A Dark Secret – Chapter 198
मैंने पर्ची को करीब लाकर देखा। गोल मोहर के अंदर जो छोटा निशान था, वो मुझे कहीं देखा हुआ लग रहा था। मैंने इसे अपनी कॉपी के पन्नों के बीच से निकाले काग़ज़ के साथ मिलाया — वही काग़ज़ जिस पर सिर्फ़ सत्ताईस छपा था और नीला गोल निशान था।
मोहर का गोल मिल रहा था।
पर अंदर का निशान नहीं।
मैंने उस निशान को ध्यान से देखा। वो एक छोटा सा आकार था — जैसे कोई अलमारी का ताला। चौकोर, ऊपर एक छोटी सी कड़ी, और बीच में एक सीधी लकीर।
मेरी साँस रुक गई।
मैंने उसे दोबारा देखा। फिर तीसरी बार।
वो देवा भाई की अलमारी का ताला था।
नकली नहीं। असली वाला ताला। जिसका निशान सिर्फ़ उन चीज़ों पर पड़ता था जो अलमारी के अंदर रखी जाती थीं — और जिसकी चाबी सिर्फ़ देवा भाई की जेब में रहती थी।
अमरीक सिंह मेरी तरफ़ देख रहे थे। उन्होंने मेरा चेहरा देखा, और उनकी आवाज़ में घबराहट आ गई।
“क्या हुआ?” उन्होंने पूछा। “क्या देखा तूने?”
मैंने पर्ची नीचे नहीं रखी। मैंने उसे अपनी हथेली पर सीधा रखा और उस मोहर को अपनी उँगली से ढक दिया।
“अमरीक जी,” मैंने कहा। “ये आख़िरी पर्ची — तुमने किसी को दिखाई?”
“नहीं।”
“किसी को बताया?”
“नहीं। मैंने इसे लिफ़ाफ़े में उसी दिन रख दिया था। जैसे मुनीम ने कहा था — संभालकर रखना।”
“तो ये पर्ची सिर्फ़ तुम्हारे पास है,” मैंने कहा। “और अब मेरे पास।”
“हाँ। पर क्यों?”
मैंने पर्ची को अपनी कॉपी के पन्नों के बीच रखा — उस काग़ज़ के ठीक ऊपर जिस पर सत्ताईस और नीला गोल था। फिर मैंने कॉपी बंद की और उसे अपनी जेब में रखा।
“क्योंकि,” मैंने कहा, “ये पर्ची सिर्फ़ अस्पताल का बिल नहीं है।”
“तो क्या है?”
“ये सबूत है,” मैंने कहा। “पहला सबूत जो सीधे उस अलमारी तक जाता है जिसका ताला सिर्फ़ देवा भाई की जेब में रहता है।”
अमरीक सिंह ने मेरी तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर वो भाव आया जो किसी आदमी के चेहरे पर तब आता है जब उसे पता चले कि जिस चीज़ से वो दो साल डरता रहा, वही उसके हाथ में आ गई है।
“अर्जुन,” उन्होंने धीरे से कहा। “मैंने आज तक ये पर्ची ऐसे नहीं देखी थी। मैंने इसे सिर्फ़ रखा था। मुझे लगता था ये मेरी शर्म है।”
“अब ये तुम्हारी शर्म नहीं है,” मैंने कहा। “ये तुम्हारी गवाही है।”
नैना ने पीछे से आवाज़ दी। उसकी आवाज़ में वो तेज़ी नहीं थी, जो आम तौर पर रिपोर्टरों की आवाज़ में होती है। इसमें कुछ और था — जैसे किसी ने लंबे वक़्त बाद पहली बार साँस ली हो।
“अमरीक जी,” उसने कहा। “मैं एक बात पूछ सकती हूँ?”
वो मुड़े। “पूछो।”
“जब आप यूनियन की कॉपी पर झूठी मोहर लगाते थे — तो क्या आपको पता था कि उससे किसी ड्राइवर का क्या होगा?”
उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने अपना सिर नीचे कर लिया।
“पता था,” उन्होंने धीरे से कहा। “और इसीलिए मैं हर बार कॉपी पर मोहर लगाने के बाद उसे उल्टा कर देता था। जैसे कोई लाश पर चादर डाल देता है।”
नैना ने कुछ नहीं कहा। उसने अपना कैमरा अपनी गोद से उठाया, उसे बैग में रखा, और बैग को अपने कंधे पर टिका लिया।
“मैं बाहर जा रही हूँ,” उसने कहा। “तुम दोनों बात करो। मैं दरवाज़े पर रहूँगी। अगर कोई आए, तो आवाज़ दे दूँगी।”
वो उठी और बाहर चली गई। दरवाज़े पर खड़ी हो गई — मैंने उसे पीछे से देखा, उसका फटा बैग कंधे से लटक रहा था, और उसके हाथ में वो छोटा कैमरा था, जो अब बंद था।
अमरीक सिंह ने फिर बोलना शुरू किया।
“एक बात और है,” उन्होंने कहा। “जो मैंने आज तक किसी को नहीं बताई।”
“कहो।”
“जब मैं कॉपी पर मोहर लगाता था, तो मुझे कभी-कभी ऐसा लगता था कि मेरे हाथ नहीं चल रहे हैं। जैसे कोई और मेरी उँगली से मोहर पकड़े हुए है। और उस वक़्त मैं अपने बेटे का चेहरा देखता था — अस्पताल के बिस्तर पर, खून की नली हाथ में, आँखें बंद। और मैं मोहर लगा देता था।”
उनकी आवाज़ रुक गई।
“अब ये मेरी अकेली शर्म नहीं रही,” उन्होंने कहा। “अब इसमें उन दो सौ ड्राइवरों का भी हिस्सा है जिन्हें मैंने धोखा दिया।”
मैंने उनके कंधे पर हाथ रखा।
“अमरीक जी।”
“हाँ।”
“ये शर्म तुम्हारे साथ रहेगी,” मैंने कहा। “मैं इसे तुमसे नहीं छीनूँगा। ये तुम्हारी है। पर अब इसे काम में लगाओ। जो किया है, उसे सुधारो। ड्राइवरों के सामने खड़े होकर सब बताओ। यूनियन की कुर्सी छोड़ो। और जो काग़ज़ तुम्हारे पास हैं, वो मेरे हवाले करो।”
“कर दूँगा,” उन्होंने कहा। “पर एक शर्त है।”
“क्या?”
