A Dark Secret – Chapter 206
"और तू?"
"मैं यहीं हूँ। नैना का फोन आएगा।"
"अर्जुन, वो नाम — विक्रम राठौर — मुझे बार-बार याद आ रहा है।" उन्होंने धीरे से कहा। "मुझे लगता है मैंने ये नाम उस आदमी के मुँह से सुना था जिसके पास सबका काग़ज़ होता था।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"कल सुबह," मैंने कहा। "आपने वादा किया है।"
"किया है," उन्होंने कहा। "और इस बार मैं नहीं भूलूँगा।"
वो अंदर गए। दरवाज़ा बंद हुआ। कुंडी की आवाज़ आई।
मैं गैराज के अंदर लौटा और उसी पुराने लोहे के पत्ते पर बैठ गया, जहाँ काग़ज़ सूख रहे थे। मैंने अपनी कलाई पर रखी घड़ी को देखा, फिर अपनी जेब से वो पीली फोटो निकाली, जिसमें चौथे आदमी का चेहरा खुरचा हुआ था और उसकी जेब से सफ़ेद रुमाल लटक रहा था।
फोटो को पीले बल्ब के नीचे करके मैंने उस सफ़ेद रुमाल को ध्यान से देखा। उस पर कोई धुँधला सा निशान था, कढ़ाई जैसा। मैं उसे पहचान नहीं पा रहा था।
फोन बजा।
मैंने एक ही रिंग में उठाया।
"नैना?"
"अर्जुन।" उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी। इतनी धीमी कि मुझे फोन कान से चिपकाना पड़ा। "तू ठीक है?"
"हाँ। तू?"
"मैं टायरों के ढेर के पीछे हूँ। मेरे घुटने में दर्द हो रहा है, पर मैं हिली नहीं। और अर्जुन — मुझे कुछ दिखा।"
"बता।"
"जब अलमारी ट्रक पर चढ़ गई, तो सफ़ेद कुर्ते वाला पतला आदमी आया। उसने देवा भाई से कहा कि चाबी लाओ। देवा भाई ने कहा कि चाबी उसके पास कल से है, आज सुबह से, और वो उसे अपनी जेब में रखे हुए है।"
"फिर?"
"फिर देवा भाई ने चाबी निकाली और उसे देने लगे। और तभी —"
वो रुकी। मैंने उसे साँस लेने दिया।
"तभी एक और आदमी आया, अर्जुन। सफ़ेद बालों वाला। मैंने उसे पहले नहीं देखा था। वो गाड़ी से नहीं उतरा, वो पहले से वहीं खड़ा था, अंधेरे में, दीवार के पास। और उसने देवा भाई के हाथ से चाबी ले ली।"
"कैसा दिख रहा था वो?"
"लंबा, अर्जुन। सफ़ेद बाल, बहुत साफ़ कटे हुए। सूट पहने हुए था। और उसकी आवाज़… उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी। ऐसी धीमी जैसे हर शब्द पहले से लिखा हुआ हो और वो सिर्फ़ उसे पढ़ रहा हो।"
मेरे हाथ की मुट्ठी अपने आप बंद हो गई।
"उसने क्या कहा?"
नैना ने साँस ली। मैंने सुना, उसके हाथ में जो काग़ज़ थे, वो हल्के से खड़खड़ाए।
"उसने चाबी अपनी जेब में रखी," नैना ने कहा, "और फिर देवा भाई की तरफ़ मुड़कर कहा — देवा, मेरी चीज़ में हाथ क्यों लगाया?"
गैराज की गुनगुनाती बत्ती भी एक पल के लिए चुप हो गई, ऐसा मुझे लगा।
"अर्जुन," नैना ने धीरे से कहा, "ये आदमी देवा भाई से भी बड़ा है।"
मैंने आँख बंद की।
सड़क पर कोई दूर गाड़ी गुज़री, और उसकी आवाज़ मेरे कान से टकराकर गुज़र गई। छह पहिये। पुराना इंजन। बोझ हल्का।
"नैना," मैंने कहा, "तू वहीं रह। ज़रा भी मत हिल।"
"मैं हिली नहीं।"
"और वो गाड़ी गई?"
"गई। पर अलमारी नहीं ले गए।"
मैंने आँखें खोलीं।
"क्या?"
"उन्होंने अलमारी वहीं उतार दी। गोदाम के पीछे, दीवार के सहारे। और अब दो आदमी उसके चारों तरफ़ घूम रहे हैं, जैसे कोई खोज रहे हों। जैसे उन्हें भी नहीं पता कि उसके अंदर क्या है।"
मैं खड़ा हो गया।
सामने, पीले बल्ब के नीचे, वो गीला काग़ज़ पड़ा था, जिस पर छपा था — नीलामी की सूचना, सत्ताईस तारीख़, शाम चार बजे, ट्रांसपोर्ट यार्ड, राठौर लॉजिस्टिक्स।
और उसके नीचे पापा की एक लाइन — इस आदमी के पास सबका काग़ज़ है, इससे अकेले मत मिलना।
मैंने फोन कान से लगाया।
"नैना, सुन। उस अलमारी में कुछ है, जो उन्हें भी नहीं पता। और वो दो आदमी उसे खोलने की कोशिश करेंगे, नहीं खोल पाएँगे, और फिर वो उसे वापस अंदर ले जाएँगे।"
"तो?"
