A Dark Secret – Chapter 236
बनियान नहीं थी। गठरी नहीं थी।
मैं सीढ़ी पर बैठ गया।
मेरे हाथ ठंडे हो गए। गला सूख रहा था। मैंने अपने आप को सम्हाला और पहली बात ये सोची — जान है या नहीं। मैं ठीक हूँ। जुगनू? जुगनू कहाँ है?
तभी बाहर पैरों की आवाज़ आई और जुगनू अंदर घुसा, हाँफता हुआ।
“भैया!” वो चीखा। “एक आदमी भागा! पीछे की दीवार से कूदा!”
“कैसा दिख रहा था?” मैंने पकड़कर पूछा।
“लंबा नहीं। सफ़ेद शर्ट।” वो हाँफ रहा था। “और भैया, उसकी जेब से एक रुमाल लटक रहा था। सफ़ेद रुमाल।”
मैं एक पल के लिए रुक गया।
“सफ़ेद रुमाल?”
“हाँ। पर वो सादा नहीं था।” जुगनू ने अपने सीने पर उँगली रखी, जैसे निशान बना रहा हो। “किनारे पर कुछ कढ़ाई जैसा था। छोटा। मुझे रोशनी नहीं मिली, पर मैंने देख लिया।”
मैंने उसे पकड़कर बैठाया।
“कौन सी तरफ़ गया?”
“पीछे की गली। और भैया, वो लंगड़ाकर भाग रहा था। दायाँ पैर धीरे पड़ता था।”
मैंने अपने आप को सीधा किया।
और तभी, बहुत धीरे, मुझे एक बू आई।
नौसादर और तेल।
वैसी ही बू जो उस पुरानी बनियान से आई थी, जो अलमारी के खोखले पेंदे में मिली थी।
मैं जम गया।
“जुगनू,” मैंने धीरे से कहा, “तू यहीं रुक। कोई आए तो फाटक बंद कर देना।”
मैं अंदर गया, अलमारी के पीछे गया और मैंने अलमारी को दीवार से खींचा।
वहाँ, धूल में, एक जूट की बोरी पड़ी थी।
मैंने उसे खोला।
अंदर थे — सात बीमा पर्चियाँ, उनमें सातवीं वाली नई पर्ची, पीतल की मोहर, फ़ौलाद का नट जिस पर रघुवीर खुदा था, पापा की पुरानी टोल रसीद, और आज सुबह छापाखाने से लाई वही खाली पर्ची।
मैंने उन्हें छुआ, एक-एक करके। जैसे कोई डूबने वाला रस्सी को छूता है।
तभी फाटक पर गाड़ी रुकी और नैना अंदर आई।
वो फ़र्श पर बिखरे काग़ज़ देखकर रुक गई। फिर उसने मेरा चेहरा देखा।
“कितना गया?” उसने पूछा।
“इकतालीस बीमा काग़ज़ की नक़लें,” मैंने कहा। “कुछ टोल रसीदें। और बनियान।”
“असली?”
“असली यहाँ हैं।” मैंने बोरी उठाई।
नैना ने लंबी साँस ली और फिर वो दीवार के सहारे बैठ गई।
“ये पहला काम है,” मैंने कहा। “और ये सबसे ज़रूरी काम है।”
“क्या?”
“इसने मुझे सिखा दिया,” मैंने कहा, “कि सारा सामान एक जगह रखना बेवकूफ़ी है। मैं सारे काग़ज़ एक जगह इकट्ठे करने वाला था, नैना। सब। बुधवार के लिए।”
“अब?”
“अब सब चार जगह रहेंगे।” मैंने उसे बोरी सौंपी। “एक तेरे पास, एक रुक्मा दीदी के पास, एक कबीर के पास, और एक मेरे पास। और एक कॉपी उस आदमी के पास जो अभी भी देवा के पास बैठता है।”
मैंने फिर फ़र्श पर बिखरे काग़ज़ों की तरफ़ देखा।
“और जुगनू?”
जुगनू दरवाज़े पर खड़ा था।
“हाँ भैया?”
“सफ़ेद रुमाल,” मैंने कहा। “तू उसे भूल सकता है?”
