A Dark Secret – Chapter 234
अगर वो ग्यारह साल से कोशिश कर रहा है, तो वो राठौर के ख़िलाफ़ कुछ रखता है। और मुझे वो चीज़ चाहिए।
मैं उठा और बाहर आया। गैराज के आँगन में बूढ़ा शेर खड़ा था। उसका पिछला पहिया मैंने खोलकर वापस लगाया था। उसकी बॉडी पर धूल की मोटी परत थी, और आगे लिखा था — रघुवीर। सफ़ेद रंग सूखकर पीला पड़ गया था, पर नाम साफ़ था।
मैंने उसकी छत पर चढ़कर बैठना चुना। वहाँ से पूरी गली दिखती थी। दूर टोल की लाइटें थीं, और उससे आगे काँच की इमारत की चमक।
मैंने पापा की घड़ी निकाली।
आठ मिनट आगे।
“पापा,” मैंने धीरे से कहा, “देवा भाई कहते हैं कि राठौर पूरा राज चलाता है।”
घड़ी टिक-टिक कर रही थी।
“पर अगर वो राज चलाता है,” मैंने कहा, “तो उसका हिसाब कहीं न कहीं लिखा होगा। और जो हिसाब लिखा हो, उसे कोई पढ़ने वाला चाहिए। बस एक आदमी।”
मैंने फ़ोन निकाला और नैना को मैसेज किया — कल सुबह सात बजे। फिर जुगनू को — कल सुबह छह बजे गैराज।
फिर मैंने कबीर को लिखा — तेरे पास जो चार कॉपी हैं, उनमें से एक आज रात किसी ऐसे आदमी को दे दे जो देवा भाई के सबसे क़रीब है और जो सबसे ज़्यादा डरता है।
मैंने भेजा और फ़ोन जेब में रख दिया।
हवा में धूल थी। दूर एक ट्रक ने हॉर्न बजाया। लंबा हॉर्न। दो बार। फिर चुप।
मैंने आँख बंद की और उस हॉर्न की आवाज़ को अंदर आने दिया।
उसमें एक आवाज़ थी जो बाक़ी सबको सिर्फ़ शोर लगती थी। धातु की घिसाई। हवा का रिसाव। और वो तीसरा हिस्सा — जो किसी की जल्दबाज़ी में छूट जाता है।
मैं मुस्कुराया।
“राठौर साहब,” मैंने हवा से कहा, “आपका राज बड़ा है। पर आपकी गाड़ियों की आवाज़ आपसे ज़्यादा बोलती है।”
और मैंने अपनी कॉपी बंद करके सीने से लगा ली।
॥
सुबह के चार बजे ट्रांसपोर्ट नगरी सोती नहीं, बस अपनी आवाज़ बदल लेती है। रात में ट्रकों की चीख होती है और इस वक़्त सिर्फ़ धूल का खुरखुरा शोर बचता है, जैसे कोई बड़ी चटाई पर पैर घसीट रहा हो।
मैं बूढ़े शेर की छत पर बैठा था। नीचे उसका पिछला पहिया नया लगा हुआ था और वो ट्रक वैसे ही खड़ा था, जैसे कोई बूढ़ा आदमी सुबह की चाय का इंतज़ार करता है — कमर झुकाए, आँख बंद किए।
मैंने पापा की घड़ी निकाली।
आठ मिनट आगे।
पहले ये घड़ी पाँच मिनट आगे चलती थी। अब आठ हो गई। मैंने कभी इसे ठीक नहीं किया। मुझे लगता था, जो घड़ी जल्दी चलती है, वो किसी को जल्दी बुला रही होती है।
मैंने घड़ी कान के पास लगाई। टिक-टिक। उसमें भी एक आवाज़ छिपी थी — पतली, सूखी, जैसे कोई दूर किसी कमरे में काग़ज़ पलट रहा हो।
“पापा,” मैंने धीरे से कहा, “देवा भाई कहते हैं राठौर पूरा राज चलाता है। और मैं सोच रहा हूँ — जो पूरा राज चलाता है, उसका हिसाब कहीं न कहीं रखा होता है।”
हवा ने जवाब नहीं दिया।
“और जो हिसाब रखा होता है,” मैंने कहा, “उसे किसी दिन किसी के सामने खोलना पड़ता है। सिर्फ़ एक आदमी चाहिए जो उसे खोल दे।”
मैं उठा और छत से नीचे देखा।
गली सूनी थी। दूर टोल की लाइटें झपक रही थीं और उससे आगे काँच की इमारत सुबह से पहले भी जाग रही थी, जैसे उसे नींद की ज़रूरत ही न हो।
मैंने उस इमारत को देखा और सोचा — इतनी सारी काँच, इतने सारे काग़ज़, और एक भी काग़ज़ पर उसका नाम नहीं।
तभी मेरे दिमाग़ में एक बात बैठ गई। अलग-अलग जगह मारने से कुछ नहीं होगा। कालू को पकड़ो, वो देवा का है। देवा को पकड़ो, वो राठौर का है। राठौर को पकड़ो, तो वो खुद को काग़ज़ से बाहर रखता है।
तो फिर तरीक़ा एक ही है — सारे काग़ज़ एक जगह, सारे गवाह एक दिन, और सारे लोग एक हॉल में।
छह बजे गैराज के फाटक पर खटखट हुई। इतनी तेज़ और इतनी बेसब्र कि मुझे बताना ही नहीं पड़ा कौन है।
“भैया!” जुगनू अंदर घुसा। उसके पैरों में आज चप्पल थी, जो अपने आप में खबर थी। “सफ़ेद गाड़ी फिर आई। तीन बार नहीं, चार बार।”
“कब?”
