A Dark Secret – Chapter 199
“क्यों?”
“क्योंकि जिस दिन हम इसे अदालत में रखेंगे,” मैंने कहा, “उस दिन हमें उस अलमारी की चाबी भी लानी होगी। और जब चाबी आएगी, तो ये साबित हो जाएगा कि उस अलमारी में वो चीज़ें थीं जो किसी को नहीं दिखनी चाहिए थीं।”
नैना ने अपनी कलम रोकी।
“तुम्हें क्या लगता है, उस अलमारी में क्या है?” उसने पूछा।
मैंने अपने पापा की घड़ी देखी। आठ मिनट आगे।
“मुझे नहीं पता,” मैंने कहा। “पर एक बात पता है।”
“क्या?”
“जो चीज़ दो साल से मुनीम के हाथ से निकलकर अमरीक सिंह के लिफ़ाफ़े तक पहुँची, और जिस पर देवा भाई की अलमारी की मोहर लगी है — वो कोई आम काग़ज़ नहीं है। वो उस अलमारी की सबसे अंदरूनी चीज़ है। और जिस दिन वो चीज़ हमारे हाथ लगेगी, उस दिन देवा भाई को अपनी अलमारी खुद खोलनी पड़ेगी।”
मैंने कॉपी बंद की।
“चल,” मैंने कहा। “ढाबे चलें। रुक्मा दीदी को बताना है कि आज क्या हुआ।”
हम बाहर निकले। गोदाम के पीछे की गली सुनसान थी। दूर टोल की आवाज़ आ रही थी — कोई ट्रक हॉर्न बजा रहा था, लंबा और थका हुआ।
मैंने चलते-चलते अपनी जेब से फ़ोन निकाला। उस पर कोई नया संदेश नहीं था। कोई नई धमकी नहीं।
पर जब मैंने स्क्रीन बंद की, तो एक पल के लिए मुझे लगा कि गली के मोड़ पर कोई खड़ा है। कोई सफ़ेद कुर्ता पहने हुए। कोई चौड़े कंधों वाला।
मैंने देखा। वहाँ कोई नहीं था।
बस एक पुराना पोस्टर था, जो दीवार पर चिपका हुआ हवा में हिल रहा था।
मैंने नैना की तरफ़ देखा। वो भी उस मोड़ की तरफ़ देख रही थी।
“कुछ दिखा?” उसने पूछा।
“नहीं,” मैंने कहा। “बस पोस्टर।”
हम चलते रहे। और मेरे अंदर एक आवाज़ थी जो बार-बार वही कह रही थी — सातवीं पर्ची पर वो ताला। वही ताला। और वो ताला सिर्फ़ उस जेब की चाबी से खुलता है जो देवा भाई की जेब में रहती है।
मतलब अब देवा भाई को पता है कि उसकी अलमारी से कुछ निकला है।
मतलब वो हमसे पहले उस चीज़ तक पहुँचना चाहेगा।
मैंने अपनी चाल तेज़ कर ली।
“नैना।”
“हाँ।”
“आज रात हमें गैराज में नहीं रुकना।”
“तो कहाँ?”
“ढाबे पर,” मैंने कहा। “रुक्मा दीदी के पास। उसकी चारदीवारी है। काँच है आँगन में। और उसके पास वो लोहे का लंबा चमच है, जो कालू को भी रोक सकता है।”
नैना हँसी। पहली बार उस दिन।
“और हम?” उसने पूछा।
“हम?” मैंने कहा। “हम काग़ज़ों के साथ सोएँगे। और कल सुबह जब अमरीक सिंह ड्राइवरों के सामने खड़ा हो, तो हम उसके पीछे खड़े होंगे।”
हम ढाबे की तरफ़ मुड़े।
पीछे, गोदाम की छत पर, एक कौवा बैठा था। उसने एक बार आवाज़ की — कांव — और फिर चुप हो गया।
और मुझे लगा कि आज पहली बार, किसी चीज़ ने मुझे डराया नहीं।
क्योंकि आज मेरे पास सिर्फ़ सवाल नहीं थे।
आज मेरे पास सात पर्चियाँ थीं। और उनमें से एक पर — एक ताला था।
जो सिर्फ़ देवा भाई की जेब से खुलता था।
॥
ढाबे की गली में घुसते ही रुक्मा दीदी की आवाज़ सुनाई दी — ऊँची, तेज़, जैसे कोई कड़ाही नहीं, तवा उलट रही हो।
“अरे, ये सात काग़ज़ लेकर कहाँ घूम रहे हो धूप में? इन्हें तो किसी लोहे के डिब्बे में रखना चाहिए!”
मैं आँगन में घुसा। काँच के टुकड़े ज़मीन पर बिछे थे, और मैं सावधानी से उनके बीच से चलकर बेंच तक गया।
“दीदी, यही तो दिक्कत है,” मैंने कहा। “लोहे का डिब्बा जल गया।”
रुक्मा ने अपनी कॉपी बंद की और बेंच पर सातों पर्चियाँ एक-एक करके रख दीं। उसकी उँगली हर पर्ची पर रुकती गई, जैसे कोई अनाज तौल रहा हो।
“सात,” उसने कहा। “और ये सातवीं?”
“सातवीं पर देवा भाई की अलमारी के ताले की मोहर है। जो ताला अंदर है। जिसकी चाबी उनकी जेब में रहती है।”
रुक्मा ने पर्ची उठाई, आँख से दूर की, फिर पास की। रोशनी कम थी, पर वो मोहर साफ़ थी — चौकोर ताला, छोटी कड़ी, सीधी लकीर।
“ये मोहर मैंने पहले देखी है,” उसने धीरे से कहा।
“कहाँ?”
