A Dark Secret254 / 536

A Dark Secret – Chapter 254

7 min read November 6, 2026

"मैं उसके सामने से निकली। उसने मुझे देखा। और वो मुस्कुराया, अर्जुन। सफ़ेद रुमाल जेब से निकालकर उसने माथा पोंछा, जबकि पसीना नहीं था। फिर बोला — भाभी जी, बेटे से कहिए, काग़ज़ भारी होते हैं। जितने ज़्यादा होंगे, उतना बोझ बढ़ेगा।"

"और तूने?"

"मैंने कहा — काग़ज़ तो भारी होते हैं, मंसूर भाई। पर मेरा बेटा मज़दूर है। उसे वज़न उठाना आता है।"

मैं हँस पड़ा।

सच में हँसा। ज़ोर से। इतना ज़ोर से कि नीचे जुगनू जाग गया और उसने पुकारा — भाई? सब ठीक है?

मैंने हाथ हिलाया, जबकि वो मुझे देख नहीं सकता था।

"अम्मा," मैंने कहा। "तू अम्मा है या कोई पहलवान?"

"मैं वही हूँ जो दस साल से चूल्हे के पीछे बैठी है," उसने कहा। "और अब मैं चूल्हे के पीछे नहीं बैठूँगी।"

फिर वो चुप हो गई।

और उसका चुप होना, मुझे पता है, दो चीज़ों में से एक होता है। या तो वो कुछ भूल रही है, या वो कुछ याद कर रही है जो बहुत दिनों से अंदर दबा था।

"अम्मा।"

"रुक।"

मैं रुका।

दूर कहीं गाँव की गली में साइकिल की घंटी बजी। उसके घर के पास से कोई गुज़रा।

"एक बात और है," अम्मा ने कहा। "जो मैंने आज तक किसी को नहीं बताई।"

"बता।"

"उस गोदाम पर बोर्ड लगा है ना। लोहे का, बड़ा, सफ़ेद अक्षरों में।"

"हाँ?"

"उस बोर्ड पर तेरे पापा का नाम है — रघुवीर यादव, ट्रांसपोर्ट। और नाम के नीचे एक फोन नंबर भी छपा है।"

"तो?"

"वो नंबर," अम्मा ने कहा, और उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे कोई लंबी सड़क पर आख़िरी मोड़ ले रहा हो, "ठाकुर ट्रांसपोर्ट के दफ़्तर का है।"

मैंने साँस लेना बंद कर दिया।

"क्या कहा?"

"मैंने एक बार फोन किया था," अम्मा ने कहा। "उस नंबर पर। पापा की मौत के पहले साल में। मुझे लगा शायद पापा के किसी जानने वाले का नंबर है, कुछ पता चलेगा। तो फोन उठा और उधर से आवाज़ आई — ठाकुर ट्रांसपोर्ट, बोलिए।"

मेरा गला सूख गया।

"फिर?"

"मैंने फोन रख दिया। डर के मारे।" उसने कहा। "और फिर अगले साल सत्ताईस सितंबर को फिर मिलाया। फिर वही आवाज़। तीसरे साल फिर मिलाया। हर बार वही आवाज़। मैंने कभी कुछ नहीं पूछा। मैं सिर्फ़ सुनती रही। क्योंकि जब तक फोन उठता रहा, मुझे लगता रहा कि तेरे पापा की कोई आवाज़ अभी ज़िंदा है।"

मैंने आँखें बंद कीं।

मेरे सामने वो पीला बोर्ड था जिसे मैंने कभी देखा नहीं, पर जिसे अब मैं साफ़ देख सकता था। सफ़ेद अक्षर। ज़ंग लगा लोहा। और नीचे छोटे-छोटे अंकों में एक फोन नंबर, जो देवा भाई के दफ़्तार का है।

"अम्मा," मैंने धीरे से कहा। "तूने ये बात दस साल क्यों छिपाई?"

"क्योंकि मेरे पास तेरे सिवा कुछ नहीं है," उसने कहा। "और मुझे लगा कि अगर तूने ये जान लिया कि तेरे पापा का नाम उस आदमी ने अपने दफ़्तार से जोड़ रखा है, तो तू वहाँ जाकर खड़ा हो जाएगा। और फिर मैं किसे खाना खिलाऊँगी?"

मैंने सूखी आँखों से टिन की छत को देखा।

पानी टपक रहा था। मेरी जली हथेली पर नहीं, उसके बगल में पड़े काग़ज़ पर। सिमरिया लिखा हुआ काग़ज़। मैंने उसे उठाकर दूसरी तरफ़ रख दिया।

"अम्मा, अब मेरी बात सुन।" मैंने अपनी आवाज़ नीची की। "तू घर का दरवाज़ा रात में बंद रखती है?"

"क्यों?"

"बस रखती है?"

"रखती हूँ।"

"और पीछे वाला?"

"वहाँ तो दीवार ही टूटी है।"

"तो कल मिस्त्री बुला। मेरे पास पैसे हैं। कम हैं, पर हैं। दीवार बनवा।"

"अर्जुन—"

"अम्मा, अब सुन। वो आदमी तुझे पता कर लेगा। वो गाँव में आ चुका है। वो बस स्टैंड पर खड़ा था। इसका मतलब है उसने तुझे देखा है। इसका मतलब है उसे पता है कि तू जानती है।"

अम्मा चुप रही।

फिर उसने वो कहा जो मैंने कभी नहीं सुना था। और मैं सुनते ही उठ खड़ा हुआ।

"मैंने उस आदमी से कह दिया," अम्मा ने कहा। "मेरे बेटे को मारने से पहले मुझे मारना।"

मैंने पैर नीचे रखा।

टिन की छत पर मेरी एड़ी चटकी।

"क्या कहा तूने?"

