A Dark Secret24 / 536

A Dark Secret – Chapter 24

7 min read November 6, 2026

मैंने मन में कहा — अब तू मेरा है। और मैं तुझे छोड़ूँगा नहीं।

फिर मैं गली की तरफ़ चल पड़ा। बल्लू मेरा इंतज़ार कर रहा था — और मुझे लगा कि उसके पास वो बात है जो पहले कोई नहीं बोला।

॥

गली का मोड़ आया और हवा बदल गई। बाहर सड़क पर धूल और गर्मी थी, अंदर गली में सड़ी सब्ज़ी और मिट्टी के तेल की बू। दो कुत्ते कूड़े के ढेर पर बैठे थे और मुझे देखकर हिले भी नहीं। शाम पड़ने लगी थी, पर गली में उजाला नहीं पहुँचता। यहाँ सुबह भी अंधेरा ही होता है।

मैंने ढाबे के पीछे का रास्ता लिया। दीवार पर पुराना पोस्टर चिपका था, आधा फटा हुआ, बारिश में उसका रंग बह गया था। उसी दीवार से टिककर बल्लू खड़ा था।

उसका पैर अभी भी पट्टी में था। एक हाथ दीवार पर टिका था और दूसरा हाथ जेब पर, जैसे कोई चीज़ पकड़े हुए हो। वो मुझे देखते ही सीधा खड़ा होने की कोशिश करने लगा, पर पैर ने साथ नहीं दिया और वो फिर दीवार पर आ गिरा।

"तू आ गया," उसने कहा। आवाज़ में राहत भी थी और डर भी।

"बुलाया तो आना पड़ा।" मैं उसके पास जाकर रुका। "क्या बात है बल्लू भाई? और धीरे बोल, यहाँ दीवार के उस पार भी कान हैं।"

उसने चारों तरफ़ देखा। फिर अपनी जेब से वो मोटा लिफाफा निकाला। भूरा लिफाफा, कोने से थोड़ा फटा हुआ, ऊपर कुछ लिखा नहीं था।

"ये देख।"

"मैंने कल ही देख लिया था।" मैंने कहा।

"अंदर देख।"

मैंने लिफाफा खोला। अंदर नोटों की गड्डी थी। पाँच हज़ार, पूरे। नए नोट नहीं, पुराने, मुड़े हुए। और उनके साथ एक पतली सी पर्ची, फाड़ी हुई डायरी के पन्ने पर किसी ने पेन से लिखा था — जो देखा, भूल जा।

मैंने पर्ची को दो बार पढ़ा। फिर लिफाफा बंद करके उसे वापस बल्लू की तरफ़ बढ़ा दिया।

"रख ले।"

"मैं ये नहीं रखूँगा।" उसकी आवाज़ फट गई। "मैंने सुबह से इसे छुआ भी नहीं। जब से मुझे ये जेब में मिला, मुझे लग रहा है कोई मेरे पीछे खड़ा है। तू ले जा।"

"नहीं।" मैंने उसका हाथ पकड़कर लिफाफा उसकी जेब में वापस डाल दिया। "अगर मैं इसे ले गया, तो कल कोई कहेगा कि लिफाफा अर्जुन ने लिया। और फिर तू बच नहीं पाएगा। ये तेरी जेब में मिला है, तो तेरी जेब में ही रहेगा। किसी को मत बता। और जब वक़्त आएगा, तब यही लिफाफा तेरी ढाल बनेगा।"

वो मेरी तरफ़ देखता रहा। उसकी आँखों में पानी था, पर रो नहीं रहा था। बस भीगी हुई थीं।

"तू अजीब आदमी है," उसने कहा। "दो दिन पहले तक मैं तुझे नहीं जानता था।"

"मैं भी तुझे नहीं जानता था। पर तेरा ट्रक मुझे जानता है।"

उसने सिर झुका लिया।

"अर्जुन, एक बात है।" उसने धीरे से कहा। "उस रात। टोल के पास। मैंने तेरे सामने कुछ नहीं बोला, पर…"

"बोल।"

"मेरे ट्रक के पास एक बोलेरो खड़ी थी। फटा हुआ मफ़लर, काला धुआँ। मैंने सोचा माल उतारने वाले होंगे। पर कोई माल नहीं उतरा। बस दो आदमी खड़े थे और बात कर रहे थे।"

"कौन दो आदमी?"

उसने होंठ कसे। फिर बोला, "एक तो वो है, काली माला वाला। कालू। दूसरा… दूसरा मुझे नहीं पता। उसने मुँह नहीं दिखाया। बस एक बात सुनी — उसने कहा, 'गाड़ी निकलने से पहले ही कर दो, नाके पर नहीं।'"

"और तूने कुछ नहीं किया?"

"मैंने कुछ नहीं किया।" उसने कहा। और यही बात उसकी आवाज़ में चुभ रही थी। "मैं गाड़ी में बैठ गया, चाय पी, और निकल पड़ा। मुझे लगा मेरा काम नहीं है। अब देख, मेरा काम हो गया।"

मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।

"बल्लू भाई, अभी तू कुछ मत सोच। कल सुबह गैराज आ जा। यादव मोटर गैराज। मैं वहीं मिलूँगा।"

"वहाँ चाचा हैं न?"