"तो हमें उससे पहले जानना है कि उस अलमारी पर लिखा नाम मेरे पापा के रजिस्टर में क्यों है।"
"अर्जुन —"
"कल सुबह नौ बजे, वो बात करेंगे। पर आज रात मुझे सिर्फ़ एक चीज़ चाहिए।"
"क्या?"
मैंने काग़ज़ को बनियान के नीचे दबाया और घड़ी की तरफ़ देखा, जो आठ मिनट आगे चल रही थी।
"मुझे ये जानना है," मैंने कहा, "कि वो सफ़ेद बालों वाला आदमी कौन है, जिसके पास शहर के सबसे बड़े आदमी की चाबी है, और जिसके नाम से देवा भाई की उँगली काँपती है।"
फोन पर चुप्पी हुई, और उस चुप्पी में मैंने नैना के हाथ की हल्की खड़खड़ाहट सुनी, जो काग़ज़ों की थी।
"अर्जुन," उसने फिर कहा, "एक बात और। वो सफ़ेद बालों वाला जाते वक़्त रुका, और उसने मेरी तरफ़ नहीं, उस टायरों के ढेर की तरफ़ देखा जिसके पीछे मैं छिपी हूँ। और फिर वो मुस्कुराया।"
मेरा गला सूख गया।
"तू वहाँ से निकल," मैंने कहा। "अभी। धीरे नहीं, अभी।"
"मैं निकल रही हूँ," उसने कहा। "पर अर्जुन, सुन —"
"क्या?"
"वो मुस्कुराया, पर उसने मुझे छिपने दिया। जानकर छिपने दिया। और जो आदमी जानकर किसी को छिपने देता है, वो कुछ चाहता है।"
फोन कट गया।
मैं गैराज के फाटक तक गया, उसे खोला और बाहर सड़क की तरफ़ देखा। धुंध में ढाबे की बत्ती धुँधली थी, गली का मुँह खाली था, और बूढ़ा शेर वहीं खड़ा था, जहाँ मैंने उसे खड़ा किया था।
मैंने गहरी साँस ली, और भीतर ही भीतर किसी से कहा — नहीं, पापा से कहा — कि आज रात मैं अकेले नहीं जा रहा।
कि आज रात मेरे साथ एक रिपोर्टर है जो किसी से नहीं डरती।
और आज रात मेरे साथ एक लड़का है, नंगे पाँव, जिसे पूरे शहर के गाड़ी नंबर मुँहज़बानी याद हैं।
मैंने फाटक बंद किया, कुंडी चढ़ाई, और पीले बल्ब के नीचे लौटकर उन गीले काग़ज़ों को एक-एक कर सुखाने लगा, जैसे कोई बहुत क़ीमती चीज़ हो जो हाथ से निकल गई हो और अब धीरे-धीरे वापस मिल रही हो।
॥
सुबह की पहली रोशनी गैराज की टीन की छत से छनकर आई और सीधे मेरे हाथ पर गिरी, जो अब भी काग़ज़ के ऊपर जमा था।
मैंने उँगली हिलाई। सुन्न हो चुकी थी।
रात भर मैं उन गीले काग़ज़ों को पलटता रहा, एक-एक करके टूलबॉक्स के ऊपर फैलाता रहा, और हर बार जब कोई काग़ज़ सूखता, उस पर उभरती स्याही मुझे लगता जैसे कोई पुराना आदमी धीरे-धीरे बोल रहा हो।
नीलामी की सूचना अब सूख चुकी थी। काग़ज़ के नीचे से उभर आए थे वो शब्द। सत्ताईस तारीख़। शाम चार बजे। ट्रांसपोर्ट यार्ड। राठौर लॉजिस्टिक्स।
नीचे आधा नीला गोल निशान था — आधा ही, क्योंकि मोहर आधी दबी थी।
और एक आधा नंबर। जो मुझे जाना-पहचाना लग रहा था और याद नहीं आ रहा था कहाँ से।
मैंने पापा की लाइन पढ़ी, जो उसी काग़ज़ के किनारे हरी स्याही में लिखी थी।
इस आदमी के पास सबका काग़ज़ है, इससे अकेले मत मिलना।
मैंने काग़ज़ उठाया, हवा में हिलाया, और खुद से कहा, "अकेले नहीं जाऊँगा, पापा। मैंने सोच लिया है।"
तभी गैराज के फाटक पर तीन दस्तकें हुईं।
दो हल्की, एक ज़ोर की।
मैंने जाना — जुगनू।
फाटक खोला तो सामने वही खड़ा था। नंगे पाँव, घुटने पर पुराना निशान, और हाथ में टिन का गिलास, जिससे भाप उठ रही थी।
"चाय," उसने कहा।
"कहाँ से?"
"दीदी ने भेजी। कहा कि पूछना कि रात में सोया या नहीं। और अगर नहीं सोया, तो कहना कि ये चाय नहीं, ये डाँट है।"
मैं हँस पड़ा।
"चल, अंदर आ।"
वो अंदर आया, टूलबॉक्स के पास बैठ गया, और गिलास मेरी तरफ़ सरका दिया।
"तूने सुबह का पानी पिया?" मैंने पूछा।
"बाद में।"
"पहले पी।"
"पी लिया," उसने झट से कहा, और मुझे पता था कि झूठ बोल रहा है, क्योंकि झूठ बोलते वक़्त उसकी आवाज़ में हमेशा एक छोटी सी हिचकी आती थी, जैसे गले में कुछ अटक गया हो।
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