A Dark Secret – Chapter 225
मैं उनके बीच बैठ गया।
“एक बात याद रखना,” मैंने कहा। “आज से हम सब एक ही कहानी बोलेंगे।”
“कौन सी कहानी?” जुगनू ने पूछा।
“यही कि हमने अलमारी खरीदी,” मैंने कहा। “और अलमारी में हमें कुछ मिला। और वो कुछ ऐसा है जो हमें सबको दिखाना है।”
“किसको?” नैना ने पूछा।
“सबको,” मैंने कहा। “पहले ड्राइवरों को। फिर उन लोगों को जो काग़ज़ पढ़ते हैं।”
“और अगर वो काग़ज़ पढ़ने वाले डर गए?”
“तो उन्हें डरने दो,” मैंने कहा। “डरने वाले काग़ज़ पढ़ते हैं। और जो काग़ज़ पढ़ते हैं, वो एक दिन लिखते भी हैं।”
रुक्मा दीदी ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ था — शायद वो चीज़ जो उम्मीद कहलाती है, या शायद वो चीज़ जो उम्मीद से भी थोड़ी ज़्यादा होती है।
“बेटा,” उन्होंने कहा, “तेरे पापा ने तुझे सही नाम दिया था।”
“कौन सा नाम?” मैंने पूछा।
“अर्जुन,” उन्होंने कहा। “जो आँख बंद करके भी निशाना लगा ले।”
मैं हँसा। पहली बार उस दिन में मैं सच में हँसा।
मैंने अपनी जेब से वो फोटो निकाली और उसे फिर से देखा। उस तीसरे आदमी के खुरचे हुए चेहरे को देखा। उसकी जेब से लटकते सफ़ेद रुमाल को देखा।
मैंने फोटो पलटी। उस पर लिखी तारीख़ को देखा — सत्ताईस सितंबर।
मेरे हाथ फिर काँपे।
पर इस बार मैंने उन्हें रोका नहीं।
क्योंकि इस बार वो कंपन डर का नहीं था। वो उस आदमी के ख़िलाफ़ था जिसने मेरे पापा को मिटाने की कोशिश की, पर मेरे पापा किसी काग़ज़ पर मिट गए — किसी की जेब में नहीं।
और मैं उसे ढूँढने वाला था।
चाहे वो कितनी भी बड़ी अलमारी में छिपा हो।
मैंने फोटो को अपनी कॉपी में रखा और कॉपी को अपने सीने से लगाया। मेरे सामने ढाबे का दरवाज़ा था। बाहर अंधेरा था। पर मुझे पता था कि सुबह होगी।
और सुबह होते ही मैं उस आदमी का नाम ढूँढूँगा जिसका चेहरा किसी ने खुरच दिया था।
क्योंकि जिसका चेहरा खुरचा गया हो, उसका नाम कहीं न कहीं तो लिखा ही होगा।
॥
मैं हँसा। पहली बार उस दिन में मैं सच में हँसा।
पर हँसी ज़्यादा देर नहीं टिकी। क्योंकि सामने मेज़ पर वो काग़ज़ पड़े थे, और काग़ज़ हँसी नहीं समझते।
“दीदी,” मैंने कहा, “एक बेंच खाली कर दो। मुझे ये सब फैलाना है।”
रुक्मा दीदी ने कुछ नहीं पूछा। उन्होंने बस अपनी चाय का गिलास उठाया और बेंच पर से सब हटा दिया। फिर उन्होंने पीछे से एक साफ़ कपड़ा लाकर बेंच पर बिछा दिया।
“गंदा है,” उन्होंने कहा। “काग़ज़ पर धूल मत छोड़ना।”
नैना ने अपना फटा बैग बेंच के कोने पर रखा, चश्मा ऊपर धकेला और कैमरा सामने रख दिया।
“बत्ती ठीक है?” उसने पूछा।
“सामने वाली कम है,” रुक्मा दीदी ने कहा। “मैं दूसरी जला देती हूँ।”
दो बत्तियाँ जल गईं। ढाबे का वो कोना अचानक किसी दफ़्तर जैसा लगने लगा — बस फ़र्क़ यह था कि यहाँ चारपाई थी, चूल्हे की महक थी और दीवार पर हल्दी के छींटे थे।
मैंने अलमारी से काग़ज़ों का बंडल निकाला।
पहले वही, जो सबसे ऊपर थे — राठौर लॉजिस्टिक्स के बीमा दावों की फोटोकॉपी। नीले काग़ज़ पर काली स्याही में छपी लाइनें।
मैंने उन्हें एक-एक करके बेंच पर रखना शुरू किया।
पहला काग़ज़। दूसरा। तीसरा।
नैना ने गिनना शुरू किया।
“एक… दो… तीन…”
जब सब फैल गए, तब उसने गिनती पूरी की।
“इकतालीस,” उसने कहा।
“इकतालीस,” मैंने दोहराया।
मैंने सबसे पहला काग़ज़ उठाया और अपनी आँखों के सामने किया।
ऊपर बड़े अक्षरों में छपा था — बीमा दावा। नीचे गाड़ी का नंबर। नीचे हादसे की तारीख़। नीचे रकम। और सबसे नीचे — सरिता कार्गो। और उसके नीचे, छोटे अक्षरों में, वही दो शब्द जो मैंने अब तक किसी काग़ज़ पर नहीं देखे थे — राठौर लॉजिस्टिक्स।
मैंने दूसरा उठाया।
वही। तारीख़ — सत्ताईस सितंबर। नाम — राठौर लॉजिस्टिक्स।
तीसरा उठाया।
सत्ताईस। राठौर लॉजिस्टिक्स।
चौथा। पाँचवाँ। छठा।
मेरे हाथ अब तेज़ हो गए थे। मैं उन्हें उलटने लगा था, जैसे कोई पुरानी रसीदों की गड्डी में अपना नाम ढूँढता है।
“अर्जुन,” नैना ने कहा। “धीरे। तुम्हारे हाथ काँप रहे हैं।”
“नहीं काँप रहे,” मैंने कहा।
“काँप रहे हैं,” उसने कहा।
मैंने हाथ रोका। सच में काँप रहे थे। मैंने दोनों हाथ मेज़ पर रखे और एक गहरी साँस ली।
“ठीक है,” मैंने कहा। “तुम पढ़ो। तुम्हारी आँखें तेज़ हैं।”
नैना बेंच के दूसरी तरफ़ आ गई। उसने एक-एक काग़ज़ उठाया, पढ़ा और उलटकर रख दिया।
“पहला — गाड़ी नंबर पाँच सात तीन दो। हादसा सत्ताईस सितंबर। चालक — रामप्रसाद। रकम — दो लाख चालीस हज़ार।”
“दूसरा — गाड़ी नंबर आठ एक नौ चार। सत्ताईस सितंबर। चालक — शकील अहमद। रकम — तीन लाख दस हज़ार।”
“तीसरा — पाँच सात तीन दो। सत्ताईस सितंबर। चालक — बलवान सिंह। रकम — दो लाख पचहत्तर हज़ार।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“रुको,” मैंने कहा। “तीसरे में गाड़ी वही है जो पहले में थी?”
“हाँ,” नैना ने कहा। “पाँच सात तीन दो। एक ही गाड़ी। पर चालक का नाम अलग।”
“और रकम?”
“रकम भी अलग।”
मैंने काग़ज़ अपनी तरफ़ खींचकर देखा। सच में, गाड़ी का नंबर वही था। एक अक्षर भी नहीं बदला था।
“ये क्या है?” मैंने कहा।
“ये,” नैना ने कहा, “यही है जो मैं तीन महीने से ढूँढ रही हूँ।”
उसने बाक़ी काग़ज़ तेज़ी से पढ़ने शुरू किए।
“चौथा — सत्ताईस सितंबर। पाँचवाँ — सत्ताईस सितंबर। छठा — सत्ताईस सितंबर। सातवाँ…”
वो रुकी।
“क्या हुआ?” मैंने पूछा।
“सातवाँ,” उसने धीरे से कहा, “गाड़ी नंबर चार दो छब्ब एक।”
ढाबे में अचानक शोर कम हो गया। या शायद शोर वैसा ही था, बस मेरे कानों ने सब कुछ धीमा कर दिया।
“चार दो छब्ब एक,” मैंने दोहराया।
“हाँ,” नैना ने कहा। “वही गाड़ी। वही तारीख़। और रकम…”
“कितनी?” मैंने पूछा, हालाँकि मुझे पहले से पता था।
“चार लाख उन्नीस हज़ार,” उसने कहा।
मैंने आँखें बंद कर लीं।
सातवीं बीमा पर्ची — वो जो टिन के डिब्बे में सबसे नीचे थी, जो बाक़ी छह से अलग थी, जिस पर चमकदार काली स्याही थी, जिस पर टोल की मुहर इक्कीस सितंबर की थी — उस पर यही नंबर लिखा था। चार दो छब्ब एक। और यही रकम — चार लाख उन्नीस हज़ार।
“तो मतलब,” मैंने धीरे से कहा, “वो पर्ची इसी दावे की जुड़वाँ बहन है।”
“इससे भी बुरा,” नैना ने कहा। “वो पर्ची सत्ताईस से छह दिन पहले की है। मतलब — हादसा होने से छह दिन पहले दावे का काग़ज़ बन चुका था।”
मैंने आँखें खोलीं।
ढाबे की बत्ती नैना के चश्मे पर चमक रही थी। पीछे चूल्हे पर कुछ उबल रहा था। जुगनू बाहर बेंच पर बैठा था और उसके हाथ में रुक्मा दीदी का दिया हुआ टिन का गिलास था। कबीर कोने वाली चारपाई पर बैठा अपनी मोटी कटी-फटी कॉपी में कुछ लिख रहा था। उसका कैलकुलेटर उसके बगल में रखा था।
“कबीर,” मैंने कहा।
उसने सिर उठाया।
“इनकी रकम जोड़ सकते हो?”
“क्यों नहीं,” उसने कहा।
वो उठा, बेंच के पास आया और काग़ज़ों को एक-एक करके पढ़ने लगा। उसके बटन ज़ोर से दबते थे — ठक, ठक, ठक। ढाबे में वो आवाज़ अजीब तरह से साफ़ सुनाई दे रही थी।
नैना उसके कंधे के ऊपर से देख रही थी।
“इकतालीस,” कबीर ने कहा। “सब जोड़ लिए।”
“कितना?” मैंने पूछा।
उसने कैलकुलेटर मेरी तरफ़ घुमाया।
“आठ करोड़ से ऊपर,” उसने कहा।
ढाबे में कुछ पल के लिए कोई नहीं बोला।
“आठ करोड़,” नैना ने धीरे से दोहराया। “आठ करोड़। और ये सिर्फ़ ये इकतालीस काग़ज़ हैं। ये सिर्फ़ वो जो अलमारी में थे।”
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