"तूने सुना।"

"अम्मा, तू पागल हो गई है क्या? तूने उससे ये क्यों कहा?"

"क्योंकि वो मुझसे तेरा पता पूछ रहा था," अम्मा ने कहा, और उसकी आवाज़ में अब ज़रा भी काँप नहीं थी। "और मैं उसे ऐसे पता नहीं देना चाहती थी जैसे मैं डर गई हूँ। मैं नहीं डरी, अर्जुन। मैंने उससे सीधा कहा — मंसूर भाई, मेरा बेटा दिल्ली में है। रघुवीर का बेटा है। जब वो लौटेगा, तो तुमसे मिलेगा। उससे पहले तुम उसे कुछ नहीं करोगे। क्योंकि उसे मारने से पहले मुझे मारना पड़ेगा। और मुझे मारकर तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा, क्योंकि रजिस्टर मेरे पास नहीं। रजिस्टर उसके पास है।"

फोन पर सन्नाटा।

मैं खड़ा था, और मेरे हाथ में फोन था, और मैं ऐसे साँस ले रहा था जैसे कोई बंद कमरे का दरवाज़ा खुला हो।

"अम्मा," मैंने कहा। "तूने मुझे क्यों पहले नहीं बताया कि तू उससे मिली?"

"मैं बता रही हूँ ना, अभी बता रही हूँ।"

"और उसने क्या कहा?"

"उसने वही कहा जो वो हमेशा कहता है," अम्मा ने कहा। "हँसा। फिर बोला — भाभी जी, मैं मारने-मरने का आदमी नहीं हूँ। मैं सिर्फ़ काग़ज़ का आदमी हूँ। मुझे काग़ज़ दे दीजिए, मैं चला जाऊँगा।"

"और तूने?"

"मैंने कहा — काग़ज़ तो मेरे बेटे के पास है। जाकर उससे माँग लेना।"

मैं हँसा।

पर इस बार हँसी गले में अटक गई।

"अम्मा," मैंने कहा। "अब ध्यान से सुन। कल सुबह तू मुझे उस बोर्ड की फोटो भेज। जिसमें नाम और नंबर दोनों दिखें। किसी से खींचवा लेना, मंगलू के लड़के से, या जिस पर भरोसा हो।"

"फोटो क्यों?"

"क्योंकि," मैंने कहा, "वो पीला बोर्ड अब सिर्फ़ बोर्ड नहीं है। वो एक काग़ज़ है। और मेरी कॉपी में आज तक जो सबसे भारी काग़ज़ आया है, वो ये है — बोर्ड पर पापा का नाम, नीचे ठाकुर ट्रांसपोर्ट का नंबर। इसका मतलब पापा का नाम सिर्फ़ किसी रजिस्टर में नहीं, सड़क पर भी चिपका हुआ है। जिसे हर गुज़रने वाला पढ़ता है।"

अम्मा चुप रही।

फिर बोली।

"अर्जुन।"

"हाँ।"

"तू वहाँ अकेला है ना?"

मैंने दूर टोल की तरफ़ देखा। एक गाड़ी गुज़र रही थी, और उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे कोई बूढ़ा आदमी सीढ़ियाँ चढ़ रहा हो।

"नहीं," मैंने कहा। "मेरे पास जुगनू है। नैना है। रुक्मा दीदी हैं। कबीर है। फूलचंद है। मैं अकेला नहीं हूँ, अम्मा। बस एक चीज़ है जो मेरे पास नहीं है।"

"क्या?"

"वो काग़ज़ हैं जिन पर पापा का असली हिसाब है। और अब मुझे पता है वो कहाँ हो सकते हैं।"

अम्मा ने साँस भरी।

"कहाँ?"

"सिमरिया में," मैंने कहा। "जिस गोदाम पर पापा का नाम लिखा है, उसी गोदाम में। क्योंकि जो आदमी चोरी का माल छिपाने के लिए जगह चुनता है, वो ऐसी जगह चुनता है जहाँ कोई ज़्यादा न पूछे। और उससे बेहतर जगह कौन सी होगी जहाँ बोर्ड पर मरे हुए आदमी का नाम लिखा हो? मरा हुआ आदमी किसी से कुछ नहीं कहता।"

फोन पर खामोशी।

"अम्मा?"

"मैं ज़िंदा हूँ," उसने कहा। "और मैं कुछ कह सकती हूँ।"

मैं मुस्कुराया।

"इसीलिए तुझे बुला रहा हूँ," मैंने कहा।

फिर मैंने एक लंबी साँस ली और वो पूछा जो पूछने से मैं डर रहा था।

"अम्मा, एक बात। सच बता। पापा उस रात घर से अकेले निकले थे?"

अम्मा चुप रही।

इतनी देर चुप रही कि मुझे लगा लाइन कट गई।

"अम्मा?"

"वो रात," उसने कहा, "तेरे पापा ने घर में खाना खाया था। दाल, रोटी, और तीन बार पानी। फिर उन्होंने अपनी जूती पहनी, और अपना वो काला रजिस्टर बगल में दबाया। मैंने पूछा — कहाँ? उन्होंने कहा — मिलने। मैंने पूछा — किससे? उन्होंने कहा — कमला, जिससे मिलना होगा।"

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