A Dark Secret244 / 536

A Dark Secret – Chapter 244

7 min read November 6, 2026

“अर्जुन, हम मुनीम की कॉपी से मिला रहे हैं?” नैना ने पूछा।

“हाँ,” मैंने कहा। “क्योंकि जो काग़ज़ टीटू लाया है, वो उसी रजिस्टर का पन्ना है जिसकी कार्बन कॉपी मुनीम के पास है।”

मैंने पन्ने को सीधा किया और उँगली उस नंबर पर रखी।

गाड़ी का नंबर — चार दो छब्ब एक।

वही नंबर जो सातवीं नई बीमा पर्ची पर था। वही नंबर जो नैना के उस नीली स्याही वाले काग़ज़ पर था।

“देख,” मैंने कहा।

नैना झुकी।

“ये लाइन,” मैंने कहा और उँगली पन्ने पर घुमाई। “ऊपर भार लिखा है — सत्ताईस हज़ार उन्नीस सौ। नीचे भार लिखा है — खाली।”

“एक ही गाड़ी?”

“एक ही गाड़ी,” मैंने कहा। “और देख, तारीख़ दोनों जगह सत्ताईस सितंबर। सुबह की रसीद में गाड़ी भरी है। शाम की रसीद में गाड़ी खाली है।”

नैना ने अपनी कॉपी निकाली और उसमें इस चौदहवें काग़ज़ के बाद एक पंद्रहवाँ जोड़ने लगी। उसकी उँगलियाँ तेज़ थीं, कलम की नोक काग़ज़ पर चरमरा रही थी।

“मतलब गाड़ी अंदर गई भरी,” उसने कहा, “और निकली खाली।”

“नहीं,” मैंने कहा। “मतलब गाड़ी अंदर गई भरी, और खाली निकली — पर वो माल कहीं गया तो होगा।”

“कहाँ?”

“वहाँ जहाँ उसका कोई काग़ज़ नहीं,” मैंने कहा। “और जहाँ काग़ज़ नहीं, वहाँ नीला गोल निशान है।”

टीटू ने चाय का कटोरा दोनों हाथों से उठाया और घूँट भरा।

“सर,” उसने धीरे से कहा, “मैं सच में सिर्फ़ रसीद काटता हूँ।”

“पता है,” मैंने कहा।

“मैं यही कहता हूँ हर बार। और हर बार कोई मुझे डाँटता है।”

“तो तेरी नकल कौन करता है?” रुक्मा दीदी ने पूछा, कड़ाही में रोटी पलटती हुई।

“जुगनू,” टीटू ने कहा। “वो मेरी नकल करता है।”

और जैसे तार में गिरी चिड़िया उड़ जाए, वैसे ही ढाबे की दीवार के पीछे से जुगनू निकला — आधा पैर पर पट्टी, आधा नंगा, हाथ में टूटी पतंग।

“सर,” उसने गले से बिल्कुल टीटू जैसी पतली आवाज़ निकाली और आँखें सिकोड़ लीं, “मैं तो सिर्फ़ रसीद काटता हूँ, सर। गाड़ी का भारी होना मेरा काम नहीं, सर। मेरा काम सिर्फ़ मोहर मारना है, सर।”

बेंच पर बैठे दो ड्राइवर हँस पड़े। मैंने देखा — टीटू का चेहरा लाल हो गया।

“बंद कर अपनी नकल,” वो झुँझलाकर बोला। “तू क्या जाने मेरे काम में क्या होता है।”

“मैं क्या जानूँ?” जुगनू ने कहा और बेंच पर चढ़ गया। “मैं तो रोज़ तेरे काउंटर के पीछे बैठा रहता हूँ। तुझे पता है तेरी दराज़ में कौन सी तारीख़ की पर्ची पड़ी है? मुझे पता है।”

“हट!”

“चार दिन पहले की,” जुगनू ने कहा। “जिस दिन तूने दो रसीदें एक ही गाड़ी को दीं और हाथ काँप रहा था।”

टीटू ने चाय का कटोरा नीचे रखा। उसका हाथ काँप रहा था, अब भी।

“जुगनू,” रुक्मा दीदी ने कहा।

जुगनू ने उसकी तरफ़ देखा।

“आ जा यहाँ,” उसने कहा और लोहे के लंबे चमच से कड़ाही से रोटी उठाई। “तू भी खा। और तू भी,” उसने टीटू की तरफ़ देखा। “दोनों की ज़ुबान एक ही चीज़ से बंद होती है — गरम रोटी से।”

रोटी जुगनू के हाथ में रखी गई और एक टीटू के हाथ में।

दोनों चुप हो गए। बस चबाने की आवाज़ बची।

मैं बेंच पर बैठ गया। धूप ढलकर ढाबे के तिरपाल तक आ गई थी और उसकी छाया मेरी मेज़ पर आधी पड़ रही थी।

तभी फाटक की तरफ़ से चप्पल की आवाज़ आई — धीमी, थकी, बूढ़ी।

बूढ़ा गार्ड उसके सामने खड़ा था। वही सफ़ेद कमीज़, वही काली बेल्ट, वही लकड़ी की टॉर्च — जो अब उसके हाथ में नहीं थी, बस कमर में खोंसी थी।

“आ जा भाई,” मैंने कहा। “बैठ।”

“नहीं,” उसने कहा। “मैं बैठूँगा तो कोई देखेगा।”

मैंने उसे देखा। उसकी आँखों के नीचे काले घेरे थे और उसकी साँस फूल रही थी।

“कब से नहीं सोया?”

