A Dark Secret207 / 536

A Dark Secret – Chapter 207

7 min read November 6, 2026

मैंने चाय पी और काग़ज़ों की तरफ़ देखा।

"जुगनू।"

"हूँ।"

"ट्रांसपोर्ट यार्ड कितनी बार देखा है तूने?"

वो सीधा होकर बैठ गया।

और फिर, एक ही साँस में, बोलना शुरू किया — जैसे किसी ने उसे रटा हुआ सबक याद कराया हो।

"चार फाटक हैं। पूरब वाला बड़ा, वहाँ से ट्रेलर निकलते हैं, उस पर दो आदमी रहते हैं दिन में और रात में एक। उत्तर वाला छोटा, वहाँ से सिर्फ़ पैदल और साइकिल जाती है, उसका कुंडा अंदर से लगता है और वहाँ बैठने की जगह नहीं है, चौकीदार खड़ा रहता है और वो बहुत बड़बड़ाता है। दक्षिण वाला फाटक पिछले साल टूट गया था, अब लोहे की शीट लगा दी है, पर उसके नीचे दो फुट की जगह है, मैं वहाँ से निकल चुका हूँ एक बार, आधी पैंट गीली हो गई थी। और पश्चिम वाला — वो असली है। वहाँ से सब कुछ अंदर-बाहर जाता है। वहाँ दो नाके हैं। एक बाहर वाला, जहाँ रसीद कटती है, और एक अंदर वाला, जहाँ सिर्फ़ नाम पूछते हैं, रसीद नहीं। अंदर वाले नाके पर एक मोटी मेज़ है और उस मेज़ पर हमेशा कोई बैठा रहता है, पर वो आदमी कभी नहीं हँसता।"

उसने साँस ली और रुक गया।

मैं देखता रह गया।

"और चौकीदार?"

"एक बूढ़ा है। सत्तर से ऊपर। वो दोपहर में सोता है। ठीक बारह बजे से दो बजे तक। उसकी कुर्सी पूरब वाले फाटक के पीछे है, धूप में। मैंने तीन दिन देखा है, वो एक भी दिन नहीं जगा उस वक़्त।"

"तूने तीन दिन वहाँ क्या किया?"

उसने कंधे उचकाए।

"बैठा था। गिन रहा था गाड़ियाँ।"

"क्यों?"

"क्योंकि तुमने कहा था कि जो गिनता है, वो जानता है।"

मेरा गला भर आया। मैंने गिलास मुँह से लगाकर छिपा लिया।

"और यार्ड के अंदर?"

"अंदर तीन गोदाम हैं। एक लंबा, दो छोटे। लंबे वाले के सामने टायरों का ढेर है और पीछे एक पतली सड़क है जो बाहर वाली गली में मिल जाती है। छोटे गोदामों में से एक हमेशा बंद रहता है, उसका दरवाज़ा नीला है और उस पर ताला नहीं, सिर्फ़ एक साँकल है।"

"साँकल?"

"हाँ। जैसे किसी ने जल्दी में बंद किया हो।"

मैंने काग़ज़ उठाए और बनियान के नीचे दबा दिए।

"चल," मैंने कहा। "एक काम है।"

"क्या काम?"

"रसगुल्ले खरीदने हैं।"

जुगनू ने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मैंने कहा हो कि आज चाँद पर चलना है।

"रसगुल्ले?"

"हाँ। बारह का डिब्बा। अच्छी दुकान से।"

"किसके लिए?"

मैंने गैराज का फाटक बंद किया और कुंडी चढ़ाई।

"अमरीक सिंह के लिए," मैंने कहा।

जुगनू एक पल चुप रहा। फिर बोला, "वो तो यूनियन का अध्यक्ष है।"

"हाँ।"

"वो तो कल सच बोलने वाला था।"

"हाँ।"

"तो उसके लिए रसगुल्ले क्यों?"

मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।

"क्योंकि," मैंने कहा, "जिस आदमी के घर में कोई बीमार है, उसके घर खाली हाथ जाना ठीक नहीं लगता। और मैं उससे लड़ने नहीं जा रहा, जुगनू। मैं उससे मिलने जा रहा हूँ।"

"फ़र्क़ क्या है?"

"फ़र्क़ ये है कि लड़ने में हाथ उठता है, और मिलने में नहीं।"

वो समझ गया। उसने रस्सी उठाई, जो गैराज में हमेशा पड़ी रहती थी, और बोला, "मैं चलूँ?"

"तू तो चलेगा ही।"

"और रिपोर्टर दीदी?"

"वो भी।"

हम तीनों निकल पड़े।

गली से बाहर निकलते ही सड़क पर धूल थी, जो सूरज चढ़ने के साथ हल्की गरम हो रही थी। एक ठेले वाला बर्फ़ की सिल्ली पर कपड़ा डालकर बैठा था। दो बच्चे स्कूल की तरफ़ भाग रहे थे, एक के हाथ में नीली बोतल थी और दूसरे के पैर में चप्पल उलटी पहनी हुई थी।

हमने मिठाई की दुकान से रसगुल्ले लिए। दुकान वाला लड़का डिब्बा बाँधते-बाँधते बोला, "किसी के घर जा रहे हो?"

"हाँ," मैंने कहा।

"फिर सुनो — डिब्बा ढक्कन से नहीं, रस्सी से बाँधना चाहिए। ढक्कन खुल जाता है, चाशनी बह जाती है, और घर वाले को लगता है कि तुमने जल्दी में पकड़ाया।"

मैं हँसा।

"तूने सही सिखाया," मैंने कहा।

अमरीक सिंह का क्वार्टर टोल से पहले वाली गली में था, ड्राइवर कॉलोनी के अंदर। वहाँ घर एक जैसे थे — पीली दीवार, हरी खिड़की, छत पर पानी की टंकी, और हर दरवाज़े के बाहर चप्पलों की जोड़ी, जैसे हर घर में कोई आदमी हो जो कभी न कभी उतरकर अंदर गया हो और अब बाहर न आया हो।

गली कीचड़ में थी। एक हैंडपंप के नीचे औरत सिर धो रही थी। दो कुत्ते छाया में लेटे थे। एक बच्चा गाड़ी का पुराना टायर लुढ़काकर ले जा रहा था, टायर में लाठी डालकर।

नैना मेरे पीछे रुक गई और उसने अपना चश्मा ऊपर धकेला।

"तुम सीधे घर जा रहे हो," उसने कहा। "ये सही है?"

"नहीं। पर यही इकलौता तरीक़ा है।"

"अगर उसने काग़ज़ माँगे?"

"तो लौटा दूँगा।"

"अगर गुस्सा किया?"

"तो सुनूँगा।"

"अगर —"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"नैना, मैं उसे कुछ नहीं कहने आया। मैं उसे ये कहने आया हूँ कि मुझे पता है उसका बेटा बीमार है। और मुझे पता है कि वो मजबूरी में झुका है।"

नैना ने कुछ नहीं कहा। उसने अपना बैग संभाला और पीछे रह गई।

मैंने दरवाज़ा खटखटाया।

पहली दस्तक पर कोई नहीं आया।

दूसरी पर अंदर से चप्पल की आवाज़ आई।

दरवाज़ा खुला और सामने एक औरत खड़ी थी — पचास के आसपास, हल्की सफ़ेद होती हुई साड़ी, हाथों पर कुछ सेव लगा हुआ, और चेहरे पर वो थकान जो नींद से नहीं, सालों से आती है।

"कौन?" उसने पूछा।

"मेरा नाम अर्जुन है। मैं ट्रकों का काम करता हूँ। अमरीक भाई से मिलना था।"

उसका चेहरा एक पल सख़्त हुआ, फिर पिघला।

"वो यूनियन गए हैं। आते-जाते लगेंगे।"

"कोई बात नहीं। मैं इंतज़ार कर लूँगा।"

वो झिझकी।

"बेटा अंदर है," उसने धीरे से कहा, जैसे ये बात पहली बार बाहर किसी को बताई जा रही हो। "तबीयत ठीक नहीं है।"

"पता है," मैंने कहा।

उसने देखा — सीधा, आँखों में। पूछा नहीं कि कैसे पता है। बस किनारे हटकर रास्ता दे दिया।

घर छोटा था। एक कमरा, एक रसोई की करीब-करीब खुली जगह, और आगे का आँगन, जहाँ धूप में कपड़े सूख रहे थे। दीवार पर एक फोटो लगी थी — एक आदमी फीरोज़ी रंग की शर्ट में, हाथ में काग़ज़ का गुच्छा, और आँखों में वो नमी जो फोटो में कभी नहीं दिखनी चाहिए पर दिख जाती है।

कमरे के कोने में चारपाई थी।

उस पर एक लड़का लेटा था। सोलह-सत्रह साल का। कंबल उससे बड़ा लग रहा था। और उसकी बाँहें — मैं झूठ नहीं बोलूँगा — सूखी लकड़ी जैसी पतली थीं, जैसे हड्डी पर बस खाल चढ़ी हो।

उसने मेरी ओर देखा और जैसे पहचानने की कोशिश की।

"पापा आए?" उसके स्वर में इतनी उम्मीद थी कि मुझे नीचे देखना पड़ा।

"नहीं। मैं दोस्त हूँ।"

"कौन से दोस्त? पापा के तो सिर्फ़ दो दोस्त हैं और दोनों सभा में ही मिलते हैं।"

उसकी माँ पास आई और कंबल सीधा किया।

"पानी पिएगा?" उसने मुझसे पूछा।

"नहीं, आप बैठिए।"

पर वो नहीं बैठी। वो रसोई में गई और एक गिलास भरकर लाई। और जब उसने गिलास मेरी तरफ़ बढ़ाया, उसका हाथ काँप रहा था।

मैंने गिलास पकड़ा और पी लिया।

तभी चारपाई के पास वाली मेज़ पर मेरी नज़र गई।

वहाँ काग़ज़ों का एक मोटा फ़ाइल पड़ा था। इतना मोटा कि चारपाई से ज़्यादा भारी लग रहा था। ऊपर अस्पताल की पर्चियाँ थीं, कुछ मुड़ी हुईं, कुछ सीधी, कुछ पर लाल मोहर और कुछ पर सिर्फ़ पेंसिल के नंबर।

एक पर्ची किनारे से गिर रही थी। मैंने उसे उठाया, और उसे वापस रखते हुए मेरी नज़र उसके नीचे दबी एक दूसरी पर्ची पर पड़ी।

छोटी पर्ची। बैंक की। और उस पर मोहर।

मैंने उसे उठाया।

मोहर साफ़ थी — ठाकुर ट्रांसपोर्ट।

पर उसके नीचे जो खाते का नाम लिखा था, वो ठाकुर ट्रांसपोर्ट नहीं था।

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