A Dark Secret – Chapter 208
वहाँ लिखा था — रा लॉजिस्टिक्स।
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
मैंने पर्ची पलटी। पीछे तारीख़ थी — पिछले महीने की एक तारीख़ — और रकम बारह हज़ार पाँच सौ।
नाम की जगह लिखा था — ए. सिंह.
मैंने पर्ची को अपनी मुट्ठी में दबाया और पूछा, "ये क्या है?"
औरत ने देखा और जैसे कोई रोज़ की बात हो, हाथ हिलाया।
"ये तो हर महीने आता है। एक बाबू आता है, गाड़ी से। हमेशा बुधवार को। दो मिनट बैठता है, दो काग़ज़ गिनता है, पैसे रखकर चला जाता है।"
"कौन बाबू?"
"पतला। चटका चश्मा। बोलता बहुत धीरे है। कहता है भाई साहब की तरफ़ से है।"
मेरा दिमाग़ गरम हो गया।
"भाई साहब कौन?"
वो रुकी।
"मुझे नहीं पता। मैंने कभी पूछा नहीं।" उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "जब बेटा बीमार हो, तो आदमी ये नहीं पूछता कि दवा कहाँ से आई। वो सिर्फ़ ये देखता है कि दवा आई।"
मैं चुप हो गया।
और उसी चुप्पी में चारपाई पर लेटा लड़का बोला।
"आप ड्राइवर हो?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा और मुस्कुराया।
"नहीं," मैंने कहा। "मैं ट्रकों का डॉक्टर हूँ।"
लड़के की आँखों में एक झलक आई, जैसे कमरे में हवा आई हो।
"ट्रकों का डॉक्टर?"
"हाँ। मैं आवाज़ सुनकर बताता हूँ कि गाड़ी को क्या हुआ है।"
वो हँसा।
पहले धीरे, फिर ज़ोर से — और उस हँसी में खाँसी मिल गई, पर वो रुका नहीं।
"फिर तो," उसने साँस लेकर कहा, "आपको मेरे पापा को भी देखना चाहिए।"
"क्यों?"
"क्योंकि उनका दिल भी बहुत टूटा हुआ है। और उनकी आवाज़ में एक आवाज़ ऐसी आती है जो पहले नहीं आती थी। मैं सुनता हूँ रात में। वो सोचते हैं कि मैं सो गया हूँ।"
मेरे हाथ में पकड़ी पर्ची और भारी हो गई।
तभी मुझे याद आया — मुनीम। हर बुधवार। देवा का मुनीम हर बुधवार शाम अमरीक के घर आता था। दो मिनट रुकता था। काग़ज़ गिनता था।
मैंने फोन जेब से निकाला, नैना का नंबर लगाया और मुँह से सिर्फ़ इतना कहा, "अंदर आ जाओ। पर धीरे।"
नैना आई।
उसने कमरे में देखा, फिर लड़के को देखा, फिर मेरे हाथ में पकड़ी पर्ची को।
और एक पल में उसका चेहरा बदल गया, क्योंकि उसने भी वही नाम पढ़ा।
"अर्जुन," उसने फुसफुसाया, "ये रा लॉजिस्टिक्स है।"
"हाँ।"
"यानी —"
"यानी," मैंने धीरे से कहा, "जो पैसा भाई साहब की तरफ़ से आता है, वो ठाकुर ट्रांसपोर्ट से आ रहा है, पर जमा रा लॉजिस्टिक्स के खाते में हो रहा है।"
नैना ने तुरंत बैग से कैमरा निकाला।
"तस्वीर ले सकती हूँ?"
मैंने औरत की तरफ़ देखा।
"दीदी," मैंने कहा, "ये पर्ची मैं आपको वापस कर दूँगा। पर एक तस्वीर चाहिए। सिर्फ़ पर्ची की। आपका नाम कहीं नहीं आएगा।"
वो एक पल चुप रही। फिर बोली, "मेरे पति से पूछ लेना।"
"पूछ लूँगा। पर पहले बताइए — क्या ये पैसा हर महीने बराबर आता है?"
"बारह हज़ार पाँच सौ," उसने कहा, बिना सोचे। "पिछले आठ महीने से। पहले दस हज़ार आता था। फिर बढ़ गया।"
"क्यों बढ़ा?"
"क्योंकि बेटे का इलाज बढ़ा।" उसकी आवाज़ में न कोई शिकायत थी, न कोई भावना। सिर्फ़ हिसाब। "बाबू ने खुद कहा था कि भाई साहब ने कहा है, ज़रूरत बढ़ी है तो पैसा भी बढ़ेगा। और ये भी कहा था कि —"
वो रुक गई।
"क्या कहा था?"
"उसने कहा था, जब तक काम चलता रहेगा, पैसा चलता रहेगा।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
मैंने चारपाई के पास खड़े होकर लड़के से पूछा, "तुम्हारा नाम क्या है?"
"टिंकू।"
"टिंकू, तुमने कभी उस बाबू को देखा है?"
"एक बार। वो दरवाज़े पर खड़ा था और मैंने उसकी घड़ी देखी। उसका पट्टा दो जगह से सिला हुआ था।"
मेरा दिल धक से रह गया।
दो जगह से सिला हुआ पट्टा।
बाईं कलाई पर, दस साल से एक ही जगह बैठी पुरानी घड़ी।
बनवारी लाल।
मैंने नैना की तरफ़ देखा और वो भी मेरी तरफ़ देख रही थी, और उसकी आँखों में वही बात थी जो मेरे दिमाग़ में चल रही थी — बनवारी लाल, बाईस नंबर टोल का मुनीम, जो दस साल से हिसाब जोड़ता आया है, वही दो मिनट के लिए हर बुधवार यहाँ आता है।
और उसकी कोठरी जल गई थी।
और वो लापता था।
मैंने काग़ज़ों के फ़ाइल की तरफ़ देखा।
"दीदी, ये सारी पर्चियाँ अस्पताल की हैं?"