"हाँ।"

"तो मैं नहीं आऊँगा।" उसने सीधा मना कर दिया। "उनके सामने मैं कुछ नहीं बोल सकता।"

मैंने कुछ कहा नहीं। यही तो शक की शुरुआत थी। और मैं उसे ज़बरदस्ती नहीं तोड़ सकता था।

"तो फिर गाड़ी महल आ जा। कबीर की दुकान पर।"

"वहाँ भी… वो आदमी हिसाब रखता है। उसके सामने भी मैं नहीं बोलता।"

"तो फिर मुझे बता, तू कब बोलेगा?"

वो चुप रहा। बहुत देर चुप रहा। फिर बोला, "जब मेरे पास कुछ होगा।"

"तेरे पास क्या है?"

"मेरा ट्रक है। मोती है। पलटा हुआ, टूटा हुआ, पर है तो। जिस दिन वो फिर चलेगा, उस दिन मैं बोलूँगा।"

मैंने उसके चेहरे को देखा। उसका पैर उसकी आँखों से ज़्यादा मज़बूत था।

"ठीक है," मैंने कहा। "तू अपने मोती को संभाल। मैं अपना काम करता हूँ।"

"कौन सा काम?"

"मैंने एक ट्रक खरीदा है।"

वो हँसा। सच में हँसा। पहली बार उसकी हँसी सुनी थी, और वो बुरी नहीं थी।

"तू पागल है। दो दिन पहले आया और ट्रक खरीद लिया?"

"खरीदा नहीं। बुक किया है।" मैंने कहा। "बाकी खरीदने के लिए अभी मेरे पास चार सौ हैं।"

वो हँसता रहा। और उसकी हँसी में जो था, वो ईर्ष्या नहीं थी। वो पुरानी याद थी।

मैं गली से निकला और सीधा गाड़ी महल की तरफ़ चला। धूप ढल रही थी और कबाड़ बाज़ार में लोहे की देगची लग रही थी। रास्ते में एक ट्रक ने मुझे ओवरटेक किया, उसका साइलेंसर फटा था और आवाज़ ऐसी थी जैसे कोई बूढ़ा खाँस रहा हो। मैंने अपने आप से कहा — तेरा ट्रक इससे बेहतर है, भाई। बस थोड़ी मेहनत चाहिए।

कबीर अपनी दुकान के बाहर प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठा था और कैलकुलेटर दबा रहा था। मुझे देखते ही उसने कैलकुलेटर बंद किया, जैसे कोई राज़ छिपा रहा हो।

"लौट आया?" उसने कहा।

"लौट आया।"

"क्यों?"

"क्योंकि मेरे पास तेरे सिवा कोई नहीं है।" मैं उसके सामने खड़ा हो गया। "कबीर, मुझे तेरे साथ सीधा बोलना है। और मैं सीधा इसलिए बोल रहा हूँ क्योंकि मेरे पास वक़्त नहीं है।"

उसने मुझे देखा। उसकी आँखें छोटी हैं, पर उनमें हिसाब चलता रहता है, जैसे कोई दिमाग़ लगातार जोड़-घटाव कर रहा हो।

"बोल।"

"तेरे पास एक पीला ट्रक है। रघुवीर।" मैंने कहा।

"तेरे पास काग़ज़ है।"

"हाँ।"

"और?"

"और मेरे पास चार सौ रुपये हैं।" मैंने जेब से नोट निकाले, उसकी मेज़ पर रख दिए। हवा से एक नोट सरकने लगा, मैंने उसे कैलकुलेटर से दबा दिया। "ये पूरे चार सौ। बाकी दो हज़ार चार सौ एक हफ़्ते में। पर मुझे पता है, मैं एक हफ़्ते में नहीं दे पाऊँगा। क्योंकि जो मैं करना चाहता हूँ, वो करने में हफ़्ता नहीं, महीना लगेगा। और तू ये ट्रक मुझे महीने भर नहीं रोक सकता।"

कबीर ने नोटों को नहीं छुआ। उसने मेरी तरफ़ देखा और कहा, "तो तू क्या चाहता है?"

"मैं चाहता हूँ कि तू मेरे हाथ खाली कर दे।" मैंने कहा। "मैं उस ट्रक में जान डालूँगा। अपने हाथ से।"

वो एक पल रुका। फिर मुस्कुराया। "ये ट्रक बिक चुका है। मुझे इससे मतलब नहीं कि तू इसमें जान डालता है या इसमें सोता है। तेरे पास काग़ज़ है, तेरे पास ट्रक है। लेकिन—"

"लेकिन मेरे पास उस ट्रक के पुर्ज़े नहीं हैं," मैंने कहा। "और वो मैं तेरे बिना नहीं ला सकता।"

वो खामोश हो गया।

"कबीर," मैंने कहा, "तू जानता है उस ट्रक में क्या-क्या टूटा है? मैं जानता हूँ। मैंने उसे छूकर सुना है। उसका इंजन बंद नहीं है, उसकी साँस रुकी है। उसका हेड गैसकेट जला हुआ है। उसका एक पिस्टन रिंग टूटा है। क्लच प्लेट घिसी है। ब्रेक की पाइप में हवा है। बैटरी मरी है। टायरों की हालत ऐसी है कि मैं उन्हें फोड़कर फेंक दूँ। और ये सब बाहर से देखकर मैंने नहीं बताया — ये सब मैंने उसके पास बैठकर, उसे छूकर, उसकी आवाज़ सुनकर पता किया है।"

वो मुझे देखता रहा।

"तू ये सब दो मिनट में कैसे बता गया?"

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