A Dark Secret238 / 536

A Dark Secret – Chapter 238

7 min read November 6, 2026

“नहीं साहब,” मैंने कहा। “काग़ज़ सच नहीं होता। काग़ज़ सिर्फ़ गवाही देता है। सच तो वो आदमी है जो काग़ज़ पर हस्ताक्षर करता है।”

भीड़ में बहुत धीरे से कोई बोला, “ये कौन है?”

दूसरे ने कहा, “पता नहीं। कोई पागल है।”

तीसरे ने कहा, “पर सही बोल रहा है।”

और चौथे ने कहा, “चुप कर।”

मैंने अपनी जेब से एक मुड़ा हुआ काग़ज़ निकाला, एक ही काग़ज़, और मैंने उसे हवा में उठाकर सामने की तरफ़ बढ़ा दिया। दूसरी पंक्ति में बैठी एक रिपोर्टर ने हाथ बढ़ाया। पर काग़ज़ उस तक पहुँचने से पहले ही राठौर के एक आदमी ने उसे लपक लिया।

“ये मेरा काग़ज़ है,” मैंने कहा।

“अब नहीं,” उसने कहा।

“कोई बात नहीं,” मैंने कहा। “इसकी नक़ल नैना जोशी के पास है। और उनके पास है लाल बत्ती वाला कैमरा।”

मैंने नैना की तरफ़ इशारा किया। वो भीड़ के बीच खड़ी थी, कैमरा आँख पर, और उसके कैमरे के ऊपर छोटी लाल बत्ती जल रही थी।

राठौर ने कैमरे की तरफ़ देखा। एक पूरा सेकंड। मैंने उस सेकंड में देखा कि उन्होंने क्या सोचा — और मुझे अंदाज़ा लग गया कि वो क्या सोच रहे थे।

वो सोच रहे थे, कैमरे के सामने कुछ ऐसा नहीं करना जो मेरी छवि तोड़ दे।

और मुझे पता था कि यही उनकी सबसे बड़ी कमज़ोरी है। इस आदमी को अपने पैसे से ज़्यादा अपनी तस्वीर से प्यार था।

“जोशी जी,” उन्होंने ऊँची आवाज़ में कहा, “आप अपना काम करिए। हम भी अपना काम करेंगे।”

फिर वो मेरी तरफ़ मुड़े और उन्होंने वही मीठी आवाज़ निकाली — जैसे कोई दो लड़कों की लड़ाई में बीच में आकर हँसता है।

“बेटा, आप थक गए हैं। आपको चाय मिल जाएगी पीछे। आज का दिन खराब मत कीजिए।”

“चाय पी लूँगा,” मैंने कहा। “पर साहब, एक बात और।”

“कहिए।”

“आपने अपना बोर्ड उतार दिया,” मैंने कहा। “अलमारी से। पर उसके चार छेद अभी भी हैं।”

उनकी आँखों में कुछ ऐसा आया जो मैंने पहले कभी किसी आदमी की आँखों में नहीं देखा था। ये उस तरह का डर नहीं था जो चीखता है। ये उस तरह का डर था जो बैठ जाता है, जम जाता है, और आगे से ज़िंदगी भर चलता है।

वो एक क़दम पीछे हटे।

और उसी वक़्त उनके सफ़ेद कुर्ते वाले आदमी ने मेरा हाथ पकड़ा — वही कोने वाला आदमी, वही रुमाल, वही लंगड़ाता पाँव।

“चलिए भाई,” उसने कहा। “बाहर चलिए। धूप में खड़े हो।”

उसकी आवाज़ बहुत प्यारी थी। ऐसी प्यारी कि आपको लगे कोई आपका पुराना मामा है।

“आप कौन हैं?” मैंने पूछा।

वो मुस्कुराया।

“कोई नहीं,” उसने कहा। “बस आपके पापा का जानने वाला।”

मेरे हाथ की उँगलियाँ ठंडी हो गईं। मैंने उसका हाथ नहीं छुड़ाया। मैं वैसे ही बाहर चला गया, उसके साथ, दो आदमियों के बीच से।

बाहर धूप तेज़ थी।

और बाहर, इमारत के कोने पर, एक बूढ़ा फ़ोटोग्राफ़र खड़ा था। पीली शर्ट, कंधे पर फटा हुआ कपड़े का थैला, गले में एक पुराना कैमरा जिसका लेंस किसी ने हाथ से फोकस करना सीखा था।

वो मेरी तरफ़ देख रहा था।

“बेटा,” उसने कहा। “तू उस समय बोला जब सब हथियार डाल चुके थे।”

“आप कौन?” मैंने पूछा।

“कमलानंद,” उसने कहा। “इस शहर में चालीस साल से तस्वीरें खींच रहा हूँ। आज सुबह की सब तस्वीरें मेरे पास हैं। जब तेरी आवाज़ उठी, उस वक़्त राठौर साहब के चेहरे पर जो था — वो भी।”

उसने अपनी जेब से एक छोटा सा मेमोरी कार्ड निकाला और मेरी हथेली पर रख दिया।

“इसका पैसा मत देना,” उसने कहा। “मेरी बेटी इस शहर के स्कूल में पढ़ाती है। उसके स्कूल की छत गिर रही है और तीन साल से कोई सुनता नहीं। अगर तेरी आवाज़ ऊँची है, तो एक दिन उस तरफ़ भी उठा देना।”