"हाँ। सब।"
"कोई और काग़ज़?"
वो हिचकी।
"एक फाइल है," उसने कहा। "पति के पास रखी है। मुझे नहीं पता उसमें क्या है। उन्होंने कहा था कि इसे कोई पढ़े नहीं।"
"वो फाइल कहाँ है?"
वो कमरे के कोने की तरफ़ देखने लगी — जहाँ एक लोहे का बक्सा था, जो क़ीमे के काग़ज़ों और चाय के पुराने डिब्बों के नीचे दबा था।
"उसी में," उसने कहा।
मैंने कुछ पूछने के लिए मुँह खोला और तभी बाहर गली में किसी के चलने की आवाज़ आई। तेज़ नहीं, धीमी, पर जानी-पहचानी — जैसे कोई आदमी थका हुआ लौट रहा हो और हर क़दम पर एक गहरी साँस ले रहा हो।
औरत ने सुना और उसका चेहरा एक पल में बदल गया।
"वो आ गए," उसने कहा, और साड़ी का पल्लू सीधा करते हुए दरवाज़े की तरफ़ बढ़ी।
दरवाज़ा खुला।
सामने अमरीक सिंह खड़ा था।
काले कोट के नीचे सफ़ेद शर्ट पसीने से चिपकी हुई थी। हाथ में दवाइयों का एक पैकेट था, जिस पर फार्मेसी की पीली पर्ची चिपकी थी। और आँखों में वो डर जो घर लौटकर दरवाज़े पर किसी अजनबी की चप्पल देखकर आता है।
उसकी नज़र मुझ पर पड़ी।
फिर नैना पर।
फिर उसके हाथ से पैकेट छूट गया।
पैकेट फ़र्श पर गिरा। दवाइयों के पत्ते खुले और नीली गोलियाँ, सफ़ेद गोलियाँ, फ़र्श पर बिखर गईं, और एक गोली लुढ़ककर मेरे पैर के पास रुकी।
अमरीक सिंह नीचे नहीं झुका।
वो मुझे देखता रहा।
और फिर उसने धीरे से कहा, इतना धीरे कि जैसे कोई क़बूलनामा पढ़ रहा हो —
"तुमने मेरे बच्चे को देख लिया।"
मैंने सिर हिलाया।
उसने एक लंबी साँस ली, जो उसके शरीर को अंदर से खींचती लगी।
"अब मैं तुम्हारे सामने झूठ नहीं बोल सकता।"
मैं चुप रहा।
अमरीक सिंह दरवाज़े पर ही खड़ा रहा, और उसकी बीवी ने झुककर गोलियाँ बटोरनी शुरू कर दीं, एक-एक करके, जैसे वो उसकी ज़िंदगी के आख़िरी टुकड़े हों।
मैंने उसकी तरफ़ हाथ बढ़ाया — मदद के लिए — पर वो नहीं उठा।
वो बस मुझे देखता रहा और उसकी आँखें भर आईं।
"अंदर आइए," मैंने कहा। "बैठिए।"
"क्यों?"
"क्योंकि," मैंने कहा, "यहाँ खड़े-खड़े बात करने से आपका बेटा अंदर से सुन लेगा।"
अमरीक सिंह ने मेरी तरफ़ देखा, फिर चारपाई की तरफ़, और फिर वो धीरे से अंदर आया, कमरे के कोने वाली कुर्सी पर बैठ गया, और अपना कोट उतारकर अपने ही घुटनों पर रख लिया।
कमरे में बस दवाइयों की गंध रह गई थी।
॥
अमरीक सिंह ने कुर्सी की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़, और फिर वो कुर्सी छोड़कर नीचे ज़मीन पर बैठ गया।
फ़र्श पुराना सीमेंट का था, जिस पर बरसों की धूल जमकर एक हल्का स्लेटी रंग बन गई थी। उसने अपने घुटने मोड़े, कोट को बगल में रखा, और फिर अपनी दोनों कलाइयाँ आगे करके मेरे सामने रख दीं। हथेलियाँ ऊपर, उँगलियाँ फैली हुई, जैसे कोई थाने में खड़ा हो और कह रहा हो, लो, हथकड़ी लगा दो।
मैंने कुछ नहीं कहा।
कमरे में उस वक़्त सिर्फ़ तीन आवाज़ें थीं। छत का पुराना पंखा, जो हर चक्कर पर एक बार ठुनकता था। बाहर गली में किसी दूर के नल की टपक। और अंदर के कमरे से टिंकू की साँस, जो सोते हुए भी थोड़ी तेज़ चल रही थी, जैसे शरीर आराम में भी किसी चीज़ से लड़ रहा हो।
अमरीक सिंह ने अपनी कलाइयाँ वैसी ही रखी रहने दीं और बोला।
"ग्यारह साल," उसने कहा। "ग्यारह साल से मैं इस शहर के ड्राइवरों का अध्यक्ष हूँ, और ग्यारह साल से हर महीने मेरे पास एक लिफ़ाफ़ा आता है।"
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