“जब मैं ड्राइवरों के सामने खड़ा होऊँ, तो तू मेरे साथ खड़ा हो। मुझे अकेले बोलने की हिम्मत नहीं आएगी।”
मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर वो सब कुछ था जो एक आदमी के चेहरे पर दो साल के झूठ के बाद आता है — थकान, डर, और कुछ ऐसा जो शायद पहली बार जाग रहा था।
“ठीक है,” मैंने कहा। “मैं तेरे साथ खड़ा रहूँगा।”
उन्होंने सिर हिलाया। फिर वो उठे। उन्होंने अपनी शर्ट की बाँहें नीचे कीं। उन्होंने अपने बालों को उँगलियों से सीधा किया। फिर वो मुड़े और चलने लगे।
दरवाज़े पर पहुँचकर वो रुके।
“अर्जुन।”
“हाँ।”
“जब मैं कल तुम्हारे गैराज में आया था, तो मैंने सोचा था — ये लड़का मुझे डरा देगा, या मुझसे पैसे माँगेगा, या मेरी कुर्सी छीन लेगा।” उन्होंने कहा। “तूने कुछ नहीं किया। तूने सिर्फ़ मेरी बात सुनी। और मुझे बोलने दिया।”
“अमरीक जी।”
“हाँ।”
“जब तुम ड्राइवरों के सामने खड़े हो, तो ये भी बताना कि तुमने पैसे लिए।” मैंने कहा। “पर ये भी बताना कि तुमने उस पैसे से अपने बेटे को बचाया। और ये बताना कि तुमने आज ये काग़ज़ लौटा दिए — बिना किसी शर्त के। लोग तुम्हें माफ़ करें या न करें, ये उनका काम है। तुम्हारा काम बोलना है।”
वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखते रहे। फिर उन्होंने सिर हिलाया और बाहर चले गए।
गाड़ी का दरवाज़ा खुला। इंजन चालू हुआ। फिर आवाज़ दूर होती गई।
नैना अंदर आई। उसने अपना बैग टायर पर रखा।
“तुमने उससे कहा कि वो ड्राइवरों के सामने सब बताए?” उसने पूछा।
“हाँ।”
“तुम्हें पता है कि अगर वो कल ऐसा करता है, तो देवा भाई उसका बेटा अस्पताल से हटवा सकते हैं?”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“पता है,” मैंने कहा।
“तो भी तुमने उसे भेजा?”
“मैंने उसे नहीं भेजा,” मैंने कहा। “वो खुद जा रहा है। मैंने सिर्फ़ उससे कहा कि जब जाए, तो मैं साथ खड़ा रहूँगा।”
नैना ने कुछ नहीं कहा। उसने अपनी कॉपी निकाली और उस पर कुछ लिखने लगी। उसकी कलम काग़ज़ पर तेज़ी से चल रही थी।
मैंने अपनी कॉपी खोली और उसमें से वो आख़िरी पर्ची निकाली। सातवीं पर्ची। जिस पर देवा भाई की अलमारी की मोहर थी।
मैंने उसे एक बार और देखा।
मोहर के अंदर का ताला — चौकोर, छोटी कड़ी, बीच में सीधी लकीर। मुझे याद आया — देवा भाई के कमरे में जब मैं गया था, तो अलमारी के दो ताले थे। एक बाहर, नकली। एक अंदर, असली। और असली वाले ताले की चाबी देवा भाई की जेब में रहती थी।
पर एक बात मैं समझ नहीं पा रहा था।
अगर ये पर्ची देवा भाई के दफ़्तर से निकली है, तो इस पर उसकी अलमारी की मोहर क्यों है?
मतलब ये पर्ची अलमारी के अंदर से निकली है।
मतलब इसे किसी ने अलमारी के अंदर से निकाला है।
मतलब जिसने इसे निकाला, उसके पास उस अलमारी की चाबी थी।
मैंने पर्ची को वापस कॉपी में रखा। फिर मैंने नैना की तरफ़ देखा।
“नैना।”
“हाँ।”
“अमरीक सिंह की गवाही है,” मैंने कहा। “पर ये आख़िरी पर्ची — इसे हमें अपने पास रखना है। अभी किसी को नहीं दिखाना। अदालत तक।”
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno