A Dark Secret196 / 536

A Dark Secret – Chapter 196

7 min read November 6, 2026

फिर मैंने अपनी कलाई पर पापा की घड़ी देखी — आठ मिनट आगे।

मैं मुस्कुराया।

“ठीक है पापा,” मैंने धीरे से कहा। “कल सुबह ग्यारह बजे। तुम्हारी घड़ी के हिसाब से।”

॥

रात भर मैंने आँख नहीं बंद की। गैराज की चारपाई पर लेटा रहा, और ऊपर टीन की छत को देखता रहा। टीन पर कुछ नहीं दिखता — बस धूल की परत, और कहीं-कहीं ज़ंग के भूरे धब्बे। पर मुझे लग रहा था कि अगर मैं ज़ोर से देखूँ, तो टीन के उस पार आसमान में पापा की आवाज़ लिखी मिलेगी।

नहीं मिली।

सुबह पाँच बजे गैराज के बाहर पहली गाड़ी गुज़री। उसकी क्लच प्लेट घिसी हुई थी। मैंने मन में लिखा — क्लच प्लेट, चार दिन में, किसी की गाड़ी है। फिर मैं उठा, मुँह धोया, और टीन की बाल्टी से पानी डालकर अपनी कलाई पर पापा की घड़ी देखी।

आठ मिनट आगे।

मैंने घड़ी को नहीं छुआ।

जुगनू छह बजे आया। हाथ में टिन का गिलास था, जिसमें रुक्मा दीदी ने चाय भेजी थी। उसने गिलास मेरी तरफ़ बढ़ाया और बिना रुके बोलना शुरू कर दिया।

“भैया, गोदाम के पीछे आज सुबह चार गाड़ियाँ आईं। दो तो वही सफ़ेद वाली, और एक पीली, और एक भूरी। भूरी वाली का साइलेंसर फटा है, वही वाली जो कल आई थी। मैंने गिना — चार। और एक आदमी सुबह छह बजे गोदाम के पीछे वाले दरवाज़े पर खड़ा था, मोटी मूँछ वाला, हाथ में लाठी। मुझे देखकर अंदर चला गया।”

“किसने देखा तुझे?”

“किसी ने नहीं। मैं छत पर था। जुगनू कभी नीचे नहीं दिखता, भैया। जुगनू सिर्फ़ ऊपर से देखता है।”

“शाबाश।”

“और एक बात।” उसने चाय का गिलास मेरे हाथ से लेकर खुद एक घूँट लिया, फिर मुँह बनाकर बोला, “रुक्मा दीदी ने कहा, आज इसकी चाय दुगनी चीनी की। कह रही थीं, आज इसे मीठी चीज़ की ज़रूरत है।”

मैं हँस पड़ा। पहली बार उस सुबह।

“और अमरीक सिंह?” मैंने पूछा।

“वो आठ बजे यूनियन के दरवाज़े पर आया था। दस मिनट रुका, फिर अंदर गया। अब तक नहीं निकला। मैंने उसकी गाड़ी देखी — सफ़ेद, बंद शीशे, इंजन बंद। ड्राइवर बाहर खड़ा है।”

“ठीक है।” मैंने गिलास उसके हाथ से वापस लिया और बाकी चाय एक साँस में पी गई। “तू वापस जा। छत पर बैठ। अगर कोई आए, तो कुछ नहीं बोलना। अगर पूछे कि अर्जुन कहाँ है, तो कहना — बाहर गया है, किसी गाड़ी के नीचे है।”

“और तुम कहाँ हो?”

“मैं गोदाम के पीछे होऊँगा। ग्यारह बजे।”

जुगनू कुछ बोलने जा रहा था, फिर रुक गया। उसने गिलास मुझसे लिया, उल्टा किया, दीवार पर पटका — टिन की खनक हुई। फिर वो मुड़ा और दौड़कर चला गया।

मैंने अपनी सिली कॉपी उठाई। उसमें वो काग़ज़ रखा था — सिर्फ़ सत्ताईस छपा, नीला गोल निशान। मैंने उसे खोलकर एक बार देखा। फिर कॉपी कोट की अंदरूनी जेब में रखी, और गैराज का फाटक बंद करके चल पड़ा।

गोदाम के पीछे जाने का रास्ता मुझे पता था। टोल से पहले एक मोड़ था, जहाँ से एक पतली सड़क गोदाम की पीछे की तरफ़ जाती थी। वो सड़क इतनी पतली थी कि दो गाड़ियाँ साथ नहीं निकल सकतीं। दोनों तरफ़ ईंट की पुरानी दीवारें, और दीवारों के ऊपर टीन की चादरें टेढ़ी पड़ी थीं।

मैं ग्यारह बजे से पहले पहुँच गया। दस बजकर पैंतालीस मिनट पर।

गोदाम की पीछे वाली दीवार के सहारे एक पुराना टायर पड़ा था। उसके ऊपर एक लकड़ी का तख़्ता रखा था, जिस पर बैठकर कोई इंतज़ार कर सकता था। मैंने तख़्ते को देखा, टायर को देखा, और फिर उसी तरह खड़ा रह गया — न बैठा, न हटा।

ग्यारह बजे मुझे गाड़ी की आवाज़ सुनाई दी।

आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। इंजन में जो घरघराहट होती है — बूढ़ी पिस्टन रिंग की — वो नहीं थी। यह गाड़ी ठीक थी। बस उसके ब्रेक में थोड़ी सी घिसाई थी, जो रुकते वक़्त आई।

गाड़ी मोड़ पर आकर रुकी। दरवाज़ा खुला। अमरीक सिंह उतरे।

आज वो अपना काला कोट नहीं पहने थे। सिर्फ़ सफ़ेद शर्ट, और शर्ट की दोनों बाँहें कोहनी तक मुड़ी थीं। उनके हाथ में वो मोटा लिफ़ाफ़ा था। उन्होंने मुझे देखा, और बिना कुछ बोले उस टायर पर रखे तख़्ते की तरफ़ बढ़े।

बैठे।

और फिर वो हुआ जो मैंने कभी नहीं सोचा था।

अमरीक सिंह — