A Dark Secret – Chapter 224
“हाँ,” उसने कहा। “बस… मुझे याद आया कि मैंने ऐसा ताला पहले भी खोला था।”
“कब?”
“बहुत पहले,” उसने कहा। “जब मैं छोटा था।”
वो कुछ और कहना चाहता था, पर उसने खुद को रोक लिया। मैंने उससे ज़्यादा नहीं पूछा। मैंने दरवाज़ा खोला।
अंदर अंधेरा था। अलमारी में से धूल और काग़ज़ की महक आ रही थी — पुरानी स्याही की महक, जैसे कोई पुरानी किताब खोली हो।
मैंने अंदर हाथ डाला। मुझे काग़ज़ों का ढेर मिला। वो सब बहुत सावधानी से रखे गए थे। कुछ बंडलों में बँधे थे, कुछ खुले पड़े थे।
मैंने पहला बंडल निकाला। उस पर धागा बँधा था। मैंने धागा खोला। काग़ज़ खोले।
वो फोटोकॉपी थीं। असली काग़ज़ों की कॉपी। मैंने उन्हें ऊपर उठाया, ताकि ढाबे की रोशनी उन पर पड़े।
पहली कॉपी पर बीमा दावे का फॉर्म था। उस पर गाड़ी का नंबर लिखा था, तारीख़, और एक रकम — कुछ लाख रुपये। और नीचे मोहर थी। मोहर पर साफ़ लिखा था — राठौर लॉजिस्टिक्स।
मैंने दूसरी कॉपी देखी। उस पर भी वही मोहर थी। तीसरी, चौथी, पाँचवीं — सब पर वही मोहर। हर काग़ज़ पर अलग गाड़ी, अलग तारीख़, अलग रकम, पर मोहर एक ही।
मैंने उन्हें गिनना शुरू किया। दस… बीस… पच्चीस… तीस…
“कितने हैं?” नैना ने पूछा। वो मेरे पास आ गई थी।
“कम से कम चालीस,” मैंने कहा। “और ये सिर्फ़ एक बंडल है।”
नैना ने अपना कैमरा निकाला। उसने उन काग़ज़ों की तस्वीरें लेनी शुरू कर दीं।
“ये सब बीमा दावे हैं,” मैंने कहा। “हर काग़ज़ पर राठौर लॉजिस्टिक्स की मोहर है।”
“मतलब?”
“मतलब यह कि राठौर सिर्फ़ ट्रांसपोर्ट नहीं करता,” मैंने कहा। “वो बीमा भी करता है। और ये सारे दावे… ये सारे हादसे…”
“सत्ताईस तारीख़ के,” नैना ने कहा। उसने एक काग़ज़ उठाया और उसे गौर से देखा। “तुम्हें दिख रहा है?”
मैंने देखा। उस काग़ज़ पर तारीख़ सत्ताईस सितंबर थी। मैंने दूसरा उठाया। उस पर भी सत्ताईस सितंबर थी। तीसरा — वही तारीख़।
“ये सब एक ही दिन के हैं,” मैंने कहा।
“अलग-अलग साल,” नैना ने कहा। “पर तारीख़ एक ही।”
मैंने तीसरा बंडल खोला। उसमें काग़ज़ अलग तरह के थे — रसीदें। टोल की रसीदें। सब पर बाईस नंबर टोल की मोहर थी।
“ये तो…” मैंने कहा।
“क्या?”
“ये वो रसीदें हैं जो टीटू ने मुझे दी थीं,” मैंने कहा। “एक ही गाड़ी, एक ही रसीद नंबर, अलग-अलग रकम। यही तो…”
मैं रुक गया।
मैंने अपनी कॉपी निकाली। उसमें मैंने वो सब लिखा था जो मुझे पता था। मैंने उसे खोला और पन्ने पलटे।
“मिल रहा है?” नैना ने पूछा।
“हाँ,” मैंने कहा। “ये वही रसीदें हैं। एक ही गाड़ी, एक ही दिन, पर अलग-अलग लीटर। और हर बार नीला गोल निशान।”
“तो इसका मतलब क्या है?”
“मतलब यह कि ये काग़ज़ किसी के लिए भारी हैं,” मैंने कहा। “इनसे कोई भी आदमी डर सकता है।”
मैंने अलमारी में हाथ डाला। मेरे हाथ को कुछ और मिला — एक छोटा सा डिब्बा। लकड़ी का। ज़ंग लगा हुआ। मैंने उसे बाहर निकाला।
उसे खोलने में ज़ोर लगाना पड़ा। ढक्कन जाम था। मैंने छड़ से उसे खोला।
अंदर कुछ काग़ज़ थे। बहुत पुराने। उनकी स्याही फीकी पड़ गई थी। और उनके नीचे एक फोटो थी।
मैंने फोटो उठाई। वो छोटी थी, बहुत पुरानी। उसके किनारे घिस गए थे। मैंने उसे करीब से देखा।
मेरे हाथ रुक गए।
फोटो में तीन आदमी खड़े थे। वो लोग एक पीले ट्रक के आगे खड़े थे। मैं उस ट्रक को पहचानता था — वही पीला ट्रक। मेरे पापा का ट्रक।
बायीं तरफ़ मेरे पापा खड़े थे। रघुवीर यादव। उनकी वही मूँछें, वही आँखें, वही हँसी। उनके हाथ में एक रुमाल था, जो तेल में डूबा हुआ लग रहा था।
दायीं तरफ़ देवा भाई खड़े थे। उनका वही सफ़ेद कुर्ता-पजामा, वही मुस्कान। पर उनकी मुस्कान में कुछ और था — जैसे वो जानते हों कि यह फोटो कब खींची जा रही है और क्यों।
और बीच में एक तीसरा आदमी था।
वो लंबा था। उसके कपड़े साफ़-सुथरे थे। पर उसका चेहरा… उसका चेहरा किसी ने खुरच दिया था। ब्लेड से। जैसे किसी ने जानबूझकर उसे मिटाने की कोशिश की हो। सिर्फ़ उसकी जेब से एक सफ़ेद रुमाल लटक रहा था — आधा दिख रहा था, आधा छिपा हुआ।
मेरे हाथ काँपने लगे।
“अर्जुन?” नैना ने कहा। “क्या हुआ?”
