A Dark Secret – Chapter 253
"तेरे पापा ने वो गोदाम बनवाया ही नहीं," अम्मा ने काट दिया।
उसकी आवाज़ तेज़ नहीं थी। उलटी धीमी थी। और मुझे पता है, आवाज़ धीमी होने का क्या मतलब होता है। मैं खुद वही करता हूँ।
"क्या कह रही है तू?"
"मैं यही कह रही हूँ कि उस ज़मीन पर तेरे पापा ने ईंट नहीं रखवाई। ना टिन, ना दीवार, ना बोर्ड। उन्होंने तो उस जगह को देखा भी नहीं था, अर्जुन। वो ज़मीन मंडी के पीछे पड़ी बंजर थी। एक बार तेरे पापा ने कहा था कि वहाँ कुछ बन जाए तो गाँव के लड़कों को काम मिले। बस कहा था। बनवाया नहीं।"
"तो फिर काग़ज़ों पर उनका नाम कैसे आया?"
अम्मा ने कोई जवाब नहीं दिया।
मैंने कान में मोबाइल दबाया और सुना। उसकी साँस सुनाई दे रही थी, और पीछे पंप चलने की आवाज़ — हैंडपंप, जो अम्मा को बार-बार चलाना पड़ता था, क्योंकि पाइप की जोड़ में हवा आ जाती थी।
तभी उसने कहा — और ये बात उसने अब तक कभी नहीं कही थी —
"तेरी आवाज़ दबी हुई है। क्या किया तूने?"
मैंने कपड़े में लिपटी हथेली को दूसरे घुटने पर रख दिया, जैसे कोई छिपा हुआ काग़ज़ कमीज़ के नीचे सरका देता है।
"कुछ नहीं किया। थक गया हूँ, बस।"
"अर्जुन।"
"अम्मा, सच। दिन भर गाड़ी के नीचे—"
"तेरे पापा जब दिन भर गाड़ी के नीचे होते थे," अम्मा ने कहा, "तब भी ऐसे ही बोलते थे। थक गया हूँ। और उसी रात… " वो रुक गई।
आँगन में कुत्ता भौंका। एक बार। फिर चुप।
"और आज तू ऐसे बोल रहा है जैसे—"
"कैसे बोल रहा हूँ?"
"जैसे तू किसी के सामने खड़ा हो और उसे भूलने की कोशिश कर रहा हो।" उसने कहा। "जब तू छोटा था, उस बरसात में छत से गिरा था ना? तेरा घुटना फूटा था। तब भी तूने यही बोला था — कुछ नहीं हुआ अम्मा, थक गया हूँ। और जब मैंने तेरी टाँग देखी, तो उस पर से तीन काँटे निकले थे।"
मैं हँसा।
हँसी सच्ची नहीं थी, पर आवाज़ ऐसी बनाई जैसे सच्ची हो।
"अम्मा, मैं छब्बीस का हूँ।"
"तो? मैं पचास की हूँ, फिर भी तेरी आवाज़ में छेद पकड़ लेती हूँ। बता क्या किया।"
"हाथ जला है," मैंने कहा।
यही समस्या है अम्मा के साथ। जब वो आवाज़ से पकड़ लेती है, तो झूठ बोलना महँगा पड़ता है। झूठ बोलने में ऊर्जा लगती है, और मेरे पास आज ऊर्जा नहीं थी।
"कैसे जला?"
"गैराज में। आग लगी थी। बुझा रहा था।"
"कितना जला?"
"अम्मा—"
"कितना, अर्जुन?"
"थोड़ा। बाहर। ऊपर की खाल। डॉक्टर के पास नहीं जाना पड़ेगा।"
फोन पर सन्नाटा। फिर वो आवाज़ आई जो मैंने दस साल से नहीं सुनी थी — रोने से ठीक पहले वाली आवाज़। न रोना, न शांति। बस एक आख़िरी हिचकी जो गले में अटक जाती है।
"मैंने तुम्हें इसीलिए भेजा था कि तुम वहाँ नाम कमाओ," उसने कहा। "नाम कमाओ, अर्जुन। आग में नहीं।"
"अम्मा," मैंने कहा। "अब सुन।"
"सुन रही हूँ।"
"तूने कहा कि पापा ने गोदाम नहीं बनवाया। तो काग़ज़ पर नाम कैसे आया?"
अम्मा ने साँस ली। फिर वो बोली, और उसकी आवाज़ वैसी हो गई जैसी बहुत पुरानी किताब का पन्ना पलटते वक़्त होती है।
"तेरे पापा की मौत के चार महीने बाद," उसने कहा, "दो आदमी गाँव आए थे। बड़ी गाड़ी में नहीं, जीप में। एक आदमी मोटा था, एक पतला चश्मे वाला। उन्होंने मुझे काग़ज़ दिखाए — ज़मीन के, नक्शे के, बनने के। उन्होंने कहा, भाभी जी, भैया ने ज़मीन ले रखी थी, काग़ज़ पूरे हैं, हम लोग गोदाम बना देंगे, गाँव का भला होगा।"
"तूने हाँ कह दी?"
"मैंने कहा, मुझे नहीं पता। मेरे पति ने कभी ज़िक्र नहीं किया। तो वो पतला आदमी बोला — कोई बात नहीं, हम आपके पति के भाई से बात कर लेंगे।"
मैंने आँख खोली।
"चाचा से?"
"महेंद्र से।"
छत का लोहा चटका — टक। मैंने पानी में बहते हुए अपने पैर की तरफ़ देखा, और मुझे लगा कि मेरा पैर अब पहले जैसा नहीं है। सब कुछ थोड़ा ज़्यादा दूर है।
"और फिर?"
"फिर गोदाम बना। तीन महीने में। और गाँव में सब कहने लगे कि रघुवीर के नाम पर गोदाम बना है। लोग मुझे देखकर मुस्कुराते थे, अर्जुन। मुझे लगा भगवान ने सब्र का फल दे दिया।"
"और काग़ज़?"
"काग़ज़," अम्मा ने कहा, "वो काग़ज़ कभी मेरे हाथ नहीं लगे। जो पुराने काग़ज़ पापा के डिब्बे में थे, वो भी ग़ायब हो गए। मैंने तीन बार उस डिब्बे को खोला। पहली बार उसमें सब था। दूसरी बार आधा। तीसरी बार सिर्फ़ धूल थी और एक पुरानी रसीद।"
"किसने खोला?"
"मैंने किसी को नहीं देखा। पर एक दिन वो सफ़ेद रुमाल वाला आदमी आया।"
मेरी पीठ सीधी हो गई।
"सफ़ेद रुमाल वाला?"
"हाँ। सफ़ेद शर्ट, सफ़ेद रुमाल जेब में, और चलने में एक पैर थोड़ा खींचता था। मीठी आवाज़। बहुत मीठी। ऐसी कि तू सुनकर चाय पिलाने लग जाए।"
मैंने आँख बंद कर ली।
अब मेरे सामने गैराज था। आग। धुआँ। और उस भागते आदमी की आवाज़ — नहीं, आवाज़ नहीं, बू। नौसादर और तेल की बू।
"वो क्या माँगने आया?"
"तेरे पापा का रजिस्टर।"
मैंने फोन को कसकर पकड़ा।
"क्या कहा उसने?"
"उसने कहा — भाभी जी, रघुवीर भाई का एक रजिस्टर था। काली जिल्द वाला। हिसाब का। आप दे दीजिए, उसके बिना काम नहीं चलेगा।"
"तूने दिया?"
"मैंने कहा, मेरे पति का कोई रजिस्टर नहीं था।"
"और वो?"
"वो मुस्कुराया," अम्मा ने कहा। "बहुत मीठा मुस्कुराया। फिर बोला — भाभी जी, ऐसा मत कहिए। उस रजिस्टर में सिर्फ़ हिसाब नहीं था। उसमें बहुत लोगों के नाम थे। और उन नामों में एक नाम मेरा भी है। फिर उसने अपना नाम बताया।"
"क्या नाम?"
अम्मा ने साँस ली।
"मंसूर," उसने कहा। "मंसूर अली।"
मैं चुप बैठा रहा।
बरसात का पानी टिन पर गिर रहा था। नीचे जुगनू ने करवट बदली और उसकी पट्टी से एक हल्की सी कराह निकली।
"अम्मा," मैंने कहा। "ये बात तूने मुझे क्यों नहीं बताई?"
"क्योंकि तू उस वक़्त सोलह साल का था," उसने कहा। "और जिस दिन तूने पापा की गाड़ी वाला तार खोला था, उस दिन मैंने तेरी आँखें देखी थीं। तेरी आँखों में उस दिन जो था, वो मुझे अपने ही घर में अजनबी लगा। अगर मैं उस दिन ये बात बता देती, तो तू उसी रात निकल जाता। और मुझे तेरा नाम लेने के लिए कोई नहीं बचता।"
मैंने अपनी सूखी आँख को हथेली से दबाया। जली हथेली से नहीं, दूसरी से।
"अम्मा।"
"हाँ।"
"आज तूने वो आदमी देखा?"
फोन पर रुकावट आई। छोटी सी। पर मैंने पकड़ ली।
"कौन कहा?"
"तेरी आवाज़ कह रही है। तू अभी कुछ छिपा रही है। बता।"
अम्मा ने हँसी छोड़ी। इस बार हँसी में गर्व था, डर भी।
"देख," उसने कहा, "मैंने हमेशा कहा था, इस लड़के ने कान अपनी माँ से लिए हैं। हाँ, आज दोपहर उसे देखा।"
"कहाँ?"
"बस स्टैंड पर। मैं सब्ज़ी लेने गई थी। वो पनवाड़ी की दुकान पर खड़ा था। हमारे गाँव में।" उसने रुककर साँस ली। "और वो तेरा पता पूछ रहा था।"
मेरा हाथ काँपा।
सिर्फ़ थोड़ा। इतना कि फोन गले से सरक गया और मुझे उसे दोबारा कान पर रखना पड़ा।
"किससे पूछ रहा था?"
"उसी पनवाड़ी से। कह रहा था — रघुवीर का बेटा अब दिल्ली में रहता है ना? कहाँ? उसका पता क्या है?" अम्मा की आवाज़ नीचे गई। "और अर्जुन, वो पनवाड़ी कुछ बोल नहीं रहा था। वो भी मुस्कुरा रहा था। क्योंकि वो आदमी जब मीठा बोलता है, तो आदमी का मुँह बंद हो जाता है।"
मैंने आँख बंद की।
मुझे ठंड लग रही थी। बरसात की ठंड नहीं। अंदर की ठंड।
"अम्मा, तूने उससे बात की?"
"हाँ।"
"क्या कहा?"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno