A Dark Secret – Chapter 245
फिर उसने बहुत धीरे कुछ कहा।
“सर।”
“हाँ।”
“एक बात है जो मैंने अब तक नहीं बताई,” उसने कहा।
मैंने कॉपी बंद कर दी।
“बता।”
“कल शाम,” टीटू ने कहा, “उस आदमी के जाने के बाद, मैं काउंटर पर वापस गया। मेरा फ़ोन बज रहा था। अजीब नंबर था। मैंने उठाया।”
“उसने क्या कहा?”
“उसने मेरा नाम लिया,” टीटू ने कहा और उसकी आवाज़ टूटने लगी। “उसने कहा — टीटू, तू अपने नाके पर सुबह से शाम तक बैठता है, तुझे सब दिखता है, पर तेरी आँखें बंद रहें तो अच्छा है।”
“आवाज़ कैसी थी?” मैंने पूछा।
“धीमी,” उसने कहा। “बहुत धीमी। जैसे कोई हर शब्द से पहले सोच रहा हो।”
मेरी छाती में कुछ हिला।
वही आवाज़। वही धीमी, नपी-तुली आवाज़ — जो अमरीक के घर के बाहर सफ़ेद गाड़ी से आई थी।
“फिर?” नैना ने पूछा।
“फिर मैंने पूछा — सर आप कौन?” टीटू ने कहा। “और उसने कहा — जिसका नाम काग़ज़ पर नहीं होता, वो फ़ोन पर भी नहीं बोलता।”
टीटू ने साँस ली, जैसे कोई बहुत देर तक पानी के नीचे रहा हो।
“फिर उसने एक बात कही,” उसने कहा। “और मैं उस बात को दो दिन से अपने अंदर रखे हुए हूँ और अब रख नहीं पा रहा।”
“कह दे,” मैंने कहा।
टीटू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें लाल थीं।
“उसने कहा —” टीटू का गला सूख गया, उसने निगलकर मुँह गीला किया, “— कि आठ तारीख़ की फ़ाइल अब भी उसी पुराने ट्रक में है।”
ढाबे का शोर एक पल के लिए रुक गया।
मुझे लगा जैसे किसी ने यहाँ की हवा का रास्ता बदल दिया हो।
“कौन सा पुराना ट्रक?” रुक्मा दीदी ने पूछा। उसकी आवाज़ में वो चीज़ आ गई जो अब आती जा रही थी — डर नहीं, गुस्सा।
“मुझे नहीं पता,” टीटू ने कहा। “मैंने पूछने की हिम्मत नहीं की।”
“और आठ तारीख़?” नैना ने कहा। “आठ तारीख़ क्या है?”
मैं उठ खड़ा हुआ।
मैं ढाबे के बाहर गया। धूप अब हल्की हो रही थी, और टोल की तरफ़ से हवा में पहली बार ठंडक आई थी — बरसात से पहले वाली ठंडक, जो रास्ते पर धूल नहीं उड़ने देती, बस दबा देती है।
मैंने अपनी कॉपी निकाली और आठवें घर के नीचे देखा। फिर नौवें में। फिर दसवें में।
कोई नहीं।
फिर मैंने आख़िरी पन्ना पलटा और वहाँ, सबसे नीचे, जहाँ मैंने कभी कुछ नहीं लिखा था — पापा की लिखाई में एक पंक्ति थी जो मैंने पहले नहीं पढ़ी थी।
सिर्फ़ दो शब्द थे।
आठ को।
मैंने उँगली उस लिखाई पर रखी और कुछ देर वहीं रुका।
पापा ने ये कब लिखा? किस रात? किस काग़ज़ को देखकर?
“अर्जुन,” नैना ने पीछे से कहा। “क्या हुआ?”
“कुछ नहीं,” मैंने कहा और कॉपी बंद कर दी। “बस ये समझ आया कि आठ तारीख़ कोई तारीख़ नहीं है। आठ तारीख़ एक काग़ज़ है। और वो काग़ज़ पापा के पास था।”
“तो वो पुराने ट्रक में कैसे पहुँचा?”
“इसीलिए,” मैंने कहा। “क्योंकि जो ट्रक कभी पलटा था, वो कबाड़ में नहीं गया। वो अभी भी कहीं खड़ा है।”
रुक्मा दीदी बाहर आई। उसने अपने हाथ पोंछे और मेरे बगल में खड़ी हो गई।
“बूढ़ा शेर याद है?” उसने कहा।
“क्या मतलब?”
“तूने उसे कबाड़ के भाव पर उठाया था,” उसने कहा। “क्योंकि उसे कोई नहीं खरीद रहा था। क्योंकि वो किसी की नज़र में मरा हुआ था।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“तो उस शहर में कितने ट्रक ऐसे हैं,” उसने कहा, “जो मरे हुए हैं, पर कबाड़ में नहीं गए?”
मेरी साँस रुकी।
“मतलब मुझे गाड़ी महल जाना है,” मैंने कहा।
“नहीं,” उसने कहा। “तुझे उस आदमी के पास जाना है जो कबाड़ बेचता है और किसी को बताता नहीं कि वो क्या बेच रहा है।”
“लाला जी?”
“लाला जी रद्दी बेचता है,” रुक्मा दीदी ने कहा। “पर उसके पीछे एक और है, जो पुराने ट्रकों का हिसाब रखता है।”
“कौन?”
“वो जिसके पास मेरी कॉपी गई थी,” उसने कहा। “यूनियन का पुराना मुनीम।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा और मुझे लगा कि धूप अचानक ठंडी हो गई है।
“वो ज़िंदा है?”
“ग्यारह साल से मैं भी यही सोचती आई हूँ,” रुक्मा दीदी ने कहा। “पर आज तेरी बात सुनकर लग रहा है कि शायद वो मरा नहीं। शायद उसे भी किसी ने उसी कबाड़ में खड़ा कर दिया जहाँ कोई नहीं ढूँढता।”
मैंने कॉपी जेब में रखी।
टीटू बाहर आया। उसके हाथ में अब भी थैला था।
“सर,” उसने कहा। “मैं नाके पर नहीं लौटूँगा।”
“नहीं लौटेगा,” मैंने कहा।
“पर मेरी चप्पल वहीं है,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ हास्य जैसा आया। “एक।”
मैं हँस पड़ा — इस बार सच में।
“ले आएँगे,” मैंने कहा। “पर एक काम कर।”
“क्या?”
“आज रात तू रुक्मा दीदी के पास सो।”
“और मेरा काम?”
“तेरा काम अब ये है,” मैंने कहा, “कि तू ये बताए कि उस रजिस्टर के कितने पन्ने हैं और उनमें से कौन से पन्ने पहले भी फटे हैं।”
टीटू ने सोचा।
“अट्ठाईस पन्ने हैं,” उसने कहा। “और तीन फटे हैं। ये पहला है।”
“तो बाक़ी दो किसके पास हैं?”
“एक मेरे पास,” उसने कहा। “और एक…”
वो रुक गया।
“एक किसके पास?”
“एक उसी दिन गया था,” टीटू ने कहा, “जिस दिन उस रजिस्टर की पहली फोटोकॉपी बनी थी।”
मैंने नैना की तरफ़ देखा।
“फोटोकॉपी कहाँ बनी?” मैंने पूछा।
“टोल के पीछे, रद्दी की दुकान पर,” टीटू ने कहा। “लाला जी की दुकान पर मशीन है। वहीं से हर काग़ज़ की कॉपी जाती है।”
मैंने आसमान की तरफ़ देखा। बादल आ रहे थे — पहले हल्के, फिर भारी। बरसात शहर के ऊपर खड़ी थी, जैसे किसी ने हाथ ऊपर उठाया हो।
“नैना,” मैंने कहा। “अब हम मंसूर के पीछे नहीं जा रहे।”
“तो?”
“अब हम उसके काग़ज़ के पीछे जा रहे हैं,” मैंने कहा। “क्योंकि जिसकी फ़ाइल किसी पुराने ट्रक में पड़ी है, वो फ़ाइल अब किसी और के पास नहीं जानी चाहिए।”
मैंने बूढ़े गार्ड की तरफ़ देखा। वो अब भी वहीं खड़ा था, हाथ जोड़े हुए।
“तू भी एक काम कर,” मैंने कहा। “टोल के पीछे चौथी ईंट के पीछे, जहाँ से तूने ये पत्ती निकाली — वहाँ अब कुछ मत रख।”
“क्यों?”
“क्योंकि जो आदमी दो साल से वहाँ काग़ज़ रखवाता आया है, वो उस जगह को जानता है,” मैंने कहा। “और जिस जगह को दुश्मन जानता हो, वो जगह अब बेकार है।”
गार्ड ने सिर हिलाया और चला गया।
मैं ढाबे की बेंच पर लौट आया।
टीटू अब भी वहीं बैठा था, और उसके सामने रुक्मा दीदी ने एक और रोटी रख दी थी।
“खा,” उसने कहा। “तेरा नाका आज बंद है। पर तेरा पेट नहीं।”
टीटू ने रोटी उठाई और उसने पहली बार मेरी तरफ़ देखकर कुछ कहा जो धमकी नहीं था, और डर भी नहीं था।
“सर,” उसने कहा, “मैंने दो दिन में बहुत सोचा। ये शहर जिसे चलाता है, वो कभी नाके पर नहीं आता। वो बस फाइल में रहता है।”
“हाँ,” मैंने कहा।
“और फाइल कभी नहीं पूछती कि नाके पर कौन बैठा है।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“इसीलिए,” मैंने कहा, “अब हम फाइल के अंदर जा रहे हैं।”
बाहर गाड़ी आई। इंजन की आवाज़ बोल रही थी — धीमी, थकी, पर जानी-पहचानी। कबीर की साइकिल नहीं थी, कोई और था। मैंने कान उठाया — पुराना मफ़लर, फटा, दो चटक। नैना ने मेरी तरफ़ देखा, मैंने सिर हिलाया।
“ये गाड़ी आज सुबह भी आई थी,” मैंने कहा।
“कौन सी?”
“वो जो दो दिन से ढाबे के आगे तीन बार घूम रही है,” मैंने कहा।
“और तूने अभी बताया?”
“मैंने अभी पहचानी,” मैंने कहा।
मैं उठा।
बरसात की पहली बूँद तिरपाल पर गिरी और एक गोल निशान बना गई — छोटा, फैलता हुआ, ठीक वैसा ही जैसा काग़ज़ों पर वो नीला गोल।
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