A Dark Secret – Chapter 255
"और तूने?"
"मैंने कहा — रजिस्टर क्यों ले जा रहे हो? उन्होंने कहा — आज हिसाब बराबर करना है।" अम्मा रुकी। "और फिर उन्होंने मुझे देखा। उस दिन उनकी आँखें अजीब थीं, अर्जुन। डरी हुई नहीं। थकी हुई। जैसे किसी ने उन्हें दो रात से सोने नहीं दिया हो।"
मैंने आँख बंद की।
"फिर?"
"फिर वो जाते-जाते रुके और बोले — कमला, अगर मैं लौटा तो इसे जला देना।"
मेरी आँख खुल गई।
"क्या जला देना?"
"रजिस्टर।" अम्मा ने कहा। "जो उन्होंने मेरे हाथ में थमा दिया था। वो वही ले गए, और मुझे एक पुराना डिब्बा पकड़ा दिया। बोले — अगर मैं लौटा, तो ये जला देना, और किसी को न बताना।"
मेरा गला सूख रहा था।
"वो डिब्बा कहाँ है, अम्मा?"
"मैंने उसे नहीं खोला," अम्मा ने कहा। "मैंने उसे पापा के औज़ार वाली अलमारी के ऊपर, पीछे, चटाई के नीचे रख दिया। और फिर जब वो लौटे नहीं, तो मैं उसे देखती रही, दस साल, और कभी हिम्मत नहीं हुई।"
मैं छत पर खड़ा था।
और मेरे सामने सिमरिया का रास्ता अब सिर्फ़ गाड़ी का रास्ता नहीं था। वो घर का रास्ता था।
"अम्मा," मैंने कहा। "कल मुझे उस डिब्बे की फोटो भेज। छोड़ दे। खोलने की ज़रूरत नहीं। मैं खुद पहुँचूँगा।"
"तू आएगा?"
"हाँ।" मैंने कहा। "पर एक शर्त पर।"
"क्या शर्त?"
"तू उस आदमी से अब दोबारा कभी नहीं मिलेगी।"
अम्मा हँसी।
"अर्जुन," उसने कहा, "अब मैं उससे मिलने से नहीं डरती। मैं उससे छुपने से डरती थी।"
मैंने आँखें बंद कर लीं।
और फिर जो हुआ, मुझे उसकी उम्मीद नहीं थी।
अम्मा ने कहा —
"तेरे पापा की घड़ी पहने हुए है?"
मैंने बाईं कलाई देखी। कमरे की धुंधली रोशनी में घड़ी की सुई चल रही थी। हमेशा की तरह पाँच मिनट आगे।
"हाँ," मैंने कहा। "हमेशा।"
"तो आज उसको मत देखना," अम्मा ने कहा। "आज तू अपने कान सुन। घड़ी कहेगी कि देर हो रही है। कान कहेगा कि सही वक़्त है। तू कान मान।"
मैं मुस्कुराया।
"अम्मा।"
"हाँ।"
"एक आख़िरी बात।" मैंने कहा। "उस गोदाम में ग्यारह साल से कुछ रखा जाता है। तूने कभी नहीं सुना कि रात में किसी ने वहाँ ट्रक खड़ा किया हो?"
अम्मा चुप रही। फिर बोली, धीरे से —
"सुना है। ग्यारह साल से सुन रही हूँ। हर बार जब मैं सत्ताईस सितंबर को फोन मिलाती हूँ और वो ठाकुर ट्रांसपोर्ट उठाता है, उसी रात गोदाम में गाड़ियों की आवाज़ आती है। मैं जानती हूँ, क्योंकि उस वक़्त गाँव में कुत्ते भौंकते हैं। मैंने कभी किसी को नहीं बताया।"
मैंने फोन को कसकर पकड़ा।
"अम्मा।"
"हाँ।"
"अब आराम कर।"
"तू कर।" उसने कहा। "कमला यादव का बेटा अगर आज रात नहीं सोया, तो कल मैं उस गोदाम के बाहर खड़ी मिलूँगी। और मैं मज़ाक नहीं कर रही।"
"अम्मा, तू मत करना कुछ।"
"मैंने उनसे कह दिया ना," अम्मा ने धीरे से कहा, "मेरे बेटे को मारने से पहले मुझे मारना। और उन्होंने कुछ नहीं कहा। मुझे लगता है उन्हें ये बात पची नहीं। आदमी जो काग़ज़ से डरता है, मुँह से बोले हुए शब्दों से ज़्यादा डरता है।"
फोन कट गया।
मैं छत पर खड़ा रहा।
टिन के नीचे से पानी टपक रहा था — टप। धीरे-धीरे। जैसे कोई गिनती कर रहा हो।
नीचे जुगनू ने आवाज़ दी। "भाई? कौन था?"
"अम्मा।"
"अम्मा ठीक हैं?"
"ठीक है," मैंने कहा। "बल्कि, आज के बाद मुझे लगता है, ये शहर के आधे आदमियों से ज़्यादा हिम्मत वाली निकलेगी।"
जुगनू हँसा। फिर कराह उठा। मैं नीचे उतरा, उसके पैर की पट्टी देखी। जलन अब बैठ रही थी, पर पैर लाल था। मैंने रुक्मा दीदी की रखी मरहम की डिबिया निकाली और उसके पैरों पर धीरे से लगाई।
"भाई," जुगनू ने कहा। "तू रो रहा है?"
"नहीं," मैंने कहा। "मेरी हथेली से पानी टपक रहा है।"
"वो पानी नहीं है भाई।"
"तो चुप," मैंने कहा। "और सो जा। कल सुबह छह बजे उठना है।"
"क्यों?"
"क्योंकि," मैंने कहा, "कल सुबह मुझे एक चीज़ लानी है — गाँव जाने वाली गाड़ी का टाइम टेबल।"
फिर मैंने अपनी जेब से काग़ज़ निकाले।
सिमरिया लिखा हुआ काग़ज़। सलाह नहीं, पहचान।
और उसके नीचे मैंने अपनी कॉपी खोली।
सत्रहवाँ पन्ना खाली था।
मैंने उस पर लिखा —
सिमरिया गोदाम, बस स्टैंड के पीछे, मंडी की सड़क। बोर्ड पर पापा का नाम। बोर्ड पर फोन नंबर ठाकुर ट्रांसपोर्ट का। गोदाम काग़ज़ों पर पापा के नाम, बनवाया किसी और ने। पापा की मौत के चार महीने बाद जीप में दो आदमी, मोटा और चटका चश्मे वाला, चाचा से बात। फिर सफ़ेद रुमाल वाला घर पर — मंसूर अली। रजिस्टर माँगा। अम्मा ने इंकार किया। बोर्ड का नंबर हर सत्ताईस सितंबर को ठाकुर ट्रांसपोर्ट उठाता था। उसी रात गोदाम से गाड़ियों की आवाज़। अम्मा ने मंसूर से आज कहा — बेटे को मारने से पहले मुझे मारना।
मैंने पेन रखा।
और फिर मैंने उस काग़ज़ के नीचे एक और लाइन जोड़ी, जो मुझे आज तक किसी काग़ज़ पर नहीं लिखनी थी —
पापा ने आख़िरी रात अम्मा को एक डिब्बा दिया और कहा था, जब मैं लौटूँ तो जला देना।
मैं उस डिब्बे की तरफ़ देख नहीं सकता, पर मैं उसका नाम जानता हूँ। अब मैं उसका नाम जानता हूँ।
मैंने कॉपी बंद की।
और उस वक़्त, बहुत दूर, टोल की तरफ़ से एक गाड़ी गुज़री — भारी, धीमी, और उसकी आवाज़ में एक अजीब सी बात थी। वो रुकी नहीं। गुज़र गई।
पर उसके जाने के बाद हवा में एक बू रह गई — नौसादर और तेल की।
मैंने आँख बंद की।
और अम्मा की आवाज़ याद आई — तू अपने कान सुन। घड़ी नहीं।
मैंने कान उठाए।
रात गहरी थी। ढाबे की आख़िरी बत्ती बुझ गई थी। और नीचे आँगन में काँच पर टपकता पानी — टप, टप — ऐसे गिन रहा था जैसे दुनिया मेरे लिए उलटी गिनती शुरू कर रही हो।
अगली सुबह मुझे सिमरिया जाना था।
पर उससे पहले, मुझे एक चीज़ करनी थी।
मैंने फोन उठाया और नैना को संदेश लिखा — सुबह छह बजे, गैराज। काग़ज़ वाली तीसरी कॉपी अपने साथ लाना। और एक जगह खाली रखना — क्योंकि आज रात को मेरी कॉपी में सत्रहवाँ काग़ज़ जुड़ा है, और उसका नाम है: वो डिब्बा, जो पापा ने अम्मा को दिया था।
मैंने फोन रखा।
और सोने से पहले, एक बार, अपनी बाईं कलाई देखी।
घड़ी पाँच मिनट आगे थी।
हमेशा की तरह।
पर आज मैंने उसे नहीं माना।
आज मैंने अपने कान माने — और मेरे कान कह रहे थे कि अम्मा आज किसी से नहीं डरी। और जो औरत अपने बेटे के लिए मौत का नाम ले ले, वो औरत अपने बेटे को घर बुला रही है — न डर से, न मजबूरी से। पुकार से।
मैंने आँख बंद की।
और सिमरिया का रास्ता, जो अब तक सिर्फ़ एक काग़ज़ पर लिखा शब्द था, मेरी छाती में एक गाड़ी की तरह चलने लगा।
॥
भोर से पहले की हवा में एक बात होती है। वो ठंडी नहीं होती, बस धीमी होती है। जैसे कोई बूढ़ा आदमी सीढ़ियाँ उतर रहा हो और हर कदम पर सोच रहा हो कि उतरूँ या न उतरूँ।
मैं गैराज की उस पुरानी चारपाई पर बैठा था जिसकी रस्सियाँ ढीली हो चुकी थीं। जुगनू मेरे पैरों के पास सो रहा था, दोनों पैरों पर पट्टी बँधी, और सोते हुए भी उसके होंठ हिल रहे थे — जैसे सपने में भी कोई गाड़ी गिन रहा हो।
मेरी हथेली सख़्त हो चुकी थी। पट्टी के नीचे खून सूखकर छतरी जैसा बन गया था और हर बार मुट्ठी बंद करने पर वो चटकती थी, जैसे पुराना काग़ज़।
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