A Dark Secret – Chapter 263
रुक्मा दीदी ने तिरपाल खोला। पहिया काला था, धुला हुआ, साफ़। और उस पर, रबर पर, तीन सीधी लकीरें थीं। बराबर दूरी पर। तीन कटे निशान, जैसे किसी ने रूलर रखकर काटा हो।
"तीन," रुक्मा दीदी ने कहा। "तीन निशान। घिसा हुआ पहिया ऐसे नहीं कटता। ये काटा गया है। मैंने खुद इसे पानी से धोकर देखा, ताकि कोई कहे कि मैंने ग़ुस्से में कुछ बना दिया।"
फिर उन्होंने अपनी साड़ी की गाँठ खोली। उसमें से एक लिफ़ाफ़ा निकला, पीला पड़ा, कोने से फटा, डोर से बँधा हुआ।
"ये लिफ़ाफ़ा ग्यारह साल पहले आया था," उन्होंने कहा। "दो आदमी आए थे। बोले, दीदी, ये तुम्हारे काम का काग़ज़ है, रख लो। और साथ में ये कहा कि आज सुबह दुकान बंद कर देना। मैंने दुकान बंद नहीं की। और लिफ़ाफ़ा आज तक नहीं खोला।"
"दीदी, उसमें क्या है?" किसी ने पूछा।
"मैंने भी नहीं देखा," रुक्मा दीदी ने कहा। "आज देखती हूँ। आप सब देखो।"
उन्होंने डोर खोली।
लिफ़ाफ़े से तीन काग़ज़ निकले। एक, हादसे की रिपोर्ट की कार्बन कॉपी, सत्ताईस सितंबर की, जिस पर लिखा था कि चालक की मौके पर मौत। दो, एक बीमा दावा, पंद्रह लाख का, और उस पर राठौर लॉजिस्टिक्स का नाम। और तीन, एक पर्ची, जिस पर नीली स्याही में कुछ लिखा था।
रुक्मा दीदी ने वो पर्ची आँखों के पास उठाई। उनका हाथ काँप रहा था, पर आवाज़ नहीं।
"यहाँ लिखा है," उन्होंने कहा, "बाक़ी काग़ज़ आठ तारीख़ को।"
भीड़ में ठंडी हवा जैसी चीज़ फैली। मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और पापा की कॉपी को छुआ।
आठ तारीख़।
मेरे आख़िरी पन्ने पर पापा की लिखाई में वही दो शब्द थे।
रुक्मा दीदी ने चौथी चीज़ उठाई। एक छोटा ज़ंग लगा टिन का डिब्बा, जिसे उन्होंने अपनी चूल्हे की छेनी से खोला था। उसमें से एक आधा जला काग़ज़ निकला, जिसके किनारे भूरे थे और बीच में आधी नीली गोल मोहर और आधी तारीख़ बची थी।
"ये भोला की जेब में था," उन्होंने कहा। "जली हुई गाड़ी से निकाला गया था। मैंने इसे ग्यारह साल कड़ाही के पीछे ईंटों में रखा। और अब आप बताओ, मैं इसे क्या कहूँ? हादसा, या हिसाब?"
भीड़ में से आवाज़ आई।
"दीदी, ये सब किसने किया?"
रुक्मा दीदी ने कोई जवाब नहीं दिया। वो सिर्फ़ चुप खड़ी रहीं, और यही सबसे बड़ा जवाब था।
फिर भीड़ टूटी।
पहले आवाज़ आई आगे से, "चलो देवा के दफ़्तर। अभी चलो। हम साठ हैं, वो एक है।"
दूसरी आवाज़ पीछे से, "हाँ, आज हिसाब लेंगे।"
तीसरी आवाज़, बहुत पीछे से, धीमी, "भाई, ज़रा सोचो। हम साठ हैं, पर वो हमारी गाड़ियाँ जानता है। हमारे बच्चे जानता है। हमारे कर्ज़ जानता है।"
और उसके बाद जो शोर उठा, वो मैंने पहले कभी नहीं सुना था। वो गुस्से का शोर था, पर उसमें डर भी मिला हुआ था। मुझे ऐसा लगा जैसे सौ लोग एक साथ बोल रहे हैं और कोई भी किसी की बात नहीं सुन रहा।
बल्लू ने अपना पान का कटोरा मेज़ पर रखा और आगे आया। उसका पैर लंगड़ा रहा, पर उसने आवाज़ ऊँची की।
"मैं बोलूँ?" उसने कहा। "मेरी गाड़ी पलटी है। मेरा ट्रक मोती आज कबाड़ में पड़ा है। मैं बच गया, यही बड़ी बात है। और मैं आज तक यही सोचता रहा कि मैं बचा कैसे। आज दीदी का पहिया देखकर लग रहा है कि मैं बचा नहीं था, मुझे बचा लिया गया था।"
कुछ लोग हँसे, पर हँसी में मज़ाक नहीं था।
फिर एक और आदमी उठा। पतला, छोटी दाढ़ी वाला, जेब से टूटा हुआ प्लास्टिक कार्ड निकालकर हवा में दिखाने लगा।
"ये मेरी पहली गाड़ी का पास है," रवि ने कहा। "भाई, मेरी बेटी के स्कूल की फीस एक हज़ार दो सौ अस्सी रुपये है। तीन दिन बाद आख़िरी तारीख़ है। अगर मैं आज देवा के दफ़्तर चला गया, तो कल मेरी गाड़ी वापस आएगी या नहीं?"
