A Dark Secret – Chapter 197
“मैं उस दिन ऐसे मुँह फेर लेता हूँ,” उन्होंने कहा, “जैसे मुझे कुछ पता ही नहीं। जैसे मैं वहाँ हूँ ही नहीं।”
अब मुझे गुस्सा आने लगा था। मेरे हाथ मुट्ठी में बंद हो रहे थे। मैंने उन्हें देखा — बैठे हुए, टूटे हुए, सफ़ेद शर्ट में, और मेरे अंदर कुछ ऐसा उठ रहा था जो कह रहा था — तू उस आदमी पर चिल्ला, जो ड्राइवरों को अपनी मोहर से बेचता रहा।
पर मैंने कुछ नहीं तोड़ा।
मैंने बस उनके सामने खड़े-खड़े एक सवाल पूछा।
“अमरीक जी।”
“हाँ।”
“हड़ताल के दिन।” मैंने कहा। “उस दिन तुम्हारे पास तेरह गाड़ियाँ थीं, दो सौ ड्राइवर थे। तुम मंच पर खड़े थे और तुमने कहा था — भाइयों, हम किसी से नहीं डरते। उस दिन तुमने उन दो सौ लोगों से झूठ क्यों बोला?”
अमरीक सिंह ने मेरी तरफ़ देखा।
उनके होठ हिले। फिर रुक गए।
“क्योंकि अगर मैं एक दिन भी उसके खिलाफ़ खड़ा होता,” उन्होंने धीरे से कहा, “तो अगले दिन अस्पताल से फ़ोन आ जाता — भाई साहब, मरीज़ का इलाज रुक गया है।”
मैंने कुछ नहीं कहा।
“तू सोचेगा, ये बहाना है।” उन्होंने कहा। “मैं जानता हूँ। बहाना ही है। पर तू उस अस्पताल के बाहर खड़ा होकर एक बार देख लेना — जहाँ चार बच्चे ऐसे बैठे हैं जिनके बाप अपनी गाड़ी बेचकर भी उनका एक हफ़्ते का इलाज नहीं भर सकते। मैं उनमें से एक हूँ, अर्जुन। मैं सिर्फ़ ये नहीं चाहता था कि मेरा बेटा उनमें से एक बन जाए।”
उन्होंने अपने घुटनों पर हाथ रखा और सीधे बैठ गए, जैसे किसी ने उनके अंदर का कोई भारी बोझ नीचे उतार दिया हो।
“मैंने दो साल में कितनी बार झूठ बोला, गिन नहीं सकता,” उन्होंने कहा। “पर आज जो करने आया हूँ, वो पहला सच है।”
तभी मुझे पीछे किसी के पैर की आहट सुनाई दी।
मैं मुड़ा।
नैना दरवाज़े के सहारे खड़ी थी। उसके हाथ में कैमरा था, और उसके ऊपर एक छोटी लाल बत्ती जल रही थी।
वो जल रही थी, यानी रिकॉर्ड हो रहा था।
नैना कभी चुपचाप नहीं आती। पर आज वो चुपचाप आई थी। शायद इसलिए कि उसने सुना था कि अंदर कोई रो रहा है, और वो नहीं चाहती थी कि उसके आने से अमरीक सिंह रुक जाएँ।
पर जैसे ही मैंने उसकी तरफ़ देखा, उसने कैमरा थोड़ा ऊपर उठाया — जैसे कोई शिकारी अपने शिकार पर निशाना साधता है।
“अमरीक जी,” उसने कहा। उसकी आवाज़ में वो तेज़ी थी जो हर रिपोर्टर की आवाज़ में होती है। “जो आपने अभी कहा, वो सब मैंने रिकॉर्ड कर लिया। आप चाहें तो दोबारा कह सकते हैं, कैमरा देखकर। अच्छी खबर बनेगी।”
अमरीक सिंह का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। उन्होंने कैमरे की लाल बत्ती को देखा, और उनका हाथ अपने कोट की तरफ़ गया — जो वो आज पहने ही नहीं थे।
“रुक, नैना।”
मैंने कहा। मेरी आवाज़ उल्टी धीमी निकली। और जब मेरी आवाज़ धीमी होती है, तो नैना जानती है कि ये मज़ाक का वक़्त नहीं।
“क्यों?” उसने कहा। “ये गवाही है। इससे पूरी कहानी बदल जाएगी।”
“हाँ।” मैंने कहा। “पर ये गवाही अभी कैमरे की नहीं है।”
“तो किसकी है?”
