घड़ी। हाथ में एक भूरी चप्पल, जैसे वो उसे उठाकर लाया हो और अब क्या करे, नहीं जानता।
महेंद्र चाचा।
उसका चेहरा वैसा नहीं था जैसा मैंने सुबह देखा था। उस पर धूल नहीं थी। उस पर पसीना नहीं था। उस पर सिर्फ़ वो थकान थी जो उस आदमी के चेहरे पर आती है जो बहुत दिन से एक ही रास्ते पर चल रहा हो और आज पहली बार रुका हो।
किसी ने कुछ नहीं कहा।
चाचा ने भीड़ को देखा। फिर मुझे देखा। मैंने उसकी आँख नहीं चुराई।
और फिर उसने कुछ नहीं कहा।
वो चला।
धीरे-धीरे, एक-एक कदम। लोग अपने आप हटते गए। किसी ने उसे रोका नहीं। किसी ने उसका नाम नहीं लिया। बस उसकी चप्पल की आवाज़ सुनाई दे रही थी, धूल भरी ज़मीन पर, चट, चट, चट।
वो मंच की सीढ़ी के पास पहुँचा।
रुक्मा दीदी ने अपना चमच कसकर पकड़ा। अमरीक सिंह ने अपना गिलास कसकर पकड़ा। नैना ने कैमरा उठाया और उसका हाथ नहीं काँपा।
चाचा ने पहली सीढ़ी पर पैर रखा। तख़्ता चरमराया।
दूसरी सीढ़ी। चरमराया फिर।
तीसरी।
और उस वक़्त मुझे अपनी कलाई पर पापा की घड़ी का एहसास हुआ। वो हमेशा पाँच मिनट आगे चलती थी। मैंने कभी उसे ठीक नहीं किया।
उस शाम पहली बार लगा कि वो पाँच मिनट मेरे काम आए।
क्योंकि चाचा मंच पर पहुँच चुका था।
और मेरे पास पाँच मिनट बाक़ी थे।
मुझे नहीं पता था कि वो क्या बोलेगा।
पर मुझे ये पता था कि उस शाम रातरानी ढाबे का शोर, कड़ाही की आवाज़, गाड़ियों के हॉर्न और सैकड़ों आदमियों की साँस, सब एक साथ रुक गए थे।
सिर्फ़ एक आवाज़ बची थी।
ड्रम पर रखे तख़्ते की चरमराहट।
और चाचा का हाथ, जो माइक की तरफ़ बढ़ रहा था, काँप रहा था।
॥
ड्रम पर रखा तख़्ता चरमराया और चाचा ने तीसरी सीढ़ी से आख़िरी कदम मंच पर रखा।
भीड़ में एक आवाज़ उठी। फिर दूसरी। फिर सौ।
"महेंद्र भाई!"
"ये तो अर्जुन का चाचा है!"
"ये कहाँ से आ गया?"
"अरे ये तो कल से ग़ायब था!"
अमरीक सिंह के हाथ से माइक छीनते वक़्त चाचा का हाथ काँप रहा था, पर उसने पूरी ताक़त से खींचा। अमरीक ने रोका नहीं। अमरीक ने एक कदम पीछे हटकर चाचा को जगह दे दी, जैसे वो जानता हो कि ये पल उसका नहीं है।
मेरी आँखें सिकुड़ गईं।
मैंने एक शब्द नहीं बोला।
चाचा ने माइक अपने मुँह के पास लाया और माइक में उसकी साँस की आवाज़ आई — फूँ, फूँ, फूँ। वैसे साँस लेता है आदमी जब बहुत दिन का रुका हुआ सब एक साथ बाहर निकलना चाहता हो।
"मैं महेंद्र यादव हूँ," उसने कहा। आवाज़ फटी हुई थी। "रघुवीर यादव का छोटा भाई। इस लड़के का चाचा।"
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"और उस रात…" उसने साँस रोकी, फिर छोड़ी, "उस रात मैं तुम्हारे पापा के ट्रक के नीचे था।"
भीड़ में आवाज़ आई — कोई सिसकी थी, कोई गाली नहीं, कोई गाली नहीं थी, बस एक बड़ी आवाज़, जैसे एक साथ सौ आदमियों ने साँस अंदर खींची हो।
मैं अपनी जगह पर खड़ा रहा।
मैंने देखा — रुक्मा दीदी के हाथ से चमच नीचे नहीं गिरा। नैना का कैमरा नीचे नहीं आया। जुगनू ने अपना मुँह दोनों हाथों से ढक लिया, पर आँखें खुली रखीं।
"मैंने उस ट्रक की लाइन नहीं बदली थी," चाचा ने कहा। "मैंने लाइन बदली थी।"
वो रुका।
"फ़र्क़ समझते हो?" उसने भीड़ से पूछा, जैसे कोई मास्टर क्लास में सवाल पूछ रहा हो। "ट्रक की लाइन बदलना और केबल काटना — ये दो अलग चीज़ें हैं। मैंने पहली चीज़ की। दूसरी चीज़ मैंने नहीं की।"
"तो केबल किसने काटी?" किसी ने पीछे से पूछा।
चाचा ने उस तरफ़ नहीं देखा।
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