A Dark Secret – Chapter 261
"अच्छा," मैंने कहा। "तो ज़िम्मेदारी की बात हो गई।"
मैंने गाड़ी का दरवाज़ा खोला, चाबी निकाली, और उसे अपनी जेब में डाल लिया।
"गाड़ी नहीं जाएगी," मैंने कहा।
वहाँ अचानक सन्नाटा छा गया। गोदाम में छह लोडर खड़े थे। दो क्लर्क। एक बूढ़ा गार्ड। और दूर फाटक पर एक चाय वाला।
"क्या कहा?"
"मैंने कहा, गाड़ी नहीं जाएगी," मैंने दोहराया। "जब तक सील नहीं खुलती। मैं डिब्बा खोलूँगा, देखूँगा, और जो मिलेगा उसका काग़ज़ बनाऊँगा। फिर गाड़ी जाएगी।"
"तू मेरा माल खोलेगा?"
"हाँ।"
"तू जानता है मेरा कौन है?"
"नहीं," मैंने कहा। "और यही मेरी मुश्किल है। पर मुझे एक बात पता है — मेरे पापा का नाम रघुवीर यादव था और उन्होंने एक बार ऐसा ही माल ढोया था, जिसके अंदर वो चीज़ नहीं थी जो टिकट पर लिखी थी। उसका अंजाम मैंने देखा है। इसलिए इस गाड़ी पर वो नहीं होगा।"
बंसल ने मेरी तरफ़ एक कदम बढ़ाया। और उसी वक़्त मेरे पीछे से आवाज़ आई।
"क्यों नहीं खोलते?"
कबीर था। अपने काले थैले के साथ, हाथ में पेचकस।
"मैंने सुना," उसने कहा, "कि यहाँ कोई सील खुलेगी।"
बंसल हँसा। "तुम लोग पागल हो।"
"हो सकते हैं," कबीर ने कहा। "पर पागल भी रसीद देते हैं।"
और उसी वक़्त, गोदाम के फाटक पर, एक औरत आई।
दुबली, मैली साड़ी, हाथ में एक फटा थैला और हाथ में एक काग़ज़। उसने चारों तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।
"तुम अर्जुन हो?" उसने पूछा।
मैंने सिर हिलाया।
"मैं सुनीता हूँ," उसने कहा। "मेरे पति गाड़ी चलाते थे। दो साल पहले हादसे में चले गए। मेरे पास उनकी गाड़ी है, पर वो खड़ी है, क्योंकि पुर्ज़े के पैसे नहीं हैं।"
वो रुकी। उसने काग़ज़ आगे बढ़ाया।
"मेरे बेटे के स्कूल की फीस है। एक हज़ार चार सौ बीस रुपये। तीन दिन बाद आख़िरी तारीख़ है। मैंने यूनियन में कहा, वहाँ से कहा कि साहब के यहाँ जा।"
मैंने काग़ज़ लिया। ऊपर बच्चे का नाम, नीचे रकम, नीचे तारीख़।
मैंने जेब से अपना पैसा निकाला। पिछले हफ़्ते की कमाई में से कुछ बचा था — बारह सौ रुपये।
मैंने सात सौ दस रुपये गिनकर उसकी हथेली पर रखे।
"ये आधी फीस है," मैंने कहा।
उसने देखा। उसकी आँखों में वो चीज़ आई जो लोग तब देखते हैं जब वो सोचते हैं कि मदद आएगी और आधी आती है।
"आधी?" उसने कहा।
"आधी," मैंने कहा। "और बाक़ी आधी तुम कमाओगी।"
वो चुप खड़ी रही।
"मेरे पास दो तिरपाल हैं," मैंने कहा। "दोनों फटे हैं। एक गाड़ी के ऊपर का, एक गोदाम में पड़ा। सिलाई का काम है। तुम सिल सकती हो?"
"सिलती हूँ," उसने धीरे से कहा। "मैंने उनकी गाड़ी का तिरपाल दस बार सीला है।"
"तो सात सौ दस रुपये का काम है। तीन दिन में आ जाएगा। फीस के पहले।"
वो मेरी तरफ़ देखती रही। फिर उसने पूछा, "मुफ़्त में क्यों नहीं देते? सब कहते हैं तुम बर्बाद लोगों की मदद करते हो।"
मैंने एक गहरी साँस ली।
"क्योंकि मुफ़्त में देने से तुम मुझे याद रखोगी," मैंने कहा। "और मुझे नहीं चाहिए कि कोई मुझे याद रखे। मुझे चाहिए कि तुम अपनी गाड़ी चलाओ। मुफ़्त सिर्फ़ उनके लिए है जो सच में बर्बाद हैं — जिनके पास हाथ नहीं बचा। तुम्हारे पास हाथ हैं। तुम्हारे पास सुई है। यहाँ हर आदमी को अपना हिसाब खुद बनाना होगा। मैं किसी का हिसाब नहीं लिखूँगा, मैं सिर्फ़ देखूँगा कि हिसाब साफ़ है या नहीं।"
वो एक पल चुप रही। फिर उसने सिर हिलाया। फिर उसने कहा, "तीन दिन में तिरपाल।"
"तीन दिन में," मैंने कहा।
वो मुड़ी और गई। जाते वक़्त उसने एक बार पीछे देखा, मेरे हाथ में रखे काग़ज़ की तरफ़ नहीं, मेरी आँखों की तरफ़।
जुगनू मेरे पास आया।
"भाई," उसने धीरे से कहा, "तूने आधे पैसे क्यों दिए?"
