A Dark Secret – Chapter 262
वो हाँफने लगा।
"तुम्हें पता है इसका मतलब क्या है?" उसने कहा। "तुम्हें पता है ये किसका माल है?"
"पता है," मैंने कहा। "और यही तो मेरा काम है।"
मैंने चाबी जेब से निकाली। गाड़ी की तरफ़ बढ़ा, फिर रुका।
"सोनू," मैंने कहा। "गाड़ी के आगे खड़ा हो जा। किसी को छूने मत देना। राजू — हर डिब्बे का नंबर लिख। जुगनू —"
जुगनू पहले से मेरे पास खड़ा था।
"जुगनू," मैंने कहा, "तू यहीं रुक। अगर कोई गाड़ी आए और इस गोदाम के सामने रुके, तो तू उसका नंबर लिखेगा और उसकी आवाज़ याद रखेगा। और अगर कोई आदमी आए और पूछे कि रघुवीर का बेटा कहाँ है —"
"तो मैं कहूँगा, भाई, मुझे नहीं पता," जुगनू ने कहा। "और अगर वो डराए —"
"तो तू डरेगा," मैंने कहा। "डरना चोरी नहीं है। पर तू जगह नहीं छोड़ेगा।"
उसने सिर हिलाया।
मैं गाड़ी के पास पहुँचा। डिब्बा खुला था, काग़ज़ बाहर। मैंने एक बंडल उठाकर छाती से लगाया।
और उसी वक़्त मेरे दिमाग़ में एक आवाज़ बजी — मंसूर अली का सिमरिया कोल्ड स्टोरेज की गेट पर मुँह पोंछना।
ये डिब्बा वहीं जा रहा था।
यानी सिमरिया कोल्ड स्टोरेज कोई ठंडा कमरा नहीं था। वो उस खेल का हिसाब-किताब वाला कमरा था।
और अगर वहाँ दो हज़ार खाली फ़ॉर्म पहुँचते, तो अगले महीने की सत्ताईस को किसी की गाड़ी पलटती।
मैंने अपनी कॉपी निकाली।
अठारहवें पन्ने के नीचे उन्नीसवाँ पन्ना जोड़ा, और लिखा —
आज मैंने अपना ट्रांसपोर्ट शुरू किया, और पहले ही दिन मेरी गाड़ी ने मुझे एक ऐसा डिब्बा दिया जिसमें दवा नहीं, मौत के खाली फ़ॉर्म थे।
मैंने क़लम रोकी।
फिर नीचे लिखा —
पापा, तुमने ये नहीं लिखा था कि तुम्हारा नाम जो बोर्ड मैंने देखा, वो तुम्हारा है। पर तुमने ये ज़रूर लिखा था — ये गाड़ी नहीं, सबूत है।
आज मेरे पास गाड़ी है।
और सबूत भी।
अब सिर्फ़ एक चीज़ बाक़ी है — उन दोनों को एक ही काग़ज़ पर लाना।
मैंने कॉपी बंद की।
दोपहर की धूप में गोदाम का फाटक खुला था। बाहर सड़क पर गाड़ियाँ गुज़र रही थीं। एक का हॉर्न बजा, जैसे बच्चा रोता हो।
और उसी वक़्त, दूर, बहुत दूर, सिमरिया के उस पुराने गोदाम में, एक आदमी मेज़ पर बैठा था और काग़ज़ों को गिन रहा था। उसे अभी नहीं पता था कि उसके दो हज़ार खाली फ़ॉर्म रास्ते में ही रुक गए हैं।
उसे नहीं पता था कि उसकी सत्ताईस तारीख़ अब मेरे पास है।
और उसे ये भी नहीं पता था कि अगली सत्ताईस अब उसकी नहीं, मेरी होगी।
॥
शाम छह बजे के करीब मैं गोदाम पाँच नंबर के फाटक से बाहर निकला। हवा में धूल थी, तेल थी और कहीं दूर से रोटी की महक आ रही थी। दोपहर की धूप ढल चुकी थी और सड़क का रंग सिंदूरी हो गया था।
डिब्बों वाली गाड़ी मैंने राजू के हाथ में दी। सोनू उसके साथ बैठा। और कबीर अपनी साइकिल पर पीछे-पीछे चला, हाथ में फ़ॉर्म की एक कॉपी दबाए।
मैंने राजू से सिर्फ़ एक बात कही थी।
"थाने में जो भी काग़ज़ दे, उसकी रसीद लेकर आना। रसीद के बिना मत लौटना, चाहे रात कितनी भी हो जाए।"
राजू ने सिर हिलाया। सोनू ने गाड़ी का दरवाज़ा खटखटाया और बोला, "भाई, अगर वहाँ कोई कहे कि ये माल किसका है, तो क्या कहूँ?"
"कह देना, माल का मालिक वो है जिसका नाम फ़ॉर्म पर छपा है," मैंने कहा। "बाक़ी हम सिर्फ़ ढोने वाले हैं।"
गाड़ी चली। उसकी आवाज़ सुनकर मुझे लगा कि इंजन का एक बोल्ट ढीला है। पर उसे अभी रोकना ठीक नहीं था।
जुगनू मेरे पास खड़ा था, पैर पर पट्टी बँधी हुई, नंगे पाँव की जगह अब एक फटी चप्पल पहन रखी थी जो किसी ने दान कर दी थी।
"भाई," उसने कहा, "ढाबे पर आज सब जमा हैं। साठ से ज़्यादा गाड़ियाँ आ चुकी हैं। गली का मुँह बंद है।"
"कितनी?"
"मैंने गिनी," जुगनू ने कहा, "अड़सठ। और आठ रास्ते में हैं। पूरी गली में बस एक जगह खाली है, वो भी रुक्मा दीदी के कुएँ के सामने, जहाँ कोई खड़ा नहीं होता।"
मैं हँस पड़ा।
"तू गिनता कब है?"
"जब आप सोते हो," उसने कहा, बिना रुके। "और जब आप काग़ज़ पढ़ते हो।"
हम दोनों पैदल चले। गोदाम से ढाबे तक का रास्ता आम दिनों में दस मिनट का है, पर उस दिन हमें बीस मिनट लगे, क्योंकि हर गली में गाड़ी खड़ी थी, हर मोड़ पर चार आदमी बैठे थे और हर आदमी की आँख मुझ पर थी।
जब मैं ढाबे के मोड़ पर पहुँचा, तो पहले आवाज़ आई।
मैंने आँख बंद की।
मेरे बाएँ, किशन का लाल-भूरा ट्रक खड़ा था, उसकी बेयरिंग अब भी घरघराती थी, कम, पर थी। उसके आगे भूपेंद्र की जीप थी, जिसकी फैन बेल्ट मैंने बदल दी थी, अब उसकी आवाज़ साफ़ थी। पीछे एक टेंपो था जिसका पिछला दरवाज़ा हवा से खटखटा रहा था। और सबके ऊपर, सैकड़ों आवाज़ों के बीच, मुझे एक आवाज़ नहीं सुनाई दी।
मोती की आवाज़।
बल्लू का ट्रक अब भी पलटा हुआ था। और बल्लू खुद, पान चबाते हुए, मेज़ के पास खड़ा था।
मैंने आँख खोली।
ढाबे के बाहर लंबी मेज़ थी, उस पर मिट्टी के कटोरे उलटे रखे थे, एक भी चाय नहीं पी जा रही थी। कड़ाही जल रही थी, पर रुक्मा दीदी उसके पास नहीं थीं।
वो नीम के पेड़ के नीचे थीं।
वहाँ कोई मंच नहीं था। दो उलटे टीन के ड्रम, उनके ऊपर लकड़ी का मोटा तख़्ता, और तख़्ते पर एक फटी चटाई। दस साल से उस ढाबे में मैंने ऐसा कुछ नहीं देखा था।
और रुक्मा दीदी उस तख़्ते पर खड़ी थीं।
उनकी कमर पर चाबियों का गुच्छा हमेशा की तरह लटक रहा था। साड़ी का पल्लू कंधे पर था। हाथ में लोहे का लंबा चमच था, वही जिससे वो कड़ाही में हाथ डालती हैं। पर उस दिन वो चमच हथियार जैसा लग रहा था।
भीड़ चुप नहीं थी। भीड़ में वो खास शोर था जो सैकड़ों आदमियों के एक साथ साँस लेने से होता है।
नैना पेड़ के दूसरी तरफ़ खड़ी थी, कंधे पर फटा बैग, हाथ में पुराना कैमरा, चश्मा नाक पर सरका हुआ। उसने मुझे देखा और आँख से इशारा किया कि कैमरा चालू है।
मैं भीड़ के किनारे से अंदर घुसा। जुगनू मेरे पीछे-पीछे आया और नीम के नीचे उलटे ढोल पर बैठ गया, जैसे वो उसी जगह का हिस्सा हो।
रुक्मा दीदी ने भीड़ को देखा। एक बार नहीं, तीन बार। जैसे गिन रही हों।
फिर बोलीं।
"आज चाय का हिसाब नहीं होगा।"
किसी ने कुछ नहीं कहा।
"आज मेरी कॉपी बंद रहेगी," उन्होंने कहा। "आज खून का हिसाब होगा।"
भीड़ में एक आवाज़ उठी, किसी बूढ़े की, "दीदी, आप बोलिए, हम सुन रहे हैं।"
रुक्मा दीदी ने चमच नीचे रख दिया। उनका हाथ काँप रहा था, पर उन्होंने हाथ नहीं छिपाया।
"ग्यारह साल पहले," उन्होंने कहा, "सत्ताईस सितंबर की रात, मेरा भोला एक छोटी गाड़ी पर था। आगे एक ट्रक था। रात ग्यारह बजे का वक़्त था। भोला मेरे पास आने वाला था, क्योंकि उस दिन मैंने उससे कहा था कि आज जल्दी आ, मैंने तेरे लिए खीर बनाई है।"
वो रुकीं। भीड़ में कोई हिला।
"खीर वो नहीं खा सका," उन्होंने कहा। "गाड़ी पलट गई। पुलिस आई, काग़ज़ लिखा गया, और मुझे कहा गया कि भोला की गाड़ी का पहिया घिस गया था, इसलिए हादसा हुआ।"
उन्होंने पल्लू से मुँह पोंछा।
"मैं औरत हूँ, मुझे क्या पता था," उन्होंने कहा। "मैंने रोया, दो दिन बैठी रही, फिर ढाबा खोल लिया, क्योंकि मेरे पास और कुछ नहीं था। पर एक चीज़ मैंने फेंकी नहीं।"
उन्होंने पीछे हाथ बढ़ाया। किसी ने उन्हें तिरपाल में लिपटी एक गोल चीज़ पकड़ाई।
"ये भोला की गाड़ी का पिछला पहिया है," उन्होंने कहा।
भीड़ आगे खिसकी। मैंने भी अपनी गर्दन उठाई।
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