A Dark Secret – Chapter 228
“मैं शांत नहीं हूँ,” रुक्मा दीदी ने कहा। “मैं बस थक गई हूँ। ग्यारह साल से एक ही बात अपने अंदर दबाए रखने से आदमी थक जाता है।”
वो उठीं और चूल्हे की तरफ़ गईं। उन्होंने गैस बंद की, जो शायद बहुत देर से जल रही थी।
फिर वो पलटीं।
“अर्जुन,” उन्होंने कहा।
“हाँ, दीदी।”
“मैंने ग्यारह साल तक सोचा कि मैं अकेली हूँ। कि कोई नहीं है जो मेरे भोला की बात करेगा। मैंने सोचा कि अगर मैं बोलूँगी, तो मुझे कौन सुनेगा? एक ढाबे वाली औरत को कौन सुनेगा?”
उन्होंने अपनी कमर पर बँधी चाबियों का गुच्छा छुआ।
“आज मैंने सुना कि तूने अमरीक से क्या कहा।”
“दीदी…”
“मैं दरवाज़े के पीछे खड़ी थी,” उन्होंने कहा। “मैंने सुना कि तूने कहा — ट्रक बेच दूँगा।”
मैंने नज़रें नीची कर लीं।
उन्होंने पास आकर मेरे कंधे पर हाथ रखा।
“तू मेरा बेटा नहीं है,” उन्होंने कहा। “पर तू उस आदमी का बेटा है जिसने मेरे भोला के लिए एक बार लड़ने की कोशिश की थी। और मैंने उसे रोका था।”
“किसे?”
“उसके पापा को,” उन्होंने कहा। “रघुवीर को। वो एक बार मेरे ढाबे पर आया था, बरसों पहले। उसने कहा था — दीदी, तुम्हारे पति की मौत सादी मौत नहीं थी। मैंने कहा — भईया, मेरे दो बच्चे नहीं हैं, मेरा ये ढाबा है, मुझे मत उलझाओ।”
उनकी आवाज़ भारी हो गई।
“उसने फिर कभी नहीं कहा। और फिर वो खुद चला गया। और मैं यहाँ रोटी बनाती रही।”
ढाबे में कुछ पल के लिए सिर्फ़ पंखे की आवाज़ रही।
फिर रुक्मा दीदी ने अपना हाथ मेरे कंधे से हटाया और सीधी खड़ी हो गईं।
“अब सुन सब,” उन्होंने कहा। “मैं चुप नहीं रहूँगी।”
नैना ने कैमरा उठाया।
“दीदी, कहिए।”
“नहीं,” रुक्मा दीदी ने कहा। “कैमरा बाद में। पहले मैं इनसे बोलूँगी।”
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
“अर्जुन, एक बात पूछूँ?”
“पूछो, दीदी।”
“अब तू बता,” उन्होंने कहा, “हम राठौर के ख़िलाफ़ खड़े हैं, तो उसका सामना कैसे करेंगे?”
मैंने कुछ नहीं कहा।
“क्योंकि वो तो शहर का सबसे बड़ा आदमी है,” उन्होंने कहा। “उसके पास गाड़ियाँ हैं, दफ़्तर हैं, वकील हैं, नेता हैं। उसके पास काग़ज़ हैं। और हमारे पास क्या है? एक पीला लिफ़ाफ़ा, कुछ बीमा पर्चियाँ, एक ढाबा और एक ट्रक जो तू बेचने की बात कर रहा है।”
वो मेरी आँखों में देख रही थीं।
“बता,” उन्होंने कहा, “हमारे पास क्या है?”
मैंने ढाबे के उस कोने को देखा। बेंच पर फैले इकतालीस काग़ज़। कबीर खड़ा था, हाथ में वो आधा जला पन्ना। जुगनू दरवाज़े पर खड़ा था। नैना के हाथ में कैमरा था। और सामने रुक्मा दीदी खड़ी थीं, हाथ में पीला लिफ़ाफ़ा।
मैंने अपनी जेब से पापा की घड़ी निकाली और उसे देखा।
वो अब भी आगे चल रही थी। आठ मिनट।
मैंने घड़ी वापस जेब में रखी।
“दीदी,” मैंने कहा, “हमारे पास इकतालीस काग़ज़ हैं।”
“इकतालीस काग़ज़ किसी राठौर के सामने क्या हैं?”
“अकेले कुछ नहीं,” मैंने कहा। “पर हम इकतालीस काग़ज़ लेकर नहीं लड़ेंगे।”
“तो क्या लेकर लड़ेंगे?”
मैंने बेंच की तरफ़ इशारा किया।
“एक काग़ज़ लेकर,” मैंने कहा। “सिर्फ़ एक। और उसके पीछे एक आदमी। फिर दूसरा काग़ज़, और दूसरा आदमी।”
मैंने काग़ज़ों को उलटना शुरू किया।
“कल सुबह अमरीक भाई बोलेंगे। पर वो अकेले नहीं बोलेंगे। उनके साथ टिंकू का इलाज होगा, उनकी पत्नी होगी, और उनकी गवाही होगी। कल शाम हम सब उनके पास खड़े होंगे।”
“और फिर?”
“फिर हमारे पास एक गवाह होगा। उसके बाद हम बल्लू के पास जाएँगे। उसके पास तार के तीन टुकड़े हैं। वो डरेगा। उसे भी हम खड़ा करेंगे। फिर टीटू। फिर गार्ड। फिर मीरा दीदी।”
मैंने काग़ज़ों के बीच से वो फोटो निकाली।
“और फिर,” मैंने कहा, “हम उस आदमी को ढूँढेंगे जिसका चेहरा इस फोटो में खुरचा हुआ है। क्योंकि जिसका चेहरा खुरचा गया हो, उसका नाम कहीं न कहीं लिखा ही होगा।”
“और अगर वो नाम नहीं मिला?”
