A Dark Secret23 / 536

A Dark Secret – Chapter 23

7 min read November 6, 2026

कबीर ने मेज़ से रजिस्टर हटाया। उसने उसके पन्ने पलटे। मुझे कुछ दिखाया — एक कॉलम में महीने की तारीख़ें लिखी थीं, एक कॉलम में रकम, एक कॉलम में नाम।

"देख," उसने कहा। "यहाँ लिखा है — पीला ट्रक, बारह हज़ार कबाड़, सताईस तारीख़, दो साल पहले।"

"सताईस?"

"हाँ। सताईस।"

मेरा दिल ज़ोर से धड़का। सताईस। जो रसीद पापा की जेब से निकली थी — वो भी सताईस सितंबर की थी। दस साल पहले। और अब ये ट्रक भी सताईस को यहाँ आया था। दो साल पहले।

संयोग?

या कोई तार जोड़ने की कोशिश कर रहा था — और मुझे उस तार को पकड़ना था।

"अच्छा," मैंने कहा। "दे दो।"

"क्या दे दूँ?"

"ट्रक। दो हज़ार आठ सौ में। ये चार सौ अग्रिम। बाक़ी एक हफ़्ते में।"

कबीर ने मेरी तरफ़ देखा। "तू समझता है ऐसा होता है?"

"तूने कहा, तेरे यहाँ के हिसाब से बात करें। तो अब मैं अपने हिसाब से बोलूँ?"

"बोल।"

मैंने उसकी मेज़ पर अपनी उँगली रखी। मैंने उसकी घड़ी की तरफ़ इशारा किया — जो रुकी हुई थी।

"तेरी घड़ी रुकी है," मैंने कहा। "दस बजकर सत्ताईस मिनट।"

"तो?"

"ये दुकान पर लगी है। इसका मतलब यही है कि तू रोज़ सुबह दस बजकर सत्ताईस मिनट पर कुछ न कुछ करता है जो तुझे याद है। तू गिनता होगा। या फ़ोन करता होगा। या किसी को याद करता होगा। जो भी है — वो तेरे लिए सबसे भारी वक़्त है। और तूने वो घड़ी नहीं बदली। तेरे पास पैसा है — बता रहा है तू। फिर भी रुकी घड़ी दीवार पर टँगी है। इसका मतलब तू उस वक़्त को भूलना नहीं चाहता।"

कबीर का चेहरा पलट गया।

फिर वो अपनी कुर्सी पर बैठ गया। कुर्सी पुरानी थी, चरमराई। उसने मेज़ के नीचे से एक काग़ज़ निकाला। एक पुरानी रसीद। एक बॉल पेन।

"नाम?" उसने कहा।

"अर्जुन यादव।"

उसने लिखा। फिर रुका। "पूरा पता?"

"कंधा बस्ती। चाचा रामलाल का घर। छत वाला कमरा।"

उसने लिखा।

"अभी तक का हिसाब," उसने कहा। "चार सौ अग्रिम। बाक़ी दो हज़ार चार सौ, एक हफ़्ते के अंदर। अगर नहीं दिया तो ट्रक वापस। और तेरे चार सौ डूब जाएँगे। समझा?"

"समझा।"

"काग़ज़ पे हस्ताक्षर कर।"

मैंने काग़ज़ पढ़ा। उसमें सब लिखा था। मैंने हस्ताक्षर किए। मेरा हाथ नहीं काँपा। क्योंकि मैं जानता था — एक हफ़्ते में मुझे दो हज़ार चार सौ जुटाने होंगे। न जाने कहाँ से। न जाने कैसे। पर मैं जुटाऊँगा। क्योंकि अब पीछे हटने का सवाल नहीं था।

कबीर ने चार सौ नोट उठाए। उसने उन्हें कैलकुलेटर के पास रखा। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा।

"एक बात," उसने कहा। "जो तूने घड़ी के बारे में कहा — वो सही था।"

उसकी आवाज़ में थोड़ा बदलाव आया था। कुछ नरमी, कुछ झिझक। जैसे उसने अपना एक कोना मुझे दिखा दिया हो, और अब पछता रहा हो।

"पर भाई, एक बात साफ़ कर दूँ," उसने कहा। "मैं किसी का दुश्मन नहीं हूँ। पर दोस्त भी किसी का नहीं हूँ। मैं हिसाब का आदमी हूँ। और हिसाब में भावना नहीं होती। अगर तू एक हफ़्ते में पैसे नहीं लाया, तो ट्रक वापस।"

"ठीक है।"

"और — अगर तूने इस ट्रक से कुछ ऐसा निकाला जो किसी और का है, तो उसका हिसाब मुझे अलग देना होगा। मैंने इसे खरीदते वक़्त सब कुछ देखा था। पर कबाड़ है — कबाड़ में कुछ भी मिल सकता है।"

मैंने उसकी आँखों में देखा।

"तुम्हें इस ट्रक में कोई चीज़ मिली थी?"