“इंसान की।” मैंने कहा। “ये आदमी अपने बेटे के इलाज के लिए दो साल झूठ बोलता रहा। आज पहली बार सच बोल रहा है। अगर तू इसी वक़्त कैमरा घुसा देगी, तो ये सच बोलना बंद कर देगा। और फिर ये सच कभी नहीं बोलेगा — न आज, न अदालत में।”
नैना ने मेरी तरफ़ देखा। उसका चश्मा नाक पर सरक गया था, और उसने उसे ऊपर धकेला — पर इस बार उँगली बहुत धीरे से।
“तो मैं क्या करूँ?” उसने पूछा।
“कैमरा बंद कर।” मैंने कहा। “और ये जो सुन रही है, याद रख। जब वक़्त आएगा, तब रिकॉर्ड करेगी। मेरे सामने। अदालत में। तब ये आदमी खुद बोलेगा।”
नैना ने एक पल मेरी तरफ़ देखा। फिर कैमरे की लाल बत्ती बंद हो गई।
“ठीक है,” उसने कहा। पर फिर वो रुकी और बोली, “पर मैं यहाँ रहूँगी। बाहर नहीं जाऊँगी। और जब ये बोलना शुरू करें, तो मैं सुनूँगी। अगर तुम अकेले सुनोगे और मुझे बाद में बताओगे, तो मैं काग़ज़ पर कुछ नहीं लिख पाऊँगी।”
“रुक जा,” मैंने कहा। “अंदर आ। कैमरा बंद है, तो कोई दिक्कत नहीं।”
वो अंदर आई। दरवाज़े के पास एक पत्थर पर बैठ गई — वो पत्थर जो दीवार से टूटकर गिरा था, और जिसे किसी ने उठाने की ज़हमत नहीं की थी। उसने कैमरा अपनी गोद में रखा और अपने घुटनों को हाथों से पकड़कर बैठ गई, जैसे कोई स्कूल की लड़की परीक्षा में बैठी हो।
अमरीक सिंह ने उसकी तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।
“ये ठीक है?” उन्होंने पूछा।
“ये ठीक है,” मैंने कहा। “ये सिर्फ़ सुन रही है।”
उन्होंने एक लंबी साँस ली। फिर अपने हाथ में पकड़ा लिफ़ाफ़ा सामने रखा — उसी टायर पर, अपने घुटनों के बीच।
“ये लिफ़ाफ़ा,” उन्होंने कहा, “जो कल रात मैं तुम्हारे गैराज में लेकर आया था।”
“हाँ।”
“मैंने इसे दो साल से नहीं खोला।” उन्होंने कहा। “मुनीम ने ये मुझे पहली बार तब दिया था, जब अस्पताल का पहला बड़ा बिल आया था। मैंने पूछा था — इसमें क्या है? उसने कहा — भाई साहब का आशीर्वाद। और हँसा था। मुझे उसकी हँसी आज तक याद है।”
उन्होंने लिफ़ाफ़े की डोर खोली। लिफ़ाफ़ा मोटा था, और जब उन्होंने उसे खोला, तो उसके अंदर से काग़ज़ निकले — सात काग़ज़, एक के ऊपर एक, और सब एक जैसे पीले।
“ये सात पर्चियाँ हैं,” उन्होंने कहा। “हर महीने की एक। मुनीम हर महीने इन्हें मुझे देता था, और कहता था — संभालकर रखना। ये तुम्हारी जान है।”
उन्होंने पहली पर्ची उठाई।
“ये मेरे बेटे के इलाज की पहली पर्ची है।” उन्होंने कहा। “मैंने इसे देखा नहीं था। आज पहली बार देख रहा हूँ।”
उन्होंने उसे मेरी तरफ़ बढ़ाया। मैंने लिया।
पर्ची छोटी थी, कई बार मोड़ी हुई। उस पर कुछ रकम लिखी थी, कुछ तारीख़, और नीचे एक गोल मोहर। मोहर में कोई नाम नहीं था — बस एक गोल घेरा, और उसके अंदर कुछ ऐसा जो मिट गया था।
“ये मोहर किसकी है?” मैंने पूछा।
“देवा भाई के दफ़्तर की।” उन्होंने कहा। “पर इसमें नाम नहीं है। देख — कोई नाम नहीं। सिर्फ़ गोल।”
मैंने बाकी पर्चियाँ लीं। एक-एक करके देखीं।
सब पर वही गोल मोहर। वही बिना नाम का गोल। और हर पर्ची की रकम अलग थी — कभी आठ हज़ार, कभी बारह हज़ार, कभी पंद्रह हज़ार। किसी पर बीस हज़ार। आख़िरी पर्ची पर सबसे बड़ी रकम थी।
“ये सब अस्पताल के बिल हैं?” मैंने पूछा।
“हाँ।” उन्होंने कहा। “पर ये बिल किसी और के नाम पर कटते हैं, मेरे बेटे के नाम पर नहीं। मुनीम अस्पताल में अपना नाम लिखवाता है — अपने रिश्तेदार का।”
“क्यों?”
“क्योंकि अगर मेरे बेटे के नाम पर बिल कटे, तो पता चल जाएगा कि अमरीक सिंह का बेटा अस्पताल में है।” उन्होंने कहा। “और फिर कोई पूछेगा — अमरीक सिंह कमाता कितना है, और इलाज का खर्चा कौन भर रहा है?”
मैंने सातवीं पर्ची उठाई। वो बाकी छह से अलग थी। इसका काग़ज़ मोटा था, और स्याही अभी चमक रही थी — जैसे कल ही लिखी गई हो।
“ये आख़िरी है?” मैंने पूछा।
“हाँ।”
“कब की?”
“चार दिन पहले की।” उन्होंने कहा। “मुनीम ने खुद लाकर दी। कहा — बेटे की हालत ठीक नहीं, इसलिए अगले तीन महीने का बिल पहले भर दिया है।”
मैंने पर्ची को उलटा किया। पीठ पर भी वही गोल मोहर थी। पर इस बार गोल के अंदर कुछ और दिख रहा था — एक छोटा सा निशान, जो बाकी पर्चियों पर नहीं था।
“अमरीक जी,” मैंने कहा। मेरी आवाज़ धीमी हो गई। “ये आख़िरी पर्ची — इसे मुनीम ने दिया था या किसी और ने?”
“मुनीम ने ही दिया।”
“उसने कहा क्या था?”
“उसने कहा था — भाई साहब कह रहे हैं, ये पर्ची उसी को देना जिस पर भरोसा हो।”
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