A Dark Secret – Chapter 216
यार्ड में धूल की एक हल्की परत हवा में तैर रही थी। तिरपाल के नीचे कुर्सियाँ बिछी थीं। आगे लकड़ी की लंबी मेज़ थी, जिस पर नायब तहसीलदार बैठा था। उसके दाएँ हाथ में माइक था और बाएँ हाथ में छोटा हथौड़ा। मेज़ के नीचे एक मोटी रजिस्टर और स्याही की दो दवातें रखी थीं। पीछे चार फाटक दिख रहे थे, जिनमें से एक आधा खुला था। उसी आधे फाटक से धूप आ रही थी और उसी धूप में यार्ड की धूल सोने जैसी चमक रही थी।
मेरे पीछे जुगनू खड़ा था। वह मेरी कुर्सी के पीछे झुका और एक ही साँस में बोल गया।
“दाईं तरफ़ वाला बड़ा फाटक बंद है, पर उसकी कुंडी अधूरी है। बाहर वाले रास्ते पर दो सफ़ेद गाड़ियाँ खड़ी हैं। एक में कोई बैठा है, दूसरी खाली लग रही है। पान वाला आदमी पीले फाटक के पास खड़ा है, उसने अभी पीक थूकी। और बाईं तरफ़, तीसरी कुर्सी पर जो सफ़ेद बालों वाला सूट पहने बैठा है, वह यार्ड का आदमी नहीं है। वह जब भी देखता है, आपको देखता है।”
“साँस ले, जुगनू,” मैंने धीरे से कहा।
“ले रहा हूँ,” उसने कहा। “बस एक बात और — चौकीदार के पास चाय का गिलास है, पर वह पी नहीं रहा। बार-बार मेज़ की तरफ़ देख रहा है।”
“अब जाकर नैना के पास खड़ा हो जा। और कुछ मत बोलना।”
“अगर कोई पूछे?”
“तो कहना, चाय लाया था।”
जुगनू सरक गया। मैंने अपनी जेब से भोला का पुराना कबाड़ लाइसेंस निकाला। वह पीला काग़ज़ अब भी मुड़ा हुआ था, किनारों से फटा हुआ और बीच से कुछ जगह पसीने या तेल से चिकनी हो चुकी थी। उस पर पुरानी स्याही में नाम लिखा था — भोला। और नीचे, क्रमांक की जगह, धुँधले अक्षरों में एक नंबर लिखा था — पैंतालीस।
मैंने उस नंबर को देखा और मुस्कुरा दिया।
बोली का नंबर पैंतालीस था।
क्लर्क ने मुझे जो पीली पर्ची दी थी, उस पर भी वही नंबर था। मैंने उसे जेब में रखा और सामने वाली मेज़ की तरफ़ देखा। वहाँ देवा भाई बैठे थे। सफ़ेद कुर्ता, सफ़ेद पाजामा, सोने की अंगूठी, और चश्मा जेब में। उनके दाएँ हाथ में चाय का कटोरा था और बाएँ हाथ में कोई काग़ज़। उनके पीछे मुनीम खड़ा था। मुनीम के हाथ में वही लाल जेब वाला रजिस्टर था।
मैं उठा और सामने वाली मेज़ की तरफ़ चला।
रास्ते में एक ड्राइवर ने मेरा कंधा थपथपाया और कुछ कहने लगा, पर मैंने सिर्फ़ सिर हिलाया। मेरा पूरा ध्यान उस कुर्सी पर था जो देवा भाई की मेज़ के ठीक सामने खाली पड़ी थी।
मैंने वह कुर्सी खींची और बैठ गया।
कुर्सी की एक टाँग चरमराई। देवा भाई ने उस आवाज़ पर नज़र उठाई। पहले उन्होंने मुझे देखा, फिर मेरी जेब की तरफ़, फिर मेरे हाथ की तरफ़। और फिर वही मुस्कान। वही पुरानी मीठी मुस्कान, जो हर पैसे वाले आदमी की जेब से पहले उसके चेहरे पर आती है।
“बेटा,” उन्होंने कहा, “तुम भी आए।”
“भाई साहब,” मैंने कहा, “आपकी दुआ से आज मैं भी खरीदार हूँ। बस जेब थोड़ी पतली है।”
पीछे किसी ने हँसी दबाई। फिर एक और हँसा। फिर हॉल में हल्की हँसी दौड़ गई। देवा भाई ने भी हँसने की कोशिश की, पर उनकी हँसी में वो बात नहीं थी जो उनके शब्दों में थी।
“जेब पतली हो तो दिल मोटा रखना चाहिए, बेटा,” उन्होंने कहा।
“दिल तो मोटा ही है, भाई साहब,” मैंने कहा। “इसीलिए तो यहाँ तक आ गया।”
मुनीम ने रजिस्टर पर हाथ रखा और मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वही पुरानी चापलूसी थी, पर आज उसमें एक नई चीज़ थी — हिसाब। वह पहले से हिसाब लगा रहा था कि मैं कहाँ तक जा सकता हूँ।
नायब तहसीलदार ने हथौड़ा उठाया।
“अलमारी, आधार मूल्य पंद्रह हज़ार। बोली शुरू।”
मुनीम ने तुरंत कहा, “सोलह।”
मैंने कहा, “सत्रह।”
“अठारह,” मुनीम ने कहा।
“उन्नीस,” मैंने कहा।
“बीस।”
“इक्कीस।”
हॉल में अब हँसी नहीं थी। सब चुप थे। किसी ने खाँसा। किसी ने कुर्सी बदली। धूल की महक और चाय की गंध आपस में मिल रही थी। देवा भाई के कटोरे से भाप उठ रही थी, पर वे चाय पी नहीं रहे थे।
“पच्चीस,” मुनीम ने कहा।
“छब्बीस,” मैंने कहा।
“तीस।”
मैं एक पल रुका। तीस हज़ार मेरे पास नहीं थे। पर यह पहली बार नहीं था जब मैं अपने पास से ज़्यादा की बोली लगा रहा था। यह अलमारी मेरे पास आनी थी। इसमें जो काग़ज़ थे, वो मेरे पापा का हिसाब थे। और मैं उस हिसाब को यहीं, इसी यार्ड में, इसी धूल में नहीं छोड़ सकता था।
“इकतीस,” मैंने कहा।
मुनीम ने देवा भाई की तरफ़ देखा। देवा भाई ने हल्का सा सिर हिलाया।
“पैंतीस,” मुनीम ने कहा।
“छत्तीस।”
“चालीस।”
हॉल में कुछ लोग आगे झुक गए। रुक्मा दीदी मेरे पीछे खड़ी थीं। मैंने उनकी आवाज़ नहीं सुनी, पर उनकी चूड़ियों की खनक सुनाई दी। वे अपना हाथ मेरी कुर्सी की पीठ पर रखे हुए थीं। उनके हाथ में वही पुरानी कॉपी थी।
“इकतालीस,” मैंने कहा।
“बयालीस,” मुनीम ने कहा।
“तेंतालीस।”
“चौवालीस।”
मैंने एक पल के लिए अपनी जेब में रखी पीतल की छोटी चाबी महसूस की। भोला की चाबी। बनवारी कहता था यह चाबी उसकी जान से महँगी है। मुझे नहीं पता था यह किस ताले की है, पर मुझे पता था कि यह किसी ताले की है। और आज मैं इस अलमारी को किसी भी हालत में देवा भाई के पास नहीं छोड़ सकता था।
“पैंतालीस,” मैंने कहा।
मेरा नंबर था ही पैंतालीस। जैसे भोला ने खुद अपनी उँगली उठा दी हो।
देवा भाई ने पहली बार अपनी चाय का कटोरा मेज़ पर रखा। कटोरा रखते वक़्त उनकी उँगली काँपी। बहुत हल्की, बहुत छोटी, पर मैंने देख ली। और मुझे लगा कि इस अलमारी में कुछ ऐसा है जो उन्हें सिर्फ़ काग़ज़ से ज़्यादा डरा रहा है।
“पचास,” मुनीम ने कहा।
हॉल में एक साँस रुक गई।
“इक्यावन,” मैंने कहा।
“बावन।”
“तिरपन।”
“चौवन।”
“पचपन।”
“सत्तावन,” मुनीम ने कहा। उसकी आवाज़ अब थोड़ी ऊँची हो रही थी। वह चापलूसी वाला मुनीम नहीं था, अब वह हिसाब वाला मुनीम था। जो अगर हार गया तो उसे अपना हिसाब देना पड़ेगा।
“अट्ठावन,” मैंने कहा।
मेरे पीछे रुक्मा दीदी ने धीरे से कहा, “बेटा, हद है।”
मैंने बिना पलटे कहा, “दीदी, हद तो उसने पहले पार की थी।”
देवा भाई ने मुझे देखा। उनकी आँखों में अब मुस्कान नहीं थी। सिर्फ़ एक ठंडा सा हिसाब था। और उस हिसाब में एक सवाल था — यह लड़का यहाँ तक कैसे पहुँचा?
“साठ,” मुनीम ने कहा।
मैंने अपने हाथ की उँगली देखी। मेरी उँगली पर तेल की काली लकीर थी। मैंने उसे अपनी पैंट पर पोंछा और फिर उँगली उठाई।
“इकसठ।”
मुनीम ने देवा भाई की तरफ़ देखा। देवा भाई ने कोई इशारा नहीं किया। सिर्फ़ अपना हाथ मेज़ पर रखा। उनकी सोने की अंगूठी मेज़ पर टकराई और उसकी आवाज़ पूरे तिरपाल के नीचे गई।
“बासठ,” मुनीम ने कहा। उसकी आवाज़ पहली बार थोड़ी फटी।
बासठ हज़ार।
मेरे पास इतना पैसा नहीं था। मेरे पास चार सौ रुपये से शुरू किया हुआ ट्रांसपोर्ट था, एक बूढ़ा शेर था, कुछ ड्राइवरों का भरोसा था और एक टूटी हुई कुर्सी थी। बासठ हज़ार मेरे लिए पहाड़ जैसा था। पर मैं जानता था कि इस अलमारी के अंदर जो है, उसके सामने बासठ हज़ार कुछ भी नहीं था।
मैंने उँगली उठाई।
“तीन,” नायब तहसीलदार ने कहा।
और उसी पल देवा भाई ने अपनी उँगली उठाई।
“एक,” नायब तहसीलदार ने कहा।
देवा भाई की उँगली हवा में थी। उनका मुँह खुला था। वे कुछ कहने ही वाले थे कि नायब तहसीलदार ने दूसरी गिनती बोली।
“दो।”
मुनीम ने हड़बड़ी में कहा, “तीनसठ।”
पर नायब तहसीलदार ने मुनीम की तरफ़ नहीं देखा। उसने सिर्फ़ अपना हथौड़ा उठाया और तीसरी गिनती बोली।
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