मैंने कार्ड मुट्ठी में बंद कर लिया।

“ये लो,” सफ़ेद रुमाल वाले ने मेरा कंधा थपथपाया, जैसे कोई बड़ा भाई। “घर जाओ। नहाओ। आज की बात भूल जाओ।”

“भूल जाऊँ?” मैंने कहा।

“सब भूल जाते हैं,” उसने कहा, और वो हँसा। “तेरे पापा भी भूल गए थे। तभी तो मैं उनका दोस्त बन गया था।”

वो मुड़ा और अंदर चला गया, और उसका दायाँ पाँव उसके बाएँ पाँव का इंतज़ार करता रहा, जैसे हर क़दम पर कोई पुराना हिसाब चुकाता हो।

शाम को ढाबे पर कोई जश्न नहीं था।

रुक्मा दीदी ने सात प्लेटें बनाईं, जबकि हम छह थे — मैं, वो, नैना, जुगनू, कबीर और अमरीक सिंह, जो देर से आए और बिना कुछ कहे एक कोने में बैठ गए।

“सातवीं प्लेट किसकी?” जुगनू ने पूछा।

“उसकी,” रुक्मा दीदी ने कहा, “जो आज रात जागेगा।”

कबीर ने अपना कैलकुलेटर मेज़ पर रखा और उसे उल्टा कर दिया, जैसे कोई बंदूक नीचे रख दे।

“अर्जुन,” उसने कहा, “आज तू बहुत दूर चला गया।”

“मैं तो बस खड़ा था,” मैंने कहा।

“नहीं,” उसने कहा। “तू उसके मंच पर खड़ा था। उसके अपने माइक से बोला। उसके सामने वाले आदमी के सामने। अगर वो चाहता, तो तुझे आज रात गाड़ी में बैठाकर कहीं छोड़ सकता था।”

“तो वो छोड़ता,” मैंने कहा। “मैं चुप नहीं बैठता।”

“पर तेरे पास तो कुछ नहीं है,” कबीर ने कहा, और उसकी आवाज़ तेज़ हो गई। “तूने एक काग़ज़ हवा में दिखाया और वो छीन लिया गया। बीच भीड़ में, दिन की रोशनी में। तेरे पास क्या बचा?”

मैंने अपनी जेब से वो चौथा पैकेट निकाला और मेज़ पर रखा।

“ये चौथा पैकेट,” मैंने कहा, “आज शाम उस आदमी के पास जाएगा।”

“कौन?”

“मुनीम जी,” मैंने कहा।

सब चुप हो गए।

“तूने उसे देखा?” नैना ने पूछा।

“सुबह देखा,” मैंने कहा। “देवा भाई के पीछे खड़ा था। भूरा फ़ोल्डर हाथ में। और उसकी आँखें हर दो सेकंड में दरवाज़े की तरफ़ जा रही थीं।”

“इसका मतलब?”

“इसका मतलब ये है,” मैंने कहा, “कि वो भी उस रास्ते से भागना चाहता है, पर उसे रास्ता नहीं मिल रहा।”

रुक्मा दीदी ने मेरी प्लेट में एक और रोटी रखी।

“अर्जुन,” उसने कहा, “आज रात तू अपने कमरे में मत सो।”

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

“क्यों?”

“क्योंकि आज दिन में तूने उनके मंच पर उनकी इज़्ज़त की चादर उतार दी,” उसने कहा। “ये लोग इज़्ज़त का बदला रात में लेते हैं, दिन में नहीं।”

मैं कुछ देर चुप रहा। फिर मैं मुस्कुराया।

“दीदी,” मैंने कहा, “मैं आज रात अपने कमरे में सोऊँगा।”

“अर्जुन…”

“पर सोने से पहले,” मैंने कहा, “मैं एक गठरी बाहर दरवाज़े के पास रख दूँगा। बंधी हुई, साफ़ काग़ज़ों जैसी दिखने वाली, और उस पर धूल।”

नैना ने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखों में पहले समझ आई, फिर डर।

“तू उन्हें बुला रहा है,” उसने कहा।

“मैं उन्हें नहीं बुला रहा,” मैंने कहा। “मैं उनका हाथ देखना चाहता हूँ। अब तक हमने सिर्फ़ उसके आदमियों के हाथ देखे हैं। उसका हाथ नहीं देखा।”

“और अगर वो तेरे कमरे में आ गया?”

“तो वो मेहमान होगा,” मैंने कहा। “और मैं मेज़बान।”

रात ग्यारह बजे मैं चाचा के घर पहुँचा।

घर सो रहा था। नीचे चाची की खिड़की से पीली रोशनी आ रही थी और अंदर से रेडियो की हल्की आवाज़ आ रही थी। मैंने सीढ़ियाँ चढ़ते हुए तीन आवाज़ें गिनीं — पहली ठीक बोली, दूसरी चुप रह गई, तीसरी चरमराई।

मैंने कमरे का दरवाज़ा खोला।

कमरे में सब वैसा ही था जैसा मैंने छोड़ा था, सिवाय इसके कि सब कुछ अब मेरा नहीं लगता था। मेज़ पर कॉपी, कोने में औज़ारों का थैला, दीवार पर पापा की बिना काँच की तस्वीर, और खिड़की के पास बूढ़े शेर की चाबी।

मैंने पुराने अख़बार में कुछ सूखे काग़ज़ लपेटे, उन्हें रस्सी से बाँधा, और उस गठरी पर धूल फेंक दी। फिर मैंने वो गठरी दरवाज़े के बाहर, दीवार के सहारे रख दी, ठीक वैसे, जैसे कोई भूलकर रख देता है।

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho