A Dark Secret – Chapter 235
“अर्जुन,” उसने धीरे से कहा, “मेरे पिता की फाइल भी किसी ऐसे ही रजिस्टर में होगी।”
“होगी,” मैंने कहा। “और बुधवार को वो रजिस्टर खुलेगा। सबके सामने।”
वो कुछ देर चुप बैठी रही। फिर बोली —
“एक कमी है।”
“क्या?”
“ये काग़ज़ उस आदमी के नाम तक नहीं पहुँचते जो सब चला रहा है। राठौर के हाथ की कोई लाइन किसी काग़ज़ पर नहीं है। उसका नाम सिर्फ़ अलमारी पर लिखा था, और वो बोर्ड भी उतार दिया गया।”
मैंने कार्ड को फिर उठाया।
“तो एक लाइन चाहिए,” मैंने कहा। “सिर्फ़ एक लाइन, जिसमें उसका नाम उसकी मर्ज़ी के बिना हो।”
नैना ने मेरी तरफ़ देखा।
“मुझे एक जगह मिली है,” वो धीरे से बोली, जैसे ये बात अभी तय हुई हो। “जहाँ ये बिना साल वाली रसीदें छपती हैं।”
मैं उठ खड़ा हुआ।
“कहाँ?”
“सदर बाज़ार। पुराना छापाखाना। उसकी छत पर सुबह से शाम तक स्याही की बू रहती है।”
“कैसे पता चला?”
“मैं तीन महीने से इन रसीदों का काग़ज़ पकड़ रही हूँ।” उसने बैग से एक पन्ना निकाला। “ये काग़ज़ सस्ता है, पर एक ही मिल से आता है। उस मिल के दो ग्राहक हैं — एक सरकारी दफ़्तर और एक छापाखाना।”
“और सरकारी दफ़्तर वाला काग़ज़ रसीद पर क्यों छपेगा?”
“वही तो।” उसने चश्मा ऊपर किया। “चल।”
सदर बाज़ार की गली में घुसते ही कान बदल जाता है। वहाँ लोहे की कैंची चलती है, काग़ज़ की गड्डियाँ गिरती हैं, और हर दुकान से किसी की आवाज़ आती है जो ग्राहक से मोल-भाव कर रहा है।
छापाखाना एक पुराने मकान की पहली मंज़िल पर था। सीढ़ियाँ पत्थर की, और हर सीढ़ी पर स्याही का एक धब्बा।
अंदर बैठा आदमी छप्पन के आसपास का था। दो ही दाँत बचे थे, चश्मा रबर की डोर से बँधा हुआ और हाथ में काग़ज़ों की गड्डी। वो बोलते वक़्त भी काग़ज़ गिनता रहता था, जैसे बात और हिसाब एक साथ चल रहे हों।
“क्या चाहिए?” उसने पूछा। “हिसाब से बताओ।”
नैना ने कार्ड उसकी मेज़ पर रख दिया।
उसने कार्ड देखा। उसका हाथ रुक गया।
“ये हमारा नहीं है,” उसने तुरंत कहा।
“ये हमारा नहीं है,” नैना ने उसकी नक़ल की। “पर ये आपकी मशीन से निकला है।”
“कौन कहता है?”
“काग़ज़,” नैना ने कहा। “आपका काग़ज़ चार सौ ग्राम का है। इस कार्ड का काग़ज़ भी चार सौ ग्राम है। और इसके कोने पर जो मोहर है, वो आपकी मशीन के दबाव से बनी है — किनारे थोड़े गहरे हैं।”
बूढ़ा उठकर दरवाज़ा बंद करने गया।
मेरी नज़र उसकी मशीन पर पड़ी। एक पुरानी, लोहे की, हाथ से चलने वाली छापा मशीन। उसका हैंडल ढीला था और हर घुमाव पर चरमरा रहा था, जैसे कोई बूढ़ा जोड़ हिल रहा हो।
“हैंडल ढीला है,” मैंने कहा।
बूढ़ा चौंका।
“तीन महीने से चरमराता है,” उसने कहा। “मिस्त्री ने दो बार देखा, फिर भी वैसा ही है।”
“मैं देखूँ?”
“तू क्या मिस्त्री है?”
“मैं मिस्त्री हूँ,” मैंने कहा। “बस ट्रक का। पर जोड़ सब एक जैसे ही होते हैं।”
उसने मेरी तरफ़ देखा और फिर अपनी मशीन की तरफ़।
मैंने औज़ार थैला खोला, दो पाने निकाले और मशीन के पास बैठ गया। जोड़ के अंदर एक पतली चमड़ी घिस गई थी और एक नट हाफ़ खुला था। मैंने नट कसा, चमड़ी के नीचे काग़ज़ का एक टुकड़ा रखा और हैंडल घुमाकर देखा।
आवाज़ साफ़ हो गई।
बूढ़े का चेहरा खुल गया।
“अरे,” उसने कहा। “ये तो अच्छा हुआ।”
“अब आप मेरी बात सुनिए,” मैंने कहा। “मैंने आपकी मशीन ठीक की। इसका दाम दो काग़ज़।”
“कौन से?”
“पहला — जो रसीदें यहाँ से छपकर जाती हैं जिन पर सिर्फ़ सत्ताईस लिखा होता है। और दूसरा — जिस आदमी ने ये कार्ड छपवाया था, उसका हुलिया।”
बूढ़ा काग़ज़ गिनना भूल गया।
“बेटा,” उसने धीरे से कहा, “मैं इस धंधे में चालीस साल से हूँ। मैंने न जाने कितने झूठे काग़ज़ छापे — सर्टिफ़िकेट, रसीद, मार्कशीट। पर पहली बार मैं किसी से डरा हूँ।”
“किससे?”
“उस पतले आदमी से।” उसने आँखें झुकाकर कहा। “चटका चश्मा, घड़ी का पट्टा दो जगह सिला हुआ। बोलता धीरे है, पर बोलने के बाद खुद नहीं हँसता। और जब वो हँसता है तो उसकी आवाज़ से लगता है कि हँसी उसकी अपनी नहीं, किसी और की पहनी हुई है।”
मेरी कलाई पर पापा की घड़ी जैसे भारी हो गई।
“उसने कब आदेश दिया?” मैंने पूछा।
“दस दिन पहले।” बूढ़ा उठा और मेज़ की दराज़ से एक रजिस्टर निकाला, जिसके पन्ने उल्टे गिने हुए थे। “देखो — कार्ड दो हज़ार। सफ़ेद काग़ज़, सुनहरी छपाई। उसी दिन ढाई हज़ार खाली पर्चियाँ।”
“खाली?”
“खाली।” उसने पन्ना मेरी तरफ़ घुमाया। “ऊपर सिर्फ़ सत्ताईस छपा है। नाम नहीं, रकम नहीं, साल नहीं। बस सत्ताईस।”
मैंने नैना की तरफ़ देखा।
उसका चश्मा नाक पर था और वो उसे ऊपर धकेलना भी भूल गई थी।
“और दुगने पैसे दिए थे,” बूढ़े ने कहा। “हिसाब से। मैंने पूछा नहीं कि इतने क्यों। मुझे बस पैसे चाहिए थे।”
“आपके पास उनमें से कोई बची है?” मैंने पूछा।
वो रुका। फिर वो उठा और दराज़ की सबसे नीचे वाली परत से एक पतला लिफ़ाफ़ा निकाला।
“एक,” उसने कहा। “छपाई के बाद मैंने मशीन साफ़ की थी। ये मेज़ पर पड़ी मिली। मैंने रख ली।”
मैंने लिफ़ाफ़ा खोला।
अंदर एक पर्ची थी — सफ़ेद काग़ज़, ऊपर सत्ताईस, नीचे खाली जगह, और कोने पर वही नीला गोल, आधा दबा हुआ।
मैंने उसे अपनी कॉपी में रखा और बूढ़े को दो सौ रुपये दिए।
“ये मशीन के पैसे,” मैंने कहा। “काग़ज़ का दाम अलग है और वो मैं चुका चुका हूँ, क्योंकि वो मेरी लड़ाई है।”
वो बूढ़ा मेरी तरफ़ देखता रहा।
“तू क्या करेगा इस काग़ज़ का?”
“एक दिन सबके सामने खोलूँगा।”
उसने गर्दन हिलाई, जैसे कोई पुराना आदमी किसी बात को सच मानने से पहले तौलता है।
“बेटा,” उसने कहा, “अगर तू ये कर ले, तो एक दिन मुझे भी बुला लेना। मैं मरने से पहले एक बार सच छापना चाहता हूँ।”
दोपहर को मैं गैराज पहुँचा और जब तक शाम हुई, मैंने काम किया। एक पुरानी गाड़ी का क्लच खोला, तेल बदला, हाथ जले और पीठ टूट गई।
चार बजे चाची का फ़ोन आया।
“अर्जुन,” उसकी आवाज़ काँप रही थी, “किसी ने फ़ोन किया था। कह रहा था कि चाचा ठीक हैं।”
“किसने?”
“पता नहीं। बस इतना कहा।” वो रोने लगी। “अर्जुन, तेरे चाचा ने कुछ किया है। मैं उनकी आँखें देखकर बता सकती हूँ।”
“चाची, संभालो अपने आपको। मैं आ रहा हूँ।”
“नहीं।” उसने सुबकते हुए कहा। “तू मत आ। तू उस काम को पूरा कर जो तेरे पापा ने शुरू किया था। और अर्जुन — जुगनू का ध्यान रखना।”
फ़ोन कट गया।
मैंने हाथ पोंछे और कॉपी में एक लाइन लिखी —
चाची का फ़ोन। किसी ने चाचा के ठीक होने की खबर दी। चाचा की आवाज़ नहीं सुनी, सिर्फ़ खबर सुनी।
फिर मैंने सोचा। उस दिन मैंने अपने काग़ज़ अलग-अलग करने का फ़ैसला लिया था। मैंने कुछ काग़ज़ जो सबसे ज़रूरी थे, गैराज की उस पुरानी लोहे की अलमारी के पीछे रख दिए, जिसे महेंद्र चाचा ने पीछे कभी नहीं खींचा था। एक जूट की बोरी में। एहतियात।
आज मुझे नहीं पता था कि वो एहतियात उस रात मेरी जान बचाएगी।
रात ग्यारह बजे मैं ढाबे से लौटा।
गैराज का फाटक खुला था।
मैंने गाड़ी रोकी और बिना इंजन बंद किए उतरा। अंदर अंधेरा था। मैंने बत्ती जलाई और मेरा दिल रुक गया।
फ़र्श पर काग़ज़ बिखरे थे — नहीं, काग़ज़ नहीं, काग़ज़ के टुकड़े। जो काग़ज़ सिली गठरी में थे, वो चले गए थे। सिर्फ़ उनके कोने, फटे हुए टुकड़े, और धूल में पैरों के निशान बचे थे।
ऊपर लोहे की पट्टी खाली थी।
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