कबीर ने मेरी तरफ़ बहुत देर देखा। फिर उसने अपना हाथ हिलाया।

"जो मिला, वो मैंने रख दिया," उसने कहा। "उसका ताल्लुक़ तुझसे नहीं है। अभी नहीं।"

मेरे अंदर कुछ काँपा। या तो ये आदमी मेरे लिए वरदान साबित होगा — या काँटा। अभी पता नहीं।

"ठीक है," मैंने कहा।

"अब निकल," उसने कहा। "ट्रक खींचने की व्यवस्था कर। तुझे चार आदमी लगेंगे, एक ट्रेलर, और एक लोहे की चेन। ये मेरी तरफ़ से। बाक़ी तेरा काम है।"

मैं बाहर आया।

दोपहर की धूप आँखों में लगी। धूल थी, पसीना था, और सड़क पर ट्रकों की कतार थी। दूर कहीं कोई हॉर्न बजा रहा था — लंबा, थका हुआ हॉर्न, जैसे कोई बोल रहा हो कि वक़्त नहीं है, भाई।

मैंने उस पीले ट्रक की तरफ़ एक बार फिर देखा। उसकी बॉडी पर जो पुराना नाम मिट गया था, उसके नीचे एक पतली लकीर बची थी।

मैं वहीं खड़ा रहा।

मेरी घड़ी में — जो पाँच मिनट आगे चलती थी — डेढ़ बज चुके थे। मेरे पास अब दो हज़ार रुपये थे, चार नहीं। दो हज़ार जो चाचा ने दिए थे, और वो भी अब इस ट्रक से बंध चुके थे।

मैंने सोचा — अब पाँच सौ माँ की जेब में से…

नहीं। वो पवित्र थे। मैं उन्हें नहीं छूऊँगा।

तो फिर दो हज़ार चार सौ कहाँ से आएँगे?

मैंने सोचा — एक हफ़्ते में।

एक हफ़्ते में।

मैंने अपना हाथ जेब में डाला। दो रुमाल अभी भी वहीं थे। एक में दो कटे तार, एक में और कुछ।

और इस ट्रक का पीला रंग मुझे कहीं और ले गया — उस दिन जब मैं टोल के पास खड़ा था और वो पीला ट्रक गुज़रा था, जिस पर रघुवीर और ठाकुर ट्रांसपोर्ट लिखा था।

इस ट्रक की तरह।

नहीं। शायद।

मैंने सिर हिलाया। अभी सोचने का वक़्त नहीं था। अभी काम करने का वक़्त था।

मैं कबीर की दुकान से बाहर निकला और सड़क पर लगी ट्रकों की कतार की तरफ़ चला। मुझे एक ट्रेलर चाहिए था, एक चेन चाहिए थी, और चार आदमी चाहिए थे जो मेरे साथ इस बूढ़े शेर को खींच सकें।

पर मैंने पीछे मुड़कर एक आख़िरी बार कबीर की दुकान को देखा।

वो खिड़की के पास खड़ा था, चाय का कटोरा हाथ में, और मुझे देख रहा था। जब उसने देखा कि मैंने देखा, वो पलट गया।

मुझे कुछ अजीब लगा। जैसे कोई मुझे नाप रहा हो। जैसे कोई मेरी आवाज़ से और चीज़ें सुन रहा हो, जो मैं अभी नहीं बोल रहा था।

मैं वहीं रुका।

फिर मैंने सोचा — भाई, तू ज़्यादा सोच रहा है। हर आदमी के पास अपना हिसाब होता है। तूने उसका हिसाब देखा — रुकी घड़ी, दुकान, चार सौ, दो हज़ार आठ सौ। ये भी काफ़ी है।

पर मेरा कान कुछ और कह रहा था। कान कभी झूठ नहीं बोलता, भले आदमी बोलें।

मैंने एक गहरी साँस ली।

दोपहर की धूप सिर पर थी। मेरे पास एक हफ़्ता था, दो हज़ार रुपये की कमी थी, और अब नाम रखने का एक ट्रक भी। कम से कम एक चीज़ तो आगे बढ़ी थी।

मैं सड़क पार करने लगा।

तभी मेरी जेब में मोबाइल बजा। मैंने निकालकर देखा — अजीब नंबर। मैंने उठाया।

"अर्जुन?" दूसरी तरफ़ से एक आवाज़ आई। पुरुष। जवान। पर थोड़ी धीमी, जैसे सोकर उठी हो।

"हाँ, बोलो।"

"मैं बल्लू बोल रहा हूँ।"

मैं रुक गया। सड़क के बीच में।

"कहाँ हो तुम?" मैंने पूछा।

"ढाबे के पीछे। कंधा बस्ती की तरफ़ वाली गली में। जल्दी आ। मुझे कुछ बताना है।"

"क्या?"

वो एक पल चुप रहा। उसकी साँस भारी थी, जैसे वो दौड़कर आया हो या डर से साँस नहीं ले पा रहा हो।

"वो लिफ़ाफ़ा," उसने कहा। "जो तूने मेरी जेब में देखा था। वो मेरा नहीं है।"

"तो किसका है?"

"ये मैं फ़ोन पर नहीं बोलूँगा।" उसकी आवाज़ काँपी। "पर एक बात बोलना चाहता हूँ — अगर तुझे वो लिफ़ाफ़ा मेरी जेब में मिला, तो किसी ने चुपके से डाला है। और जो चुपके से डालता है, वो बाद में चुपके से वापस भी ले जाता है।"

फ़ोन कट गया।

मैं सड़क के बीच में खड़ा रहा। एक ट्रक मेरे पास से गुज़रा, उसका हॉर्न इतना तेज़ था कि मेरे कान गूँज उठे। मैंने अपना हाथ कान पर रखा। फिर सड़क पार करके उस गली की तरफ़ चला — पर पहले मैंने पीछे मुड़कर एक बार फिर उस पीले ट्रक को देखा।

वो वहीं पड़ा था। उसकी छत पर धूल थी, और एक चिड़िया उसके आईने पर बैठी थी।

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