A Dark Secret – Chapter 246
मैंने अपनी कॉपी जेब में रखी और ढाबे के बाहर देखा।
शहर वैसा ही था। सड़क वैसी ही थी। पर अब उस सड़क पर एक ट्रक का नाम था जो कभी पलटा था और जो कबाड़ में नहीं गया — और उस ट्रक के पीछे वाले डिब्बे में एक फ़ाइल रखी थी, जिसका नाम आठ तारीख़ था।
और मैंने ठान लिया कि उस फ़ाइल को पहले मैं खोलूँगा।
क्योंकि पापा ने उसे अपनी कॉपी में लिखा था, और पापा की लिखाई कभी झूठ नहीं बोलती थी।
॥
बरसात की पहली बूँद तिरपाल पर गिरी और एक गोल निशान बना गई। छोटा, फैलता हुआ — ठीक वैसा जैसा काग़ज़ों पर वो नीला गोल।
मैंने अपनी कॉपी जेब में रखी और ढाबे के बाहर झाँका।
गाड़ी अब भी वहीं थी — सड़क पार, पीपल के नीचे, बत्ती बंद, इंजन बंद। पर उसका पुराना फटा मफ़लर ठंडा होते-होते भी चटक रहा था, जैसे कोई बूढ़ा आदमी नींद में खाँस रहा हो।
मैंने जुगनू की तरफ़ देखा। वो बेंच पर बैठा था, पैर सामने फैलाए। रुक्मा दीदी ने उसके तलवों पर मरहम की पट्टी बाँधी थी, और पट्टी के ऊपर से भी लाल झाँक रहा था।
"जुगनू," मैंने कहा। "गैराज चलेगा।"
वो तुरंत उठा। "मैं चलूँगा।"
"तू नहीं चलेगा। तेरे पैर जले हैं।"
"तो तू अकेला जाएगा, वहाँ कोई तुझे लाठी मार देगा, और मुझे कल पता चलेगा।" उसने ठुड्डी ऊपर की। "मैं चलूँगा।"
रुक्मा दीदी ने उसकी तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।
"ले जा," उसने कहा। "ये जितना छोटा दिखता है, उतना छोटा नहीं है। ढाबे के बाहर जो गाड़ी तीन दिन से घूम रही है, उसका नंबर इसने पहचाना था, मैंने नहीं।"
नैना ने अपना बैग उठाया।
"मैं भी चलूँगी।"
"नहीं," मैंने कहा। "तू यहीं रुक। अगर हम दो घंटे में न लौटें, तो तेरे पास जो काग़ज़ हैं, वो सीधे उस आदमी के पास जाएँ जिस पर तू सबसे कम भरोसा करती है। क्योंकि उसी के पास जाने से सबसे ज़्यादा डर है।"
नैना ने मुँह बनाया। "ये तेरी नई आदत है — मुझे बाहर रखना।"
"ये आदत नहीं, हिसाब है," मैंने कहा। "अगर हम दोनों एक ही जगह फँसे, तो काग़ज़ अकेले पड़े रह जाएँगे। काग़ज़ अकेले बेकार हैं।"
वो कुछ कहने ही वाली थी कि रुक्मा दीदी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"रुक," उसने कहा। "ये ठीक कह रहा है। तू बैठ।"
नैना बैठ गई, पर उसका चश्मा नाक पर सरक गया था — और यही उसका गुस्सा था।
बाहर बरसात तेज़ हो रही थी।
मैंने जुगनू का हाथ पकड़ा, और हम निकल पड़े।
सड़क पर पानी की पतली परत बह रही थी और उस पर ट्रकों की लाइटें टूटती हुईं सफ़ेद लकीरें बना रही थीं। रास्ते में एक भारी ट्रक मिला — पीछे से बोरों का पहाड़ — उसकी बेयरिंग घरघरा रही थी, जैसे उसके अंदर कोई दबी हुई बिल्ली हो।
"सुना?" मैंने पूछा।
जुगनू ने कान ऊपर किए। "बेयरिंग।"
"किसकी?"
"वो जो किशन भाई के साथ ढाबे पर चाय पीता था — दुबला, काली टोपी — उसके ट्रक की। मैंने इसकी घरघराहट दो महीने पहले सुनी थी। तब हल्की थी। अब बिगड़ रही है।"
"हाँ," मैंने कहा। "और वो ड्राइवर खुद नहीं जानता। पर वो चलाता रहेगा, क्योंकि दो हज़ार रुपये का पुर्ज़ा उसके पास नहीं है।"
जुगनू कुछ देर मेरी तरफ़ देखता रहा।
"तू हर बात में किसी का नाम कैसे निकाल लेता है?"