“तो हम उसका चेहरा निकालेंगे,” मैंने कहा। “हम उस जगह जाएँगे जहाँ से ये फोटो आई है। हम उस आदमी को ढूँढेंगे जो उस रात ट्रक के नीचे था। हम उसे ढूँढेंगे जिसने केबल काटी। हम उसे ढूँढेंगे जिसने कहा कि केबल काटो।”
मैंने रुक्मा दीदी की तरफ़ देखा।
“पर सबसे पहले,” मैंने कहा, “हम उसे ढूँढेंगे जो शहर के हर बड़े आदमी का काला काग़ज़ अपने पास रखता है। क्योंकि दीदी, जब कोई आदमी इतना बड़ा हो जाता है कि उसे कोई कुछ नहीं कह सकता, तो वो अपने ही डर की वजह से बड़ा होता है। और हम उसका डर ढूँढेंगे।”
रुक्मा दीदी ने मेरी तरफ़ देखा।
फिर उन्होंने अपना पीला लिफ़ाफ़ा उठाया और उसे उस बेंच पर रख दिया — इकतालीस काग़ज़ों के ठीक बीच में।
“अब इकतालीस नहीं,” उन्होंने कहा। “बयालीस।”
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
“दीदी…”
“मेरा हिसाब भी इसमें जुड़ेगा,” उन्होंने कहा। “भोला का हिसाब। दोनों एक ही तारीख़ के हैं। अब दोनों साथ जाएँगे।”
वो पलटीं और चूल्हे की तरफ़ चलीं।
फिर रुकी और बिना पलटे बोलीं।
“और अर्जुन, एक बात याद रख।”
“क्या?”
“तू अपना ट्रक मत बेच।”
“पर टिंकू…”
“टिंकू का इलाज एक आदमी नहीं करेगा,” उन्होंने कहा। “आज रात तक ढाबे पर इकतालीस ड्राइवर खाना खाने आए थे। अगर मैं उनसे कहूँ कि एक बच्चे का इलाज रुका हुआ है, तो कोई भूखा नहीं सोएगा।”
वो मुड़ीं।
“तेरा ट्रक तेरे पापा का नाम है,” उन्होंने कहा। “वो नहीं बिकेगा। वो चलेगा। और जब चलेगा, तो उसके पीछे तेरा ही नहीं, इस पूरे शहर का नाम चलेगा।”
मैंने अपना सिर नीचे किया।
ढाबे के बाहर कोई ट्रक हॉर्न बजाकर निकला। उसकी आवाज़ ढाबे के टिन के शेड से टकराकर अंदर आई।
और मुझे लगा कि उस आवाज़ में कुछ है जो पहले नहीं था।
मैंने बेंच पर रखे काग़ज़ों को एक बार फिर देखा। बयालीस काग़ज़। एक पीला लिफ़ाफ़ा। और उसके ऊपर मेरे पापा की घड़ी — जो अभी भी आठ मिनट आगे चल रही थी।
मैंने कबीर की तरफ़ देखा।
“कल का हिसाब लगाओ,” मैंने कहा। “कितने आदमी चाहिए, कितना वक़्त चाहिए, कहाँ मिलेंगे।”
“मैं लगाता हूँ,” उसने कहा।
“और एक काम करो,” मैंने कहा। “कल सुबह सबसे पहले इस बयालीस काग़ज़ की तीन कॉपी बनवाओ। तीन नहीं — चार।”
“चार क्यों?”
“क्योंकि एक कॉपी उस आदमी को भेजनी है,” मैंने कहा, “जो समझता है कि हम सिर्फ़ दो कॉपी बनवाएँगे।”
कबीर ने अपनी कॉपी में कुछ लिखा और सिर हिलाया।
मैं ढाबे के बाहर आया।
आसमान में तारे थे, पर उनकी रोशनी बहुत धीमी थी। सामने सड़क पर एक ट्रक गुज़रा और उसकी हेडलाइट दीवार पर फैल गई और फिर खींचकर गुज़र गई।
जुगनू मेरे पास आया।
“भैया,” उसने कहा।
“हाँ?”
“वो चश्मे वाला आदमी,” उसने कहा। “जो यार्ड में था। जो आपसे बोला था कि चीज़ें संभालनी पड़ती हैं।”
“हाँ?”
“मैंने उसकी गाड़ी देखी,” जुगनू ने कहा। “वो सफ़ेद थी। और उसके पीछे नंबर की जगह एक नीला गोल निशान था।”
मैंने उसकी तरफ़मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“किस गाड़ी में?” मैंने पूछा।
“बड़ी सफ़ेद गाड़ी,” जुगनू ने कहा। “जो यार्ड के फाटक पर खड़ी थी। जिसमें वो उतरा था जिसने आपसे हाथ मिलाया था। उसके पीछे नंबर की जगह नीला गोल। बिल्कुल वैसा ही जैसा सात सफ़ेद ट्रकों के पीछे था।”
“तूने कब देखा?”
“जब वो जाने लगा। मैं फाटक के पास खड़ा था। उसने मुझे देखा भी नहीं। उसका ड्राइवर दरवाज़ा खोल रहा था और वो अंदर बैठ गया। मैंने पीछे देखा। नंबर की जगह पीतल की पट्टी लगी थी, और उस पर कोई नंबर नहीं। बस नीला गोल।”
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