A Dark Secret251 / 536

A Dark Secret – Chapter 251

7 min read November 6, 2026

फूलचंद का चेहरा ज़रा सिकुड़ा।

"कान नहीं पकड़ा था दीदी जी ने," उसने कहा। "बस कहा — जा, अर्जुन भाई को सब बता, और अगर एक भी बात छिपाई तो आज तेरी चाय में नमक डालूँगी। दीदी जी का नमक भी अलग होता है।"

मैं हँसा।

हम सब ढाबे पर पहुँचे।

रुक्मा दीदी आँगन में थीं। सुबह की धूप में उनका चेहरा एकदम साफ़ दिख रहा था — कल की थकान अभी चेहरे पर बैठी थी, पर आँखें पहले जैसी तेज़ थीं। उनके हाथ में लोहे का लंबा चमच था, जो उन्होंने कल कालू के सामने लहराया था।

फूलचंद ने उन्हें देखते ही हाथ जोड़ लिए।

"दीदी जी—"

"बैठ," रुक्मा दीदी ने कहा। "रोटी लगा रही हूँ।"

उन्होंने ढाबे के बाहर की लंबी मेज़ पर दो तवे की रोटियाँ रख दीं, साथ में एक मिट्टी का कटोरा — कल वाला, जिसे उन्होंने अर्जुन के लिए रखा था।

फूलचंद ने रोटी उठाई, दोनों हाथों से, जैसे कोई प्रसाद उठाता है। फिर उसने एक बड़ा टुकड़ा तोड़ा और मुँह में डाला।

हम सब चुप बैठे रहे।

पर फूलचंद ने खाते-खाते भी कुछ नहीं कहा।

"अरे," रुक्मा दीदी ने कहा, हल्की झुँझलाहट से। "पहली रोटी खत्म होने से पहले कुछ बोल।"

"दीदी जी," फूलचंद ने मुँह भरा हुआ कहा, "मैं दो रोटी खाए बिना नहीं बोलता।"

"तो दो रोटी खा," रुक्मा दीदी ने कहा। "मैंने तेरे लिए चार बनाई हैं। कुछ बोल भी दे।"

फूलचंद ने दोनों रोटियाँ जल्दी-जल्दी खाईं, फिर एक लंबी साँस ली, और फिर बोला — बिना रुके, जैसे कोई बरसों से यही बोलना चाहता था और आज पहली बार हिम्मत आई है।

"मैं अनाज मंडी में रात में बोरियाँ उतारता हूँ," उसने कहा। "दो साल से। मुझे सब गाड़ियाँ पहचानी हैं — कौन सी सुबह आती है, कौन सी रात।"

"और?"

"और तीन बार मैंने देखा," फूलचंद ने कहा। "भरी गाड़ी आती है। दवा के बंद डिब्बे — जूट में लिपटे, सीलबंद, टिकट लगे। भरी गाड़ी को मंडी के पीछे वाली पट्टी पर ले जाते हैं। मैं वहीं बोरियाँ उतारता हूँ, तो दूर से दिखता है।"

"तो क्या करते हैं वो?"

"डिब्बे उतारकर सफ़ेद गाड़ी में डाल देते हैं," फूलचंद ने कहा। "सफ़ेद गाड़ी— जिसके पीछे नंबर की जगह गोल नीला निशान है। फिर भरी गाड़ी को छोड़ देते हैं — खाली, बिना माल।"

"फिर?"

"फिर वही गाड़ी सुबह होते ही रजिस्टर में 'रास्ते का नुकसान' बन जाती है," फूलचंद ने कहा। "मैंने एक बार लोडर का हिसाब देखा था। एक गाड़ी जो कल रात भरी थी, आज सुबह के काग़ज़ में खाली दिखा दी गई — रास्ते में माल भारी था, गाड़ी पलटी, माल ख़राब हुआ।"

"और माल?"

"माल सफ़ेद गाड़ी में," फूलचंद ने कहा। "और सफ़ेद गाड़ी कहीं और।"

रुक्मा दीदी ने अपना चमच मेज़ पर रखा। उनकी आवाज़ धीमी हुई।

"फूलचंद," उन्होंने कहा। "कितनी बार देखा है?"

"दीदी जी," फूलचंद ने कहा। "आठ-दस बार। पर हर बार मुँह फेर लिया। हर बार सोचा — मेरा क्या लेना-देना।"

"और आज?"

फूलचंद ने अपनी आँखें उठाईं। "आज आपने बुलाया," उसने कहा। "तो मैं आ गया।"

रुक्मा दीदी ने उसकी तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।

"भोला के साथ भी यही हुआ था," उन्होंने कहा। बहुत शांत आवाज़ में, जैसे कोई तारीख़ बता रहा हो।

"क्या?" फूलचंद ने पूछा।

"भोला की गाड़ी," रुक्मा दीदी ने कहा। "वो उस रात भरी थी। सिमरिया जानी थी। फिर गाड़ी पलटी, माल ख़राब, बीमा में हादसा। और भोला…" उनकी आवाज़ लड़खड़ाई, फिर संभल गई। "भोला गाड़ी के पास मरा मिला।"

फूलचंद ने सिर झुका लिया।

कुछ देर कोई नहीं बोला। सिर्फ़ ढाबे की तरफ़ से किसी बर्तन की खनक आ रही थी और दूर टोल पर कोई ट्रक हॉर्न बजा रहा था — धीमा, दुखी, जैसे कोई बरसों से रो रहा हो।

"फूलचंद," मैंने कहा। "तुमने जो देखा, वो किसी को बताया?"