“मैं कुछ नहीं भूलता,” उसने गुस्से से कहा। “मैं सत्ताईस नहीं भूला, नीला गोल नहीं भूला, सफ़ेद गाड़ी नहीं भूली। मैं रुमाल भी नहीं भूलूँगा। उस पर कढ़ाई थी भैया, किनारे पर। जैसे मंडी के बोरे पर लगी मोहर हो।”
मैंने नैना की तरफ़ देखा।
वो उठ खड़ी हुई।
“अर्जुन,” वो धीरे बोली, “मैंने यही बात कही थी। पापा की फोटो में चौथे आदमी की जेब से रुमाल लटक रहा था। और उस पर भी वही कढ़ाई थी।”
मैंने अपनी कॉपी उठाई और उसमें वो पंक्ति लिखी जो बहुत दिनों से खाली पड़ी थी — चौथे आदमी के नाम की जगह।
मैंने लिखा — सफ़ेद रुमाल वाला। राठौर का आदमी।
फिर मैंने कॉपी बंद की और मैंने नैना और जुगनू की तरफ़ देखा।
“अब समझ आया,” मैंने कहा। “जो भी हो रहा है, वो सफ़ेद रुमाल वाला ही कर रहा है। बनवारी की कोठरी जलाने वाला, गार्ड को धमकाने वाला, अमरीक के घर बैठकर पैसे देने वाला, और आज रात मेरे गैराज में आने वाला — वही है।”
“और वो कौन है?” जुगनू ने पूछा।
“वही आदमी,” मैंने कहा, “जो पापा की फोटो में खड़ा था। जिसका चेहरा किसी ने ब्लेड से खुरच दिया, पर रुमाल भूल गया।”
नैना ने अपना फटा बैग उठाया।
“तो अब क्या?” उसने पूछा।
मैंने कार्ड उठाया, जिस पर सुनहरे अक्षरों में लिखा था कि अगले हफ़्ते बुधवार को शहर का सबसे बड़ा आदमी अपना नया दफ़्तर खोलेगा।
“अब,” मैंने कहा, “हम वही करेंगे जो उसने किया। चुपचाप काम करेंगे। छह दिन। छह दिन बाद, उसके अपने मंच पर, उसके अपने माइक से, उसके अपने काग़ज़ बोलेंगे।”
मैंने बोरी उठाई और बूढ़े शेर की तरफ़ बढ़ा।
उसकी बॉडी पर धूल थी और आगे सफ़ेद रंग में लिखा था — रघुवीर।
मैंने उसके पहिये को हाथ लगाया और मैंने धीरे से कहा —
“पापा, ये सफ़ेद रुमाल वाला बहुत चालाक है। पर चालाक आदमी की एक कमज़ोरी होती है। उसे हर जगह अपना निशान छोड़ना पड़ता है।”
मैंने काग़ज़ों के टुकड़े उठाए और आँख बंद करके बाहर टोल की तरफ़ कान लगाया।
दूर एक गाड़ी की आवाज़ आई — लंबी, भारी और चीखती हुई, जैसे कोई जल्दी में हो।
“और छह दिन,” मैंने कहा, “उसके निशान गिनने के लिए काफ़ी हैं।”
॥
छह दिन बहुत छोटे नहीं होते, अगर आप उन्हें घड़ी से न देखें।
मैंने उन छह दिनों को तीन हिस्सों में बाँट लिया था। सुबह, दोपहर और रात। सुबह गैराज में, दोपहर में काग़ज़ों के पास, और रात में छत पर आवाज़ें गिनते हुए।
सबसे पहले मैंने काग़ज़ों की नक़ल करवाई। नैना ने अपनी छोटी गाड़ी से शहर के उस कोने तक जाकर चार पैकेट बनवाए जहाँ कोई पूछता नहीं और जहाँ स्याही सूखने में रात लग जाती है। एक पैकेट उसने अपने फटे बैग में रखा, एक रुक्मा दीदी के आटे के ड्रम में, एक कबीर की उस अलमारी में जिसे उसने खुद तोड़कर खोला था, और एक मेरे पास आया।
चौथा पैकेट मैंने अलग रखा था।
“ये किसके लिए?” जुगनू ने पूछा था।
“उस आदमी के लिए,” मैंने कहा था, “जो अभी भी देवा भाई के कमरे में बैठकर उनका चाय का गिलास उठाता है।”
जुगनू ने मुझे देखा था, फिर धीरे से बोला था, “भैया, वो आदमी तो बूढ़ा है।”
“बूढ़ा होना,” मैंने कहा था, “ईमानदार होना नहीं होता।”
छह दिन में रुक्मा दीदी ने अपनी कॉपी में मेरी हर चाय लिखी। दो रुपये की चाय, दिन में तीन बार, और हर बार वो ज़ोर से बोलती — “अर्जुन यादव, कंधा बस्ती, चाय, आज।” जैसे मैं कोई हिसाब की चीज़ हूँ।
कबीर दो बार आया। पहली बार चुप बैठा रहा और अपने कैलकुलेटर के बटन दबाता रहा। दूसरी बार आया तो उसने कहा कि उसकी अम्मा उससे पूछ रही है कि वो रात को देर तक क्यों जागता है।
“तू क्या बोला?” मैंने पूछा।
“मैंने कहा, टायरों का हिसाब मिला रहा हूँ।”
मैं हँसा। फिर मैं चुप हो गया, क्योंकि हँसी में सच बोलने की आदत होती है।
अमरीक सिंह ने दो बार फ़ोन किया। पहली बार कहा कि टिंकू का बुखार उतर गया। दूसरी बार कोई नहीं बोला, सिर्फ़ साँस सुनाई दी, और फिर फ़ोन कट गया। मैंने वापस नहीं किया। कुछ आदमियों को फ़ोन नहीं चाहिए, बस एक आदमी चाहिए जो उनकी चुप्पी सुन ले।
और छह दिन में सफ़ेद गाड़ी सात बार आई।
जुगनू गिनता रहा। वो पहाड़ी पर बैठकर गिनता था, जैसे कोई स्कूल का बच्चा गली में गाड़ियाँ गिनता है। उसने बताया कि गाड़ी हर बार उसी मोड़ से आई, हर बार उसी तरफ़ मुड़ी, और हर बार उसका पिछला हिस्सा नंबर की जगह नीले गोल निशान से ढका था।
“भैया, उन्होंने नंबर ही मिटा दिया,” उसने कहा था। “कौन गाड़ी का नंबर मिटाता है?”
“वो,” मैंने कहा, “जो चाहता है कि गाड़ी पहचानी न जाए, पर उसका मालिक पहचाना जाए।”
जुगनू ने सोचा, फिर बोला, “ये तो उल्टी बात है।”
“यही तो,” मैंने कहा, “इस शहर की सारी बात उल्टी है।”
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