A Dark Secret – Chapter 252
फूलचंद का चेहरा उतर गया।
"मैं तुझे काम दूँगा," मैंने कहा। "और काम के पैसे अलग।"
रुक्मा दीदी हँस पड़ीं।
"अर्जुन," उन्होंने कहा। "ये तो मुझे भी डरा दिया।"
"दीदी," मैंने कहा। "अब एक बात। मुझे सिमरिया जाना है। पर पहले, मुझे एक गाड़ी चाहिए जो वहाँ के लिए निकले, और वो गाड़ी ऐसी हो जिसे देखकर कोई न रोके।"
"कैसी गाड़ी?"
"भरी हुई," मैंने कहा। "आधी रात को। और मुझे उस गाड़ी में बैठना है। छिपकर।"
रुक्मा दीदी ने मुझे देखा। फिर उन्होंने फूलचंद की तरफ़ देखा।
"काम की बात है," उन्होंने कहा। "ढाबे की चाय ठंडी हो गई।"
मैंने कटोरा उठाया। चाय ठंडी थी, पर मैंने पी ली।
क्योंकि ठंडी चाय में भी एक बात होती है — वो कहती है कि इंतज़ार खत्म हुआ।
फूलचंद ने अपना थैला उठाया और चला गया — काम पर, अपनी मंडी। लेकिन जाते-जाते वो एक बार रुका और पीछे देखा। उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर रुक्मा दीदी की तरफ़ देखा, और फिर वो बोला जो किसी लोडर ने मेरे सामने पहली बार बोला था —
"अर्जुन भाई," उसने कहा। "मैं तो सिर्फ़ रोटी का आदमी हूँ। पर जिस दिन तुम सिमरिया जाओगे, उस दिन मुझे भी बुला लेना। मैं गाड़ी के नीचे बैठकर फाटक देखूँगा। मेरी आँखें रात में तेज़ हैं।"
और वो चला गया।
मैं बैठा रहा।
काग़ज़ हाथ में था। सिमरिया लिखा हुआ।
नैना ने अपनी कॉपी खोली और पंद्रहवें काग़ज़ के नीचे सोलहवाँ जोड़ा — फूलचंद की गवाही, फटी गेट पास, और सिमरिया गोदाम का लंगड़ा आदमी।
फिर उसने कॉपी बंद की।
"अर्जुन," उसने कहा। "तिवारी की कॉपी तूने ले ली?"
"ले ली।"
"तो अब कुल कितने काग़ज़?"
"सोलह," मैंने कहा। "और एक चप्पल का टुकड़ा।"
नैना मुस्कुराई। फिर वो गंभीर हो गई।
"तू सिमरिया जाएगा," उसने कहा। "और मैं?"
"तू यहीं रहेगी," मैंने कहा। "क्योंकि अगर मैं सिमरिया जाकर लौटा और लौटकर पाया कि यहाँ काग़ज़ जल गए हैं, तो मैं किसके पास आऊँगा?"
नैना ने सिर हिलाया।
फिर उसने कुछ कहा जो सिर्फ़ हम दोनों के बीच का था, और जिसे किसी ने नहीं सुना।
"अर्जुन," उसने कहा, "अगर वहाँ फँस गया, तो?"
मैंने कटोरा मेज़ पर रखा।
"फँसा तो," मैंने कहा, "मैं चिल्लाऊँगा नहीं। मैं कान लगाकर सुनूँगा। जो गाड़ी मुझे ले जाएगी, वही मुझे लौटाएगी।"
और उस पल, बहुत दूर, टोल की तरफ़ से, एक गाड़ी गुज़री — धीमी, भारी, घरघराती — वही आवाज़ जो कल रात मुँह पर कपड़ा बाँधे बोलती थी।
मैंने कान उठाया।
पर इस बार गाड़ी रुकी नहीं।
गुज़र गई।
और उसके जाने के बाद, गैराज की छत का लोहा एक और बार चटका — टक।
मैंने काग़ज़ को अपनी जेब में रखा, कटोरा उठाया, और रुक्मा दीदी से कहा —
"दीदी, आज से हर चाय मेरी कॉपी में।"
रुक्मा दीदी ने मेरी तरफ़ देखा।
"क्या?"
"हर चाय," मैंने कहा। "जो भी पिए। ड्राइवर, लोडर, मुनीम, गार्ड। सब। कॉपी में नाम, गाड़ी, और वक़्त।"
"क्यों?"
