A Dark Secret – Chapter 200
मैं बैठा।
“चाय पिएगा?”
“नहीं साहब।”
“अच्छा है। यहाँ की चाय में चीनी कम है और बातें ज़्यादा।”
उन्होंने फाइल खोली। पन्ने पलटे। कुछ देर मुझे पढ़ते हुए देखा, जैसे मैं कोई काग़ज़ होऊँ।
“अर्जुन यादव,” उन्होंने पढ़ा, “पिता स्वर्गीय रघुवीर यादव, निवासी कंधा बस्ती, काम — मज़दूरी, गाड़ी की मरम्मत।”
“सही है।”
“यादव मोटर गैराज से चोरी की शिकायत दर्ज हो गई है।”
मैं कुछ नहीं बोला।
“सुन रहा है?”
“सुन रहा हूँ साहब।”
“शिकायत में लिखा है कि गैराज का सामान ग़ायब है। औज़ार, पुर्जे, काग़ज़। और जिस रात तुम वहाँ पकड़े गए थे, उसके बाद से ये सब ग़ायब है।”
“कितने का सामान?”
तिवारी ने फाइल में देखा।
“लिखा है — बहुत।”
मैं हँसा नहीं। पर मेरे अंदर कुछ हिला ज़रूर। कोई काग़ज़ नहीं, बस एक शब्द — बहुत।
“साहब,” मैंने कहा, “शिकायत किसने दी?”
“जिसका हक़ है, उसने दी।”
“नाम है काग़ज़ पर?”
तिवारी ने पन्ना उठाया, फिर वापस रख दिया।
“तुम वकील लाओगे तो देख लेना।”
“वकील नहीं लाऊँगा।”
“तो?”
“जो काग़ज़ दिखाना है दिखा दो साहब,” मैंने कहा। “ऐसे ही रखे रहोगे तो मुझे क्या पता कि शिकायत है भी या बस बात है।”
तिवारी ने मेरी तरफ़ देखा। कुछ देर तक। फिर उन्होंने फाइल बंद कर दी।
“तुम गुस्सा नहीं कर रहे,” उन्होंने कहा। “ये ठीक नहीं लगता। जो आदमी इस मेज़ तक आता है, वो या तो चिल्लाता है या रोता है। तुम बैठे हो।”
“चिल्लाने से काग़ज़ नहीं बदलते साहब।”
वो अपनी कुर्सी पर पीछे झुके। पंखा घूमा। ठुन। फिर से घूमा। ठुन।
“एक बात पूछूँ?” उन्होंने कहा।
“पूछो।”
“उस गैराज में तुम रात में क्या ढूँढ रहे थे?”
“जो मेरे पापा का था।”
“वो तुम्हारा कैसे?”
मैंने अपनी बाईं कलाई उठाई। पापा की घड़ी। पट्टा दो जगह से सिला हुआ, और हमेशा आगे चलने की आदत।
“ये घड़ी उन्होंने छोड़ी थी,” मैंने कहा। “बस यही नहीं छोड़ी थी। जो काग़ज़ अपने पास रखते थे, वो भी कहीं रखे होंगे।”
तिवारी ने घड़ी देखी। फिर अपनी मेज़ पर पड़ा फ़ोन उठाया। स्क्रीन देखी। फिर वापस रख दिया, उल्टा।
“अगली तारीख़ पंद्रह दिन बाद,” उन्होंने कहा। “तब तक गैराज के आसपास मत घूमना। गवाही के लिए मत घूमना। और —”
वो रुके।
“और?” मैंने पूछा।
“और उस काग़ज़ को जो तुमने निकाला है, अपनी जेब में मत रखना।”
मेरे अंदर कुछ ठंडा उतरा। पर मेरे चेहरे पर कुछ नहीं आया। यही चीज़ मैं पापा से सीखा था — चेहरा सस्ता, काग़ज़ महँगा।
“मैं कुछ निकाला नहीं साहब।”
“अच्छा।”
“सच।”
तिवारी ने फाइल उठाई, फिर रख दी। फिर वो पीले नोट को फाइल के नीचे से निकालकर अपनी जेब में रखने लगे — बिना देखे, बिना गिने, आदत से।
“जा,” उन्होंने कहा।
मैं उठा। दरवाज़े तक गया। फिर रुका।
“साहब।”
“हूँ।”
“मेरे पापा की मौत की फाइल कहाँ है?”
पंखा घूमा।
“दस साल पुरानी है,” उन्होंने कहा।
“पूछा है पुरानी है क्या?”
तिवारी ने मेरी तरफ़ देखा, और उस एक पल में उस सरकारी चेहरे के पीछे कुछ और दिखा — थकान से भी ज़्यादा कुछ।
“उस रैक में,” उन्होंने कहा। “और जो वहाँ पहुँचते हैं, वो वापस नहीं आते। जा।”
बाहर बरामदे में थाने का बूढ़ा बाबू हाज़िरी का रजिस्टर खोलकर बैठा था। मोटा चश्मा, झुकी पीठ, उसका कलम खड़खड़ा रहा था।
मैंने एक पल रजिस्टर पर नज़र डाली।
और मैं रुक गया।
क्योंकि उसकी स्याही सूखी थी। बहुत सूखी थी। और मेरा नाम उसमें पहले से लिखा हुआ था — बाईं तरफ़, नीचे से चौथी लाइन में, मेरी उम्र और पिता का नाम के साथ।
“बाबू जी।”
“हाँ बेटा।”
“ये नाम यहाँ किसने भरा?”
वो झुका। देखा। फिर उसका चेहरा बदल गया, जैसे किसी ने उसके हाथ से चीनी छीन ली हो।
“ये — ये तो आज ही डाला गया होगा।”
“स्याही सूखी है,” मैंने कहा।
“तू — तू जा बेटा। मुझे काम है।”
“मैंने कुछ नहीं किया और मेरा नाम पहले से है। इसका मतलब है कि जब मुझे रात में गैराज से उठाया गया था, तब ही ये लिख दिया गया था। मतलब थाने को पहले से पता था कि मुझे उस रात उठाना है।”
बूढ़ा बाबू उठकर खड़ा हो गया और रजिस्टर बंद कर दिया।
“जा बेटा,” उसने इस बार धीरे से कहा, जैसे कोई दुआ दे रहा हो। “यहाँ से जा।”
मैं बाहर निकला। धूप तेज़ थी और सड़क पर धूल उड़ रही थी। मैंने नैना को फ़ोन किया। इस बार उसने पहली घंटी पर उठाया।
“कहाँ है तू?”
“थाने के बाहर। तू कहाँ है?”
“मैं दफ़्तर से निकल रही हूँ,” उसने कहा। “अर्जुन, खबर रोक दी गई है।”
“कितनी देर?”
“कहते हैं — फ़िलहाल। फ़िलहाल का मतलब यहाँ कुछ नहीं होता। फ़िलहाल का मतलब है उम्र भर।”
“क्या कहा एडिटर ने?”
उसने साँस खींची, और मैंने उसकी आवाज़ में वो कंपन सुना जो झूठ में नहीं, मजबूरी में आती है।
“उन्होंने कहा — ऊपर से फ़ोन आया है। उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा — ऊपर से। पूरा नाम नहीं लिया। और मुझसे कहा कि अमरीक सिंह का नाम खबर में नहीं जाएगा। वरना ब्यूरो बंद और चार लड़कों की नौकरी जाएगी। चार, अर्जुन। चार लड़के।”
मैंने आँख बंद की।
“तो खबर रोक दो,” मैंने कहा।
“क्या?”
“रोक दो। काग़ज़ थोड़े रुकेंगे।”
“तू समझ नहीं रहा —”
“मैं समझ रहा हूँ,” मैंने कहा। “खबर रुकेगी, काग़ज़ नहीं रुकेंगे। जब तेरी खबर रुकी है, तब मेरी कॉपी चल रही है। और जब तेरी खबर चलेगी, तब ये काग़ज़ उस खबर के नीचे होंगे — सबूत की तरह, माँग की तरह नहीं।”
वो एक पल चुप रही।
“तू बहुत ठंडा हो गया है,” उसने कहा।
“घड़ी देख,” मैंने कहा। “आठ मिनट आगे है।”
“क्या मतलब?”
“मतलब — मुझे आगे चलना है। पीछे नहीं। शाम को ढाबे आ। चाचा भी आएँगे।”
“चाचा? वो कहाँ थे?”
“वो खुद बताएँगे।”
शाम छह बजे ढाबे पर चाचा आए। वो दुबले लग रहे थे — दो दिन में ही। शर्ट वही सस्ती वाली, कॉलर से धागा लटक रहा था और वो उसे बार-बार सीधा कर रहे थे।
उनके पैर गीले थे। जूते की तले में काली चिकनी मिट्टी और सफ़ेद बारीक रेत चिपकी थी।
वो बेंच पर बैठे। रुक्मा ने पानी का स्टील गिलास उनके सामने रखा। उन्होंने पूरा पी लिया।
जुगनू सामने चौकी पर बैठा, घुटने मोड़कर, आँखें चारों तरफ़।
“अब सुनो,” मैंने कहा। “सब।”
मैंने थैला मेज़ पर रखा। खोला। एक-एक करके सब कुछ निकाला — सिली कॉपी, सात बीमा पर्चियाँ, अमरीक की सात अस्पताल पर्चियाँ, पीली डेढ़ लाख की पर्ची, पीतल के नट, फ़ौलाद का नट जिस पर रघुवीर खुदा था, कटे ब्रेक तार का टुकड़ा, दो तेल में डूबे रुमाल, आधी जली पर्ची।
और सबसे आख़िर में — पापा का काला रजिस्टर।
रुक्मा ने रजिस्टर को छुआ नहीं। बस देखा।
“ये सब गैराज में है,” मैंने कहा। “लोहे की पट्टी के ऊपर, बीम के पीछे, बनियान में बँधा हुआ। आज मैं वहाँ गया और पट्टी पर हाथ रखकर आया — सब वहीं है। पर अब वहाँ नहीं रह सकता।”
“क्यों?” जुगनू ने पूछा।
“क्योंकि आज दोपहर चोरी की शिकायत दर्ज हो गई है,” मैंने कहा। “गैराज से सामान ग़ायब है। और जिस रात मैं वहाँ पकड़ा गया था, उसके बाद से सब ग़ायब है। अब समझो।”
चाचा ने सिर उठाया।
“मतलब?”
“मतलब — अब पुलिस के पास गैराज में घुसने का कारण है,” मैंने कहा। “कल नहीं, परसों नहीं — आज रात भी हो सकती है। और अगर वो गैराज में आए और पट्टी के ऊपर देखा, तो सब ख़त्म। एक काग़ज़ भी नहीं बचेगा।”
रुक्मा ने कड़ाही की तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़।
“तो अब कहाँ रखेंगे?”
“एक जगह नहीं,” मैंने कहा। “तीन जगह।”
मैंने उँगली मेज़ पर रखी।
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