मैंने फोटो पलटी। उसके पीछे हरी स्याही में कुछ लिखा था। पापा की हरी स्याही। मैं उसे पहचानता था — वही स्याही जो रजिस्टर में थी, वही स्याही जो फ्रेम के पीछे थी।
वहाँ लिखा था — सत्ताईस सितंबर।
बस इतना। साल नहीं। महीना नहीं। बस तारीख़।
मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने फोटो को दोनों हाथों से पकड़ा, पर वो काँप रही थी।
“ये तारीख़…” रुक्मा दीदी ने कहा। वो मेरे पीछे आ गई थीं। उनकी आवाज़ भारी थी।
“हाँ,” मैंने कहा। “यही तारीख़ मेरे पापा की मौत की है।”
“और यही तारीख़ भोला की मौत की भी,” उन्होंने कहा।
मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर वो भाव नहीं था जो रोने वाले के चेहरे पर होता है। वो उस भाव से बहुत आगे जा चुकी थीं।
“दीदी,” मैंने कहा, “ये फोटो उस रात से पहले की है या बाद की?”
उन्होंने फोटो देखी। उन्होंने उसे करीब से देखा। फिर उन्होंने कहा, “तुम्हारे पापा के हाथ में रुमाल है। वो उसे पकड़े हुए हैं। अगर यह उस रात के बाद की होती, तो रुमाल उनके हाथ में क्यों होता?”
“मतलब ये उस रात से पहले की है,” मैंने कहा।
“या उसी रात की,” उन्होंने कहा। “शायद कुछ देर पहले।”
मैंने फोटो को फिर से देखा। उस तीसरे आदमी के खुरचे हुए चेहरे को देखा। उसकी जेब से लटकते सफ़ेद रुमाल को देखा।
“ये तीसरा आदमी कौन है?” नैना ने पूछा।
“मुझे नहीं पता,” मैंने कहा। “पर मुझे पता है कि इसे छिपाने वाला जानता है।”
“कैसे?”
“क्योंकि जिसे छिपाना है, वो पहले जानता है कि क्या छिपाना है।”
मैंने फोटो को अपनी कॉपी में रखा। मैंने उसे ध्यान से रखा, ताकि वो मुड़े नहीं।
“अब क्या?” कबीर ने पूछा।
“अब,” मैंने कहा, “हमें इस आदमी का चेहरा ढूँढना है।”
मैंने अलमारी के बाकी काग़ज़ निकाले। मैंने उन्हें गिना। मेरे हाथ अब भी काँप रहे थे, पर अब वो कंपन डर का नहीं था। वो गुस्से का था।
मैंने नैना की तरफ़ देखा।
“तुम्हारा कैमरा चल रहा है?” मैंने पूछा।
“हाँ,” उसने कहा।
“तो सब रिकॉर्ड करो,” मैंने कहा। “हर काग़ज़। हर मोहर। हर तारीख़।”
“क्यों?”
“क्योंकि ये काग़ज़ अब हमारे पास हैं,” मैंने कहा। “और जब काग़ज़ हमारे पास हों, तो उनकी कॉपी दुनिया के पास होनी चाहिए।”
रात ग्यारह बजे मैंने सारे काग़ज़ वापस अलमारी में रखे। मैंने उन्हें वैसे ही रखा जैसे वो थे। फिर मैंने अलमारी का दरवाज़ा बंद किया और बाहरी ताला लगाया।
“तुम इसे यहीं छोड़ोगे?” कबीर ने पूछा।
“नहीं,” मैंने कहा। “पर आज रात यहीं रहेगी।”
“क्यों?”
“क्योंकि जो इसे ढूँढ रहे हैं, वो यहाँ नहीं ढूँढेंगे। वो सोचेंगे कि हम इसे कहीं और छिपाएँगे।”
“और कल?”
“कल,” मैंने कहा, “हम इसे उस जगह ले जाएँगे जहाँ से इसे कोई नहीं उठा सकता।”
मैं ढाबे के बाहर आया। आसमान में तारे थे। मैंने अपनी जेब से पापा की घड़ी निकाली। वो अब भी आगे चल रही थी — आठ मिनट।
मैंने उसे देखा और मुस्कुराया।
“पापा,” मैंने धीरे से कहा, “आपने सही कहा था। ये आदमी अकेले नहीं मिलना चाहिए।”
मैंने घड़ी वापस जेब में रखी और अंदर चला गया।
ढाबे के अंदर रुक्मा दीदी चूल्हे पर कुछ गरम कर रही थीं। जुगनू चारपाई पर बैठा था। नैना अपने कैमरे की बैटरी बदल रही थी। कबीर अपनी कॉपी में कुछ लिख रहा था।
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