कोई जवाब नहीं आया।
और फिर एक औरत खड़ी हुई। मैंने उसे पहले भी देखा था, छोटी गाड़ी चलाती है, साड़ी में, सिर पर दुपट्टा। उसका नाम मुझे बाद में पता चला, सुनीता।
"मेरे पति दो साल पहले हादसे में मरे," उसने कहा, बिना ज़ोर लगाए। "मैं उनकी गाड़ी चलाती हूँ। भोले की गाड़ी का पहिया कटा मिला, और मेरे पति की गाड़ी भी जली थी। मैंने यूनियन से एक बार पूछा था कि मेरे पति का हिसाब क्या हुआ। किसी ने जवाब नहीं दिया। आज मैं पूछती हूँ, मंच से कौन जवाब देगा?"
भीड़ में सन्नाटा आ गया। पर ये वो सन्नाटा नहीं था जो डर से आता है। ये वो सन्नाटा था जिसमें लोग अपनी जेब में हाथ डालकर कुछ ढूँढ रहे होते हैं।
मैंने देखा कि भीड़ के किनारे से दो-तीन आदमी चुपचाप खिसककर अपनी गाड़ियों की तरफ़ जा रहे हैं। एक मुड़ा और दौड़ा। उसकी गाड़ी का इंजन बजा, और वो गली से निकल गया।
मैं समझ गया। यही तो देवा का तरीका था। वो मारता नहीं। वो बस इतना करता है कि आदमी खुद चल पड़ता है।
तो मैंने हाथ उठाया।
"सुनो," मैंने कहा।
मेरी आवाज़ उतनी ऊँची नहीं थी जितनी अमरीक सिंह की होती है। पर उस शाम मेरी आवाज़ उल्टी धीमी थी, और भीड़ ने सुना।
"मैं अर्जुन बोल रहा हूँ," मैंने कहा। "यादव मोटर गैराज वाला। जिसके पापा का ट्रक भी सत्ताईस सितंबर को पलटा था।"
भीड़ हिली।
"आज कोई पत्थर नहीं उठेगा," मैंने कहा।
कुछ लोग बोले, "क्यों?"
"क्योंकि पत्थर उठाने वाले को वो पकड़ लेगा," मैंने कहा। "और उसके हाथ में थाने की रसीद होगी, जिस पर लिखा होगा कि ड्राइवरों ने उपद्रव किया। फिर तीन दिन हम गाड़ी नहीं चला पाएँगे। तीन दिन का मतलब क्या है, आप जानते हैं। तीन दिन में कितने घर का चूल्हा बुझता है, ये मुझे बताओ।"
कोई नहीं बोला।
"आज सिर्फ़ नाम बोले जाएँगे," मैंने कहा। "हर नाम के साथ एक काग़ज़ होगा। और हर काग़ज़ की एक नक़ल होगी। आज जो यहाँ बोलेगा, वो काग़ज़ पर लिखा जाएगा, कैमरे में रिकॉर्ड होगा, और कल सुबह वकील के पास जाएगा। देवा भाई के पास ताक़त है। मेरे पास काग़ज़ है। और काग़ज़, भाइयों, ताक़त से ज़्यादा टिकता है।"
भीड़ में से किसी ने कहा, "अर्जुन, तेरे पास क्या है?"
मैंने अपनी जेब से पापा की काली डायरी निकाली। दिखाई। फिर अंदर रखी।
"ये," मैंने कहा।
उस एक शब्द पर भीड़ चुप हो गई। मुझे उस वक़्त नहीं पता था कि उस शाम कितने लोग उस काली डायरी का नाम सुनकर डर जाएँगे। ये मुझे रात में पता चला, जब जुगनू ने बताया कि दो आदमी बीच में से उठकर चले गए।
और तभी मंच की तरफ़ से आवाज़ आई।
"मुझे बोलने दो।"
सब मुड़े।
अमरीक सिंह था।
काले कोट में, सफ़ेद शर्ट में, जेब से लाल रुमाल लटकता हुआ। वो भीड़ के बीच से आगे आया। लोग अपने आप रास्ता देने लगे, जैसे कोई बड़ी गाड़ी आ रही हो।
वो मंच के पास पहुँचा। पहली सीढ़ी पर पैर रखा, तो तख़्ता चरमराया।
मैंने उसे रोका नहीं।
वो मंच पर चढ़ा। रुक्मा दीदी ने उसे देखा, और कुछ नहीं कहा। वो थोड़ी हट गईं, पर अपना चमच नहीं छोड़ा।
अमरीक सिंह ने भीड़ को देखा। उसने अपना लाल रुमाल निकाला और माथा पोंछा, जबकि उस शाम पसीना नहीं था।
फिर वो बोला, और उसकी आवाज़ में वो गूँज नहीं थी जो हर भाषण में होती थी। मुझे लगा जैसे किसी ने उसकी आवाज़ में से कुछ निकाल दिया है।
"भाइयों," उसने कहा। "मैं ग्यारह साल से तुम्हारा अध्यक्ष हूँ। मैंने तुम्हारे लिए हड़तालें कीं। मैंने तुम्हारे लिए भाषण दिए। और आज दीदी ने अपना लिफ़ाफ़ा खोला, तो मुझे लगा कि मेरा अपना भी खोलना पड़ेगा।"
उसने कोट की अंदरूनी जेब में हाथ डाला।
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