“दो रात से,” उसने कहा। “क्योंकि जब मैं अपनी कोठरी में जाता हूँ, मुझे लगता है कोई दरवाज़े पर खड़ा है।”

उसने अपनी जेब से कुछ निकाला। मुट्ठी बंद थी।

“ये मैंने किसी को नहीं दिया,” उसने कहा। “दो दिन से इसीलिए बेचैन था।”

“क्या है?”

“इसे मैंने चौथी ईंट के पीछे रखा था,” उसने कहा। “उस रात, जब सफ़ेद गाड़ी टोल के पीछे खड़ी थी।”

उसकी मुट्ठी खुली।

उसके हाथ में दवा की एक पत्ती थी। चाँदी जैसी चमकती पन्नी, जिस पर छोटे-छोटे गोल घर बने थे — आधे खाली, आधे भरे।

मैंने उसे ध्यान से देखा। मैंने पत्ती के किनारे पर उँगली फेरी — एक-एक करके, बहुत धीरे, जैसे कोई अंधा सिक्का पहचानता है।

“लेबल सादा है,” नैना ने कहा।

“हाँ,” मैंने कहा। “सादा है। पर देख।”

मैंने पत्ती को धूप की तरफ़ उठाया।

लेबल का कोना मुड़ा हुआ था। और उस मुड़े कोने के नीचे — नीली स्याही।

एक गोल। आधा दबा हुआ, आधा छूटा हुआ।

“यही निशान है,” नैना ने धीरे से कहा।

“यही है,” मैंने कहा और पत्ती को बेंच पर रख दिया।

मैं बैठ गया। मेरे पेट में कुछ ठंडा फैलने लगा।

बीमा के काग़ज़ों पर नीला गोल। टोल की रसीदों पर नीला गोल। पापा की पीली टोल पर्ची पर नीला गोल। और अब — दवा की पत्ती पर भी।

“नैना,” मैंने कहा, “ये निशान सिर्फ़ काग़ज़ों पर नहीं होता।”

“मतलब?”

“मतलब जो आदमी काग़ज़ पर मोहर मारता है, वो सामान पर भी मारता है। और जो सामान पर मोहर मारता है, वो सामान का मालिक भी हो सकता है।”

गार्ड ने पत्ती की तरफ़ देखा, फिर अपने पैरों की तरफ़।

“वो गाड़ी,” उसने कहा। “मैंने उसका पीछे वाला दरवाज़ा खुला देखा था।”

मेरा सिर उठा।

“कब?”

“उस रात,” उसने कहा। “जब वो फाटक पर रुकी थी। मैं उधर गया तो उसने हाथ से इशारा किया — जाओ, कुछ नहीं हुआ। और फिर जब वो निकली तो पीछे का दरवाज़ा बंद नहीं हुआ था। हवा से खुलता-बंद हो रहा था।”

“और अंदर क्या था?”

“कुछ नहीं दिखा,” उसने कहा। “बस… एक बड़ा सा लकड़ी का डिब्बा, जिस पर जूट लिपटा था।”

मैंने आँखें बंद कीं।

मुझे याद आया — बल्लू की चारपाई के नीचे वाला डिब्बा। जूट में लिपटा, सरिता कार्गो का टिकट, नीला गोल निशान, रस्सी की गाँठ पर तेढ़ी लाल मोहर। चालीस किलो का डिब्बा, जिसमें सफ़ेद पाउडर की पुड़ियाँ निकली थीं।

वही डिब्बा।

वही जूट। वही गोल निशान।

“मुझे गाड़ी नहीं चाहिए,” मैंने धीरे से कहा।

नैना ने देखा।

“मुझे उस गाड़ी का पीछे वाला डिब्बा चाहिए,” मैंने कहा। “गाड़ी बदल जाती है, नंबर बदल जाता है, रंग बदल जाता है। पर डिब्बा नहीं बदलता। और जो डिब्बा एक बार दवा का ले जाता है, वही डिब्बा अगली बार अनाज ले जाता है, और उसके बाद बोरी। उसी डिब्बे में चार सौ उन्नीस की रसीद चली जाती है।”

“और वो डिब्बा अब कहाँ है?” रुक्मा दीदी ने पूछा, आवाज़ में वो ठंडक जो सिर्फ़ उसके पास है।

मैंने अपनी कॉपी निकाली और उसे खोला।

“ये गाड़ी चार दो छब्ब एक,” मैंने कहा। “सातवीं बीमा पर्ची पर। सातवें घर के नीचे।”

“और आठवाँ?”

“आठवाँ खाली है,” मैंने कहा। “मैंने उसी में नाम डालने के लिए जगह छोड़ी थी।”

नैना ने मेरी तरफ़ देखा।

“अब भरने का वक़्त आ गया है,” उसने कहा।

“नहीं,” मैंने कहा। “अब तक जो नाम मुझे पता थे, वो सब गाड़ियों के थे। अब पहली बार मुझे आदमी का नाम पता लगा है। और वो नाम मेरी कॉपी के आठवें घर में नहीं जाएगा।”

“तो कहाँ?”

“बारहवें में,” मैंने कहा। “क्योंकि यहाँ तक सब गाड़ियाँ थीं। अब आदमी शुरू होते हैं।”

टीटू अब तक चुप था। वो बेंच पर बैठा रोटी के टुकड़े को अँगूठे से दबा रहा था और उसकी आँखें ढाबे के फर्श पर टिकी थीं।

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