"नाम नहीं निकालता," मैंने कहा। "आवाज़ याद रखता हूँ। बाक़ी खुद जुड़ जाता है।"
गैराज का फाटक खुला था — तिवारी के छापे के बाद जिसने भी बंद किया था, वो ठीक से नहीं किया। अंदर अंधेरा था, और तेल की बू, गीली मिट्टी की बू, और हल्की जली हुई चीज़ की बू — जो उस रात की जली हुई गठरी से आज तक गई नहीं थी।
मैंने बत्ती जलाई।
ट्रक गैराज के पिछले कोने में खड़ा था — सफ़ेद रंग, दो जगह से पपड़ी छोड़ता हुआ। पीछे वाला डिब्बा ऐसा जैसे कोई बूढ़ा आदमी कमर झुकाए खड़ा हो। पीछे पर वही नीला गोल — फीका, आधा, जैसे किसी ने उँगली से पोंछ दिया हो।
यह वही ट्रक था जो नीलामी वाले दिन राठौर की पुरानी फ़्लीट के कोने में खड़ा था — बिना नंबर, बिना तख़्ती। किसी ने उस पर भाव नहीं बढ़ाया था। मैंने आधार भाव पर उठा लिया था — एक हज़ार आठ सौ रुपये में। मुँह पर दो लोगों ने हँसी भी उड़ाई थी कि अर्जुन यादव को कबाड़ के अलावा कुछ दिखता ही नहीं। पर उस दिन मुझे कुछ और सुनाई दिया था। जब यह ट्रक यार्ड में खींचा गया था, तो इसके अंदर से एक हल्की सी घिसट आई थी। जैसे किसी चीज़ ने अपनी जगह खिसकने की कोशिश की हो।
तब मैंने सोचा था — ढीला पुर्ज़ा।
आज पता चलने वाला था कि वो पुर्ज़ा नहीं था।
मैंने ट्रक के चारों तरफ़ घूमकर देखा। सफ़ेद रंग के नीचे से जगह-जगह लाल ज़ंग झाँक रहा था। पिछले डिब्बे में जाने वाला कैनवास का परदा सड़ चुका था और उसका एक कोना हवा में हिल रहा था। कैबिन का दरवाज़ा खुला था, और कैबिन के अंदर रखी सीट पर पानी की बूँदें गिर चुकी थीं।
"इसकी छत अंदर से खोखली है," जुगनू ने कहा। "मैंने ऐसी सफ़ेद गाड़ियों में एक बार सोया था — महीने भर पहले, जब बारिश आई थी। उनकी छत के अंदर रुई जैसी चीज़ भरी होती है, गरम रहती है।"
"हाँ," मैंने कहा। "पर यहाँ रुई नहीं।"
मैंने कान उठाया।
फिर वही — वही घिसट। हल्की। छत के अंदर। जैसे कोई चीज़ महीनों से वहीं बैठी हो और अपनी जगह से खिसकना चाहती हो।
मैंने जुगनू की तरफ़ देखा।
"सुना?"
"नहीं," उसने कहा। फिर कान ऊपर किए। "क्यों, क्या हुआ?"
"छत से आ रही है।"
मैं कैबिन के अंदर चढ़ा। छत की अंदरूनी परत दबाई — नरम थी, गीली थी, जगह-जगह से ढीली पड़ी थी। मैंने उँगलियाँ अंदर डालीं। कुछ टकराया — ठंडा, लंबा, गोल।
मैंने खींचा।
एक लोहे की नली निकली। पुरानी। मोटे मुँह वाली। ज़ंग की परत इतनी मोटी कि लगा किसी ने उस पर लाल रंग पोत दिया हो। लंबाई — लगभग तीन हाथ। मोटाई — दो अंगुल से ज़्यादा। मुँह पर पीतल का ढक्कन, जो ज़ंग में जाम था।
जुगनू ने ऊपर देखा।
"ये क्या है?"
"ये," मैंने नली को हिलाया — अंदर कुछ खिसका, "ये वो चीज़ है जिसके लिए किसी को मेरी परवाह नहीं थी, और मेरे पापा की बहुत परवाह थी।"
तभी पीछे चरमराहट हुई।
जूते। हल्के, पर सुनाई देने वाले। कोई धीरे चल रहा था, और धीरे चलने से ही पैर की आवाज़ सबसे ज़्यादा सुनाई देती है — यह मैंने चाचा के घर की सीढ़ियों से सीखा था।
मैंने जुगनू को नीचे खींचा — बस एक पल में। और मैं उसके ऊपर झुक गया, दोनों हाथ उसके सिर पर।
कुछ भी नहीं सोचा। बस झुक गया।
लाठी मेरी कमर पर पड़ी।
आवाज़ नहीं आई — मैंने उसे रोका। पर साँस रुक गई, दो पल के लिए आँखों के आगे अंधेरा हुआ, फिर वो अंधेरा फटा।
जुगनू मेरे नीचे हिला। मैंने उसका मुँह अपनी हथेली से ढका — क्योंकि चीख से उन्हें और हिम्मत मिलती है, यह मैं जानता था।
दो आदमी थे। दोनों के मुँह काले, गीले कपड़ों से बँधे थे। एक के हाथ में लाठी थी, दूसरे के हाथ में एक ज़ंग लगा कटोरा जैसा कुछ — जिसे उसने पलटकर ट्रक के पिछले हिस्से पर उलीच दिया।
तेल की बू आई। पुराना, भारी, फेंटा हुआ।
मैंने अपनी हथेली जुगनू के मुँह से हटाई और उसके कान में फुसफुसाया — "रो मत। तू मेरे पीछे आ।"
मैं उठा।
लाठी वाले ने दोबारा लाठी उठाई। मैंने अपने दोनों हाथ जेब के पास रखे। कुछ नहीं पकड़ा। यह कमज़ोरी नहीं थी। यह फ़ैसला था। मैंने उसी वक़्त ठान लिया — मैं सड़क पर या ऐसी जगह पर हाथ नहीं उमैं सड़क पर या ऐसी जगह पर हाथ नहीं उठाऊँगा।
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