“अभी। अंधेरे में। बत्ती बुझाकर आई, दो मिनट रुकी, फिर गई।”
“किसने देखा?”
“मैंने।” उसने सीना फुला लिया। “मैं छत पर था। माँ ने डाँटा था कि रात भर क्यों जागता है, तो मैंने कहा कि मुझे नींद नहीं आती।”
मैं हँसा।
“बैठ,” मैंने कहा। “चाय पी।”
“चाय नहीं।” वो मेरे सामने बैठ गया और उसकी आवाज़ एकदम बदल गई। “भैया, मुझे एक बात बताओ। जब तुम सब काग़ज़ वालों को पकड़ लोगे, तो मेरे बाप की गाड़ी का क्या होगा?”
मैं चुप हो गया।
“कौन सी गाड़ी?”
“जो दो साल पहले हादसे में जली थी। उसका काग़ज़ भी तुम्हारे ढेर में है ना?”
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा।
“है,” मैंने कहा। “और उसी दिन तेरे बाप का नाम भी उसी काग़ज़ पर लिखा जाएगा।”
वो कुछ नहीं बोला। बस उसने अपनी टूटी पतंग जैसे सीने से लगा ली, जो वो आज भी साथ लाता था।
सात बजे नैना आई।
वो आते ही नहीं, घुसती है। बैग कंधे से फटा हुआ, उसमें से चार्जर की तार लटकती हुई, चश्मा नाक पर सरका हुआ और हाथ में एक क्रीम रंग का लिफ़ाफ़ा।
“सुन,” वो बिना नमस्ते किए बोली। “मेरे पास एक चीज़ है और मुझे नींद नहीं आई।”
“बैठ पहले।”
“बैठने का वक़्त नहीं है अर्जुन।” उसने काग़ज़ मेज़ पर पटक दिया। “अगले हफ़्ते बुधवार को राठौर लॉजिस्टिक्स का नया दफ़्तर खुल रहा है। वही काँच की इमारत। नया खंड, नया फाटक, नई लाइटें। उस दिन वहाँ दो मंत्री आ रहे हैं, कलेक्टर साहब आ रहे हैं, पुलिस के दो बड़े अफ़सर आ रहे हैं, और शहर के सारे मोटे लोग।”
मैंने लिफ़ाफ़ा खोला।
अंदर एक कार्ड था। मोटा काग़ज़, सुनहरे अक्षर, ऊपर लिखा था — राठौर लॉजिस्टिक्स। नीचे तारीख़ और शाम के वक़्त का ज़िक्र। और कोने पर, बहुत छोटा, फीका नीला गोल निशान।
मेरा हाथ रुक गया।
“ये निशान,” मैंने कहा।
“हाँ,” नैना ने कहा। “वही।”
“कार्ड पर भी?”
“कार्ड पर भी। मैंने पहले नहीं देखा था। आज सुबह चाय पीते वक़्त गिलास के नीचे रखा था, और उसमें रोशनी पड़ी तो निशान उभर आया।”
मैंने कार्ड को उठाकर रोशनी में किया।
“ये मोहर किसी की है,” मैंने कहा।
“हर जगह है,” नैना ने कहा। “बीमा पर्ची पर, टोल की रसीद पर, बिल्टी पर, और अब कार्ड पर भी। ये मोहर किसी एक आदमी की जेब में रहती है, अर्जुन।”
मैंने कार्ड मेज़ पर रखा और उसकी तरफ़ देखता रहा।
“बुधवार,” मैंने कहा।
“बुधवार।”
“यानी सात दिन।”
“छह,” उसने कहा। “आज मंगल है।”
मैं मुस्कुराया।
“छह दिन,” मैंने कहा। “छह दिन में आदमी बहुत कुछ कर सकता है।”
नैना ने कुर्सी खींचकर बैठ लिया और उसका चेहरा एकदम गंभीर हो गया।
“अर्जुन, मैं तुझे एक बात साफ़ बता दूँ। मैं उस दिन वहाँ जाऊँगी। मेरे पास मीडिया का कार्ड है, पाँच कार्ड आए हैं हमारे दफ़्तर। पर मैं अकेली कुछ नहीं कर सकती।”
“तू अकेली नहीं है।”
“मुझे पता है।” उसने चश्मा ऊपर धकेला। “पर सुन। उस दिन वहाँ राठौर के अपने लोग होंगे। कैमरे उसके होंगे, माइक उसके होंगे और मंच भी उसका होगा। अगर तू बीच में उठकर काग़ज़ दिखाएगा, तो दो मिनट में तेरे हाथ से काग़ज़ छिन जाएगा और तेरा नाम अख़बार में चोर लिखा जाएगा।”
“तो फिर क्या?”
“तो सब कुछ पहले से तैयार चाहिए।” उसने उँगली मेज़ पर रखी। “हर काग़ज़ की चार कॉपी। हर गवाह की आवाज़ रिकॉर्ड। हर आवाज़ का एक काग़ज़। और सबसे ज़रूरी — एक ऐसा काग़ज़ जो वो अपना न कह सके।”
मैंने पापा का काला रजिस्टर उठाया और उसके सामने रख दिया।
“ये अपना नहीं कह सकेगा,” मैंने कहा।
नैना ने रजिस्टर खोला। उसकी उँगली उन पन्नों पर चली जो मैंने रात भर पढ़े थे। फिर उसने उसे बंद किया और आँखें बंद कर लीं।
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