"क्योंकि पूरे देता तो वो अगली बार फिर आती," मैंने कहा। "और तीसरी बार आते-आते वो खुद पर से भरोसा खो देती। आदमी को पैसा नहीं, अपना हिसाब चाहिए।"
उसने सिर हिलाया। फिर बोला, "पर तूने तो रुक्मा दीदी का किराया भी नहीं दिया।"
"वो अलग है," मैंने कहा। "दीदी ने मुझे मुफ़्त नहीं दिया। दीदी ने मुझमें हिस्सा लिया है। हिस्सा और एहसान में फ़र्क़ होता है। समझे?"
"आधा," जुगनू ने कहा।
"आधा ठीक है," मैंने कहा। "आधा समझना भी बहुत है।"
अब बंसल वहीं खड़ा था, और उसका चेहरा बदल रहा था। पहले गुस्सा, फिर डर, फिर वो खालीपन जो लोग तब दिखाते हैं जब उन्हें समझ आता है कि मामला बढ़ रहा है।
"कबीर," मैंने कहा।
कबीर ने पेचकस निकाला। डिब्बे की पट्टी पर ज़ंग थी, पर सील ताज़ी। उसने सील काटी।
ढक्कन उठाया।
अंदर — काग़ज़।
सफ़ेद काग़ज़ों के बंडल। मोटे, कसे हुए, रस्सी से बँधे। दस बंडल। हर बंडल में दो सौ पन्ने। कुल दो हज़ार पन्ने।
कबीर ने एक बंडल उठाया और खोला। पहला पन्ना मेरी तरफ़ बढ़ाया।
सफ़ेद काग़ज़। ऊपर कोने में एक नीला गोल निशान। उसके नीचे मोटे अक्षरों में — राठौर लॉजिस्टिक्स।
मैंने साँस रोकी।
दो हज़ार पन्ने।
"ये दवा नहीं है," कबीर ने धीरे से कहा।
"नहीं," मैंने कहा।
मैंने एक और बंडल खोला। वही नीला निशान। वही नाम। वही सफ़ेद काग़ज़।
तीसरा बंडल। पाँचवाँ। सातवाँ।
फिर आठवें बंडल में, सबसे नीचे, मेरे हाथ में एक अलग काग़ज़ आया।
मोटा काग़ज़। ऊपर बीमा दफ़्तार की मोहर। नीचे खाने — नाम, गाड़ी का नंबर, माल की क़ीमत, नुक़सान की रकम।
सब खाली। एक भी खाना नहीं भरा।
सिर्फ़ एक चीज़ भरी थी।
तारीख़।
ऊपर दायीं तरफ़, टाइप किए अक्षरों में छपी हुई — सत्ताईस सितंबर।
मैंने काग़ज़ को उलटा किया। उसकी पीठ पर भी वही तारीख़, वही मोहर।
मैंने अगला काग़ज़ उठाया। वही। सत्ताईस सितंबर।
तीसरा। सत्ताईस सितंबर।
मैंने कबीर की तरफ़ देखा। उसका मुँह खुला रह गया था।
"ये क्या है?" उसने कहा।
"ये हादसा नहीं है," मैंने धीरे से कहा। "ये हादसे का फ़ॉर्म है। पहले से छपा हुआ। तारीख़ पहले से बनी हुई। नाम बाद में भरना है। गाड़ी का नंबर बाद में। रकम बाद में।"
मैंने काग़ज़ नीचे रखा।
"ये सिर्फ़ एक फ़ॉर्म नहीं है," मैंने कहा। "ये दो हज़ार फ़ॉर्म हैं। और हर फ़ॉर्म पर वही तारीख़ है। हर महीने की सत्ताईस।"
कबीर ने कैलकुलेटर निकाला। उसके हाथ काँप रहे थे, फिर भी उसने बटन दबाए। "दो हज़ार फ़ॉर्म," उसने कहा। "अगर एक फ़ॉर्म पर चार लाख का दावा पास हो जाता है — तो ये है आठ करोड़।"
"और अगर पूरी एजेंसी में ऐसे डिब्बे और भी हैं," मैंने कहा, "तो ये आठ करोड़ सिर्फ़ शुरुआत है।"
बंसल ने एक कदम पीछे हटा।
"मुझे कुछ नहीं पता," उसने कहा। "ये माल मुझे दिया गया था। मैं तो सिर्फ़ एजेंसी चलाता हूँ।"
"किसने दिया?"
वो चुप हो गया।
"बंसल जी," मैंने कहा। "तुम्हारी गाड़ी पर, तुम्हारी एजेंसी से, ये डिब्बा सिमरिया कोल्ड स्टोरेज जा रहा था। अगर मैं इसे वहाँ पहुँचा देता, तो अगले महीने किसी ड्राइवर की गाड़ी पलटती, और ये फ़ॉर्म भर जाता। और तुम कहते — मुझे कुछ नहीं पता।"
उसने मुँह खोला, पर आवाज़ नहीं निकली।
मैंने काग़ज़ कबीर की तरफ़ बढ़ाया।
"इसकी तीन कॉपी," मैंने कहा। "एक मेरे पास, एक नैना के पास, एक तिजोरी में। और एक बात —"
मैंने बंसल की तरफ़ देखा।
"ये गाड़ी अब सिमरिया नहीं जाएगी," मैंने कहा। "ये गाड़ी अब थाने जाएगी। और उसके बाद अख़बार जाएगी।"
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