"किसी को नहीं," उसने कहा। "एक बार सोचा था — यूनियन के अमरीक भाई को बताता हूँ।"

"फिर?"

"फिर एक हफ़्ते बाद बाज़ार में यूनियन का पुराना मुनीम मिला," फूलचंद ने कहा। "वो गाड़ी के नीचे मरा मिला। बिना चालक। किसी ने हाथ नहीं लगाया।"

रुक्मा दीदी ने एक लंबी साँस ली।

"तो मुँह बंद रखा," फूलचंद ने कहा। "आज तक।"

मैंने कुछ नहीं कहा।

क्योंकि उसका डर मुझे समझ आ रहा था, और मुझे पता था कि अगर मैंने अभी "डरो मत" कहा तो वो अपनी बात वापस ले लेगा। कुछ लोगों को डर से बाहर नहीं निकाला जाता — उन्हें बस सुना जाता है, जब तक वो खुद निकलें।

"फूलचंद," मैंने कहा। "तूने कहा कि सफ़ेद गाड़ी में डिब्बे डाले जाते हैं। उस गाड़ी का नंबर पता है?"

"नंबर नहीं है," फूलचंद ने कहा।

"मतलब?"

"मतलब पीछे नंबर की जगह नीला गोल निशान है," उसने कहा। "बस।"

मैंने नैना की तरफ़ देखा। उसने अपनी कॉपी निकाली और कुछ लिखा।

फिर फूलचंद ने अपना थैला उठाया। उसके अंदर से जूट के टुकड़े निकाले, सूखी पत्ती, एक पुराना पानी की बोतल का ढक्कन — सारा कूड़ा, जो कोई लोडर दिन भर जेब में रखता है। और उस सबके नीचे से उसने एक काग़ज़ निकाला।

फटा हुआ। आधा।

एक गेट पास — मंडी के फाटक की छोटी पर्ची, जो लोडर को दी जाती है — वो अंदर आ सके, बाहर जा सके। ऊपर कोने पर छोटा नीला गोल निशान — आधा दबा हुआ, एक तरफ़ से फटा।

और पर्ची के बीच में, बड़े अक्षरों में — बस एक शब्द छपा था।

सिमरिया।

मैंने काग़ज़ अपने हाथ में लिया।

"ये कहाँ से?" मैंने पूछा।

"भरी गाड़ी के नीचे पड़ा मिला," फूलचंद ने कहा। "दो महीने पहले। रात को। मैंने उठाया, जेब में रखा, और फिर किसी को नहीं दिखाया।"

"क्यों नहीं दिखाया?"

"क्योंकि," फूलचंद ने कहा, "जिस गाड़ी के नीचे ये पड़ा था, वो अगली सुबह जल गई थी। और काग़ज़ में 'हादसा' लिख दिया गया था। दीदी जी, मुझे डर था कि अगर मैंने ये किसी को दिखाया, तो अगली सुबह मैं खुद किसी नाली में मिलूँगा।"

मैंने नैना की तरफ़ देखा। उसकी आँखें चमक रही थीं।

"अर्जुन," उसने कहा। "सिमरिया।"

"हाँ," मैंने कहा। "मेरा क़स्बा।"

रुक्मा दीदी ने आवाज़ नहीं निकाली। बस मेरी तरफ़ देखती रहीं।

"अब एक आख़िरी बात," फूलचंद ने कहा, और उसकी आवाज़ एकदम धीमी हो गई। वो मेज़ के किनारे झुका, जैसे बहुत छोटी आवाज़ में कुछ कहना चाहता हो। "मंडी में एक बात चलती है। सब लोडर जानते हैं, पर कोई बोलता नहीं।"

"क्या?"

"सिमरिया गोदाम," फूलचंद ने कहा। "वहाँ जो भी माल जाता है — कोई नहीं जानता कहाँ जाता है। और उस गोदाम पर…"

वो रुक गया।

"क्या?" मैंने पूछा।

"उस गोदाम पर एक लंगड़ा आदमी पहरा देता है," फूलचंद ने कहा। "रात-दिन। हाथ में सफ़ेद रुमाल रहता है। वो रुमाल ऐसे पकड़ता है जैसे कोई तलवार पकड़ता हो।"

और फिर, मेरी तरफ़ देखकर, उसने वो कहा जो मुझे पता था, पर सुनकर भी रीढ़ में ठंडी लकीर उतर गई —

"लोग कहते हैं," फूलचंद ने कहा, "वो लंगड़ा आदमी हँसता बहुत है। और जब हँसता है, तो पहले रुमाल मुँह पर रखता है, फिर हँसता है।"

मैं शांत बैठ गया।

और ढाबे की चूल्हे की आग, जो अभी तक धीमी थी, एक पल के लिए तेज़ भड़की — जैसे मेरे अंदर भी कुछ जल उठा हो।

मंसूर अली।

सफ़ेद रुमाल वाला।

लंगड़ा।

सिमरिया।

मैंने काग़ज़ को सीधा किया और फिर से पढ़ा — वो आधा नीला गोल, वो एक शब्द।

"फूलचंद," मैंने कहा। "तेरी कोई गाड़ी है?"

"नहीं," उसने कहा।

"तेरे पास पैसे हैं?"

"नहीं," उसने कहा। "दो रोटी के सिवा कुछ नहीं।"

"तो सुन," मैंने कहा। "आज से तू मेरे साथ है। और मैं तुझे रोटी नहीं दूँगा।"

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