A Dark Secret – Chapter 240
रात भर कोई नहीं आया।
मैं ढाबे की उसी बेंच पर बैठा रहा, जहाँ रुक्मा दीदी ने चटाई बिछा दी थी। जुगनू मेरे पास सो गया था। उसके पैरों पर हल्दी और घी का लेप सूखकर पीला पड़ गया था और वो नींद में भी बीच-बीच में पैर सिकोड़ लेता था।
रुक्मा दीदी ने लालटेन बुझा दी थी, पर अपनी आँखें नहीं बुझाई थीं। वो चूल्हे के पास बैठी रही। मुझे लगा कि वो भी रात भर सड़क सुनती रही।
मैं सुनता रहा।
दो बजे एक गाड़ी आई, दूर से, और मुड़कर चली गई।
तीन बजे कुत्ते भौंके, फिर चुप हो गए।
चार बजे किसी ने ढाबे के पीछे लोहे की बाल्टी गिराई। रुक्मा दीदी उठकर गई। वो बाल्टी उसकी अपनी थी, जो हवा से गिरी थी।
और पाँच बजे पहली चाय की केतली चढ़ी। भाप की आवाज़ आई — धीमी, लंबी साँस जैसी। मुझे लगा कि शहर भी अब जाग रहा है, हमारी तरह थका हुआ।
छह बजे जुगनू उठा और सीधा मेरे पास आकर बैठ गया।
“भैया, कोई नहीं आया?”
“नहीं।”
“तो क्या हम हार गए?”
“नहीं,” मैंने कहा। “बस ये रात बेकार गई।”
“रात बेकार कैसे गई? हमने जागकर काटी!”
“जागकर काटी तो बेकार नहीं गई,” मैंने उसका सिर सहलाया। “बस जो आने वाला था, वो डर गया। और जो डरता है, वो देर से ही आता है।”
वो मुस्कुराया और अपनी जेब से एक टूटी पतंग निकालकर बैठ गया, जैसे दुनिया का सबसे बड़ा काम हो गया हो।
सात बजे अख़बार वाला साइकिल पर आया।
रुक्मा दीदी ने मुझे अख़बार दिया और मैंने उसे खोला।
पन्ना बदला हुआ था।
मेरी खबर नहीं थी।
उस जगह पर उद्घाटन की तस्वीर थी। सफ़ेद बाल, साफ़ शर्ट, मुस्कुराता चेहरा, और नीचे मोटे अक्षरों में लिखा था — “हमें सड़कों को सुरक्षित बनाना है।”
वो एक ही लाइन थी जो वो हर मंच पर बोलता है।
मैंने अख़बार मोड़कर मेज़ पर रख दिया।
थोड़ी देर बाद नैना आई। उसका बैग कंधे से और फटा हुआ था, चश्मा नाक पर और सरका हुआ था, और आँखों के नीचे काले घेरे ऐसे थे जैसे रात भर किसी ने उसके नीचे अंगारा रखा हो।
वो आते ही बोली, बिना नमस्ते किए —
“पेज बदल गया। मेरे हाथ से निकल गया।”
“बैठ,” मैंने कहा। “चाय पी।”
“मुझे चाय नहीं चाहिए, मुझे गुस्सा चाहिए।”
“वो तेरे पास पहले से है। बैठ जा।”
वो बैठी। रुक्मा दीदी ने उसके सामने मिट्टी का कटोरा रख दिया।
“रात नौ बजे एडिटर का फोन आया,” नैना ने कहा। “ऊपर से फोन आया था। उसने कहा कि पूरा पेज हटाओ, और उसकी जगह उद्घाटन की खबर लगाओ।”
“किसने कहा?”
“उसने नाम नहीं लिया। बस इतना कहा — ऊपर से।”
मैं चाय पीने लगा।
“मैंने लिख दिया था,” वो बोली, आवाज़ भारी होकर। “मैंने तेरा नाम नहीं लिखा था, मैंने तेरे काग़ज़ों के बारे में नहीं लिखा था, मैंने सिर्फ़ ये लिखा था कि एक ही तारीख़ को बयालीस हादसे दर्ज हैं और सब में एक ही कंपनी का नाम है। बस इतना। इतना भी नहीं छपा।”
“और उसने क्या कहा?”
“उसने कहा कि अगर मैं एक और बार ये खबर लाई, तो ब्यूरो बंद, और चार लड़कों की नौकरी जाएगी। चार, अर्जुन। चार। मैंने उससे पूछा कि इन चार के घर का किराया कौन भरेगा, तो उसने फोन काट दिया।”
मैंने कटोरा नीचे रखा।
और मैं हँस पड़ा।
नैना ने मुझे ऐसे देखा जैसे मैं पागल हो गया हूँ।
“तू हँस रहा है?”
“हाँ,” मैंने कहा। “क्योंकि काग़ज़ रुक गया, पर काग़ज़ अभी ज़िंदा है।”
“ये कैसी बात है?”
“देख,” मैंने कहा, “अगर वो खबर छप जाती, तो वो काग़ज़ बन जाता। काग़ज़ जल जाता, फाड़ा जा सकता था, मिटाया जा सकता था। पर अब वो छपी नहीं। तो वो अभी काग़ज़ नहीं है। वो अभी आवाज़ है। और आवाज़ को कोई पेज से नहीं हटा सकता।”
नैना ने चश्मा ऊपर धकेला।
“तुझे पता है, तू कभी-कभी बहुत थका देने वाला होता है?”
“पता है,” मैंने कहा। “पर मैं सही होता हूँ। ये अलग बात है।”
वो हँसी। थोड़ी देर के लिए। फिर उसने अपना बैग खोला और उसमें से एक मुड़ा हुआ पन्ना निकाला।
“अच्छा, ये रख। मेरे पास पेज की कॉपी है। मैंने उसका नाम नहीं लिखा, पर जो-जो मैंने लिखा था, वो सब मेरे पास है। अगर कभी उसी पेज की ज़रूरत पड़े, तो ये रहेगा।”
“ये तो तूने बहुत अच्छा किया,” मैंने कहा।
“मैं तो कुछ नहीं कर रही,” वो बोली। “मैं तो बस गुस्से में हूँ।”
“गुस्सा भी एक काग़ज़ है, नैना। डर के मुकाबले ज़्यादा टिकाऊ।”
वो कुछ कहने ही वाली थी कि जुगनू ने सड़क की तरफ़ देखा और बोला —
“भैया, वो आया।”
मैंने कटोरा उठाया और चाय पीते हुए सड़क की तरफ़ देखा।
एक पतला, थोड़ा झुका हुआ आदमी आ रहा था। चटका चश्मा, जेब से आधा बाहर, और बाईं कलाई पर वो घड़ी जिसका पट्टा दो जगह से सिला हुआ था।
वो मुनीम था।
वो आया, पर ढाबे के बाहर रुक गया। एक बार पीछे देखा, फिर आगे बढ़ा। एक बार और पीछे देखा। फिर अंदर आया और मेरे सामने वाली बेंच पर ऐसे बैठा जैसे गिर पड़ा हो।
उसके हाथ काँप रहे थे।
उसने कुछ नहीं कहा। रुक्मा दीदी ने उसके सामने चाय रखी। उसने उसे उठाया, मुँह तक लाया, फिर वापस रख दिया, जैसे भूख नहीं, बस हाथ भरने के लिए उठाया हो।
“बनवारी लाल तेरे साथ काम करता था,” मैंने कहा। “न?”
वो चौंका। फिर उसने धीरे से सिर हिलाया।
“वो मेरे जीजा का बेटा था,” उसने कहा। “मैंने ही उसे मोहर लगाना सिखाया था। यही सिली घड़ी मैंने उसे दी थी।”
मेरे हाथ की चाय ठंडी हो गई।
“तो तू जानता है कि वो कहाँ है?”
“नहीं,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ टूट गई। “पर मुझे पता है क्यों गया।”
“क्यों?”
उसने अपनी गोद में रखा भूरा फ़ोल्डर मेज़ पर रख दिया। फिर उसे दोनों हाथों से थाम लिया, जैसे कोई बच्चा अपना बस्ता थामता है।
“मैं ग्यारह साल से राठौर लॉजिस्टिक्स के लिए लिखता आया हूँ,” उसने कहा, और आवाज़ बहुत धीमी थी। “घाटे का सर्टिफिकेट।”
“घाटे का सर्टिफिकेट?”
“हाँ। एक गाड़ी चलती है, भरी हुई, साफ़ काग़ज़ों के साथ। रास्ते में उसे लूटा हुआ दिखाना होता है। मैं वो काग़ज़ लिखता हूँ। कहाँ लूटी, कितने बजे, कौन सा माल, कितने का — सब मैं लिखता हूँ। फिर वो काग़ज़ बीमा दफ़्तर जाता है और पूरा दावा पास हो जाता है।”
“और गाड़ी?”
“गाड़ी अगले हफ़्ते फिर चलती है,” उसने कहा। “नए नंबर, नया काग़ज़, वही माल।”
मैंने अपनी जली हथेली को मेज़ पर रख दिया।
“तूने कभी सोचा नहीं कि ये गलत है?”
“सोचा,” उसने कहा, और उसका गला भर आया। “पर मेरी बेटी के स्कूल की फीस सत्ताईस को आती थी। और मेरी बीवी की दवा। और मेरा किराया। सोचता रहा, फिर लिखता रहा।”
वो चुप हो गया।
“और अब?”
“अब मैं लिख नहीं पा रहा,” उसने कहा। “रात भर बैठा रहा, काग़ज़ सामने रखा, क़लम उठाई, और हाथ नहीं उठा।”
उसने फ़ोल्डर खोला।
उसमें से एक कार्बन कॉपी निकली — नीली स्याही में उतरी हुई, पीली, पतली।
और उसके साथ एक टोल की पर्ची।
“देख,” उसने कहा, और उँगली रख दी। “ये गाड़ी। ये नंबर। ये तारीख़। ये सत्ताईस।”
मैंने देखा।
“अब देख, ये पहला नाका — बाईस नंबर। समय, शाम छह बजकर बीस मिनट।”
“हाँ।”
“और ये दूसरी पर्ची। वही गाड़ी। वही नंबर। वही तारीख़। दूसरा नाका, आगे वाला। समय, शाम सात बजे।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“चालीस मिनट,” मैंने कहा।
“चालीस मिनट,” उसने दोहराया। “और दोनों नाकों के बीच चौरासी किलोमीटर है।”
मैंने पर्ची हाथ में ली।
“चौरासी किलोमीटर, चालीस मिनट में,” मैंने कहा। “भरी हुई गाड़ी से।”
“नामुमकिन है,” उसने कहा।
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