"क्योंकि," मैंने कहा, "आज शाम जब यहाँ कोई आएगा और पूछेगा कि अर्जुन कहाँ गया, तो तुम कह देना कि वो चाय का हिसाब लिख रहा था। और उस वक़्त मैं सिमरिया की तरफ़ जा रहा होऊँगा।"
रुक्मा दीदी हँस पड़ीं। ज़ोर से, ढाबे के शोर जैसी हँसी।
"अर्जुन," उन्होंने कहा, "तूने मेरी कॉपी का काम शुरू करवा दिया। अब ये कॉपी बंद नहीं होगी।"
"अच्छी बात है," मैंने कहा।
और फिर मैंने फूलचंद के दिए काग़ज़ को जेब से निकालकर एक बार आख़िरी बार देखा — वो आधा नीला गोल, वो एक शब्द।
सिमरिया।
मैंने आकाश की तरफ़ देखा। सूरज ढल रहा था, धूल में लिपटा हुआ, जैसे कोई पुरानी गाड़ी धीरे-धीरे दूर जा रही हो।
और ठीक उसी वक़्त मुझे लगा कि पापा की घड़ी, जो मेरे हाथ में पाँच मिनट आगे चलती है, आज शायद थोड़ी और आगे बढ़ गई है।
जैसे वो कह रही हो — बेटा, अब देर मत कर।
मैंने घड़ी देखी। पाँच मिनट आगे। हमेशा की तरह।
पर आज उसमें एक बात अलग थी — वक़्त चल रहा था, रुका नहीं था।
चलना चाहिए था।
और अगला मोड़ सिमरिया था।
॥
बरसात रुक गई थी, पर छत अभी भी टपक रही थी।
मैं ढाबे के पीछे की टिन की छत पर बैठा था। घुटने मोड़कर, पीठ दीवार से टिकाकर। नीचे आँगन में रुक्मा दीदी ने काँच बिछा रखे थे, और उन काँचों पर टपकता पानी ऐसी आवाज़ कर रहा था जैसे कोई दूर से बर्तन धो रहा हो।
जुगनू नीचे बेंच पर सो रहा था। उसके दोनों पैरों पर पट्टी बँधी थी और वो करवट बदलते वक़्त हल्की सी हवा छोड़ता था, जैसे दर्द को भी चुप रहने की हिदायत दे रहा हो।
मेरी हथेली पर बँधा कपड़ा खून से सूखकर सख़्त हो गया था। छूने पर लगता था जैसे कोई औरत का हाथ पकड़े हुए है, जो कह रही हो — अब नहीं, अब मत छेड़।
मैंने मोबाइल निकाला।
स्क्रीन पर अम्मा का नाम था। उँगली ऊपर थी, पर दब नहीं रही थी। मुझे पता था, जब भी मैं देर रात फोन करता हूँ, अम्मा पहले यही पूछती है — खाना खाया कि नहीं। और आज मेरे पास उस सवाल का जवाब नहीं था। आज मेरे पास सिर्फ़ एक सवाल था, और वो सवाल अम्मा से पूछने वाला नहीं था। वो सवाल अम्मा को देना था, हाथ में थमा देना था, जैसे कोई लोहे का पुराना पुर्ज़ा थमा देता है — देखो, ये आपके घर का है क्या।
फोन मिलाया।
दो घंटी गईं। तीसरी पर आवाज़ आई।
"हाँ रे।"
पीछे चूल्हे की आवाज़ थी। लकड़ी गिरने की, फिर किसी बर्तन के ढक्कन की।
"अम्मा, तू जाग रही है?"
"मैं कब सोई थी बेटा। यहाँ का चूल्हा सोता है क्या? बता, खाना खाया?"
"खाया।"
"क्या खाया?"
मैं चुप हो गया।
अम्मा ने हँसी छोड़ी, वो हँसी जिसमें डाँट बाद में आती है।
"तू जब भी 'खाया' बोलता है ना," उसने कहा, "आवाज़ ऐसे आती है जैसे तू अपने ही मुँह से झूठ निकालकर पोंछ रहा हो। बता, क्या खाया?"
"दीदी के यहाँ से रोटी ली थी। दो।"
"दो रोटी? तेरी उमर के लड़के दो रोटी खाते हैं?"
"तीसरी खा लूँगा अम्मा। पहले एक बात पूछनी है।"
चूल्हे की आवाज़ रुक गई।
यही बात मुझे अम्मा में सबसे अजीब लगती है। वो बोलते-बोलते रुकती नहीं। वो जब रुकती है, तो समझो उसने पहले से जान लिया है कि आगे क्या आएगा।
"पूछ," उसने कहा। आवाज़ पहले से धीमी थी।
"अम्मा, बस स्टैंड के पीछे जो पुराना गोदाम है ना, मंडी की तरफ़ जाने वाली सड़क पर — वो किसका है?"
सन्नाटा।
इतना गहरा सन्नाटा कि मुझे लगा फोन कट गया। मैंने स्क्रीन देखी, लाइन चल रही थी।
"अम्मा?"
"कौन सा गोदाम?"
"बस स्टैंड के पीछे। जिस पर बोर्ड लगा है। पुराना, टिन का, ऊपर ज़ंग लगी है।"
अम्मा ने साँस भरी। वो साँस मुझे फोन से नहीं, सीधे मेरे कान के अंदर आई।
"तू वहाँ क्यों जा रहा है?"
"मैं नहीं जा रहा। मैं पूछ रहा हूँ।"
"अर्जुन।"
अब उसकी आवाज़ में चूल्हा नहीं था, बर्तन नहीं था। सिर्फ़ एक औरत थी, जो रसोई के दरवाज़े से बाहर आँगन में आ गई थी, जहाँ हवा ठंडी थी।
"तू वहाँ क्यों जा रहा है?" उसने फिर पूछा।
"अम्मा, मैं पूछ रहा हूँ कि वो गोदाम किसका है।"
"वो गोदाम," अम्मा ने कहा, और उसका हर शब्द अलग-अलग गिरा, "तेरे पापा के नाम पर है।"
मैंने आँख बंद की।
छत नीचे टपक रही थी — टप। दूर टोल की तरफ़ किसी ने हॉर्न मारा, दो बार, छोटा और बेसुरा।
"पापा के नाम पर," मैंने दोहराया।
"हाँ। काग़ज़ पर रघुवीर यादव लिखा है। बोर्ड पर भी। ग्यारह साल से लिखा है।"
"तो फिर इसमें पूछने की क्या बात थी, अम्मा? पापा का गोदाम है तो—"
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