वो एक पल चुप रही। फिर पर्ची वापस रख दी।
“उस लिफ़ाफ़े पर,” उसने कहा। “जो ग्यारह साल से मेरी कड़ाही के पीछे पड़ा है।”
मैंने कुछ पूछना चाहा, पर उसने हाथ उठा दिया।
“अभी नहीं,” उसने कहा। “आज रात। जब सब बैठेंगे। अकेले में नहीं खोलूँगी।”
जुगनू दौड़ता हुआ आया, नंगे पाँव, धूल में उसके निशान बनते हुए।
“अर्जुन भैया, टोल से आगे दो सफ़ेद गाड़ियाँ गईं। एक पीली थी, बड़ी। और वो भूरी बोलेरो — वाली — वो मोड़ पर एक घंटा खड़ी रही। फिर चली गई।”
“कौन बैठा था?”
“देखा नहीं। शीशे बंद थे। पर छत पर कोई नहीं था। लाठी वाला नहीं था।”
मैंने रुक्मा की तरफ़ देखा।
“छह बजे मोटी मूँछ वाला गोदाम के पीछे खड़ा था,” मैंने कहा। “अब वो नहीं है। मतलब उसे जो चाहिए था, मिल गया।”
“क्या मिला?”
“उसे ये नहीं पता कि हमारे पास क्या है,” मैंने कहा। “उसे ये पता है कि हमारे पास कुछ है। यही फ़र्क़ है।”
रुक्मा ने मिट्टी का कटोरा मेरी तरफ़ सरका दिया। चाय गरम थी, ऊपर मलाई की पतली परत।
“पी,” उसने कहा। “तेरे हाथ काँप रहे हैं।”
मैंने कटोरा दोनों हाथों से पकड़ा। सच में काँप रहे थे।
उस रात मैं ढाबे की बेंच पर सोया। ढाबे के अंदर नहीं, बाहर, बरामदे में। क्योंकि अंदर दो खिड़कियाँ हैं और बाहर एक — और बाहर वाली खिड़की के नीचे से आवाज़ आती है, आती है तो भागने का वक़्त मिलता है।
मैंने अपना थैला अपने सिर के नीचे रखा। थैले में काग़ज़ थे — सिली कॉपी, सात बीमा पर्चियाँ, अमरीक की सात अस्पताल पर्चियाँ, पीली डेढ़ लाख की पर्ची, आधी जली पर्ची। और कपड़े में लिपटा पापा का काला रजिस्टर।
मेरे पैर के पास, ज़मीन पर, टिन का गिलास उल्टा रखा था। दीदी ने कहा था — “गिलास उल्टा रखकर सोना, जो आएगा पहले गिलास पर पैर रखेगा, तेरी नींद खुल जाएगी।”
अजीब तरकीब थी। पर काम कर गई।
रात में दो बार मेरी नींद खुली। पहली बार एक ट्रक की आवाज़ से — वो ठीक थी, बस डीज़ल की गंध ज़्यादा थी। दूसरी बार किसी चूहे से नहीं, बल्कि रुक्मा दीदी के खाँसने से। वो अंदर जाग रही थी।
सुबह जब मैं उठा, तो उसकी कॉपी खुली पड़ी थी और उसने मेरी चाय के खाने में साफ़ लिख दिया था — “अर्जुन, उधार।”
“दीदी, उधार क्यों?”
“क्योंकि तू अब मेरे यहाँ का है,” उसने कहा। “और जो मेरे यहाँ का है, उसका हिसाब मैं रखती हूँ।”
दोपहर करीब दो बजे एक सिपाही ढाबे पर आया। पतला, कम उम्र, हाथ में लाठी, जिसे वो बार-बार घुमा रहा था जैसे उससे ही उसकी नौकरी चल रही हो।
“अर्जुन यादव?”
“हाँ।”
“थाना छब्बीस नंबर। तीन बजे। तिवारी साहब बुला रहे हैं।”
“काग़ज़ है?”
“नहीं। बस बुलावा है।”
वो मुड़ा, फिर रुककर बोला — “अकेले आना। भीड़ लेकर मत आना। तिवारी साहब भीड़ पसंद नहीं करते।”
मैंने नैना को फ़ोन किया। उसने तीन बार काटा। चौथी बार उसने उठाया और उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे वो सीढ़ियाँ चढ़ रही हो।
“अर्जुन, मैं अभी नहीं आ सकती। एडिटर साहब बुला रहे हैं। और — और उनकी आवाज़ ठीक नहीं लग रही।”
“तू जा,” मैंने कहा। “मैं थाने चल रहा हूँ।”
“अकेले?”
“अकेले ही जाना है।”
थाना छब्बीस नंबर की छत पर पुराना पंखा घूम रहा था, और हर चक्कर पर ठुनक रहा था, जैसे कोई गिनती कर रहा हो। दीवार पर हरी पुताई उतर रही थी। मेज़ पर एक फाइल खुली थी और उसके नीचे एक मुड़ा हुआ पीला नोट दबा था।
तिवारी साहब बैठे थे। चमकती मूँछ, धूप का चश्मा जेब में, और आँखों में वो थकान जो दस साल की उम्र में ही आ जाती है।
“बैठ,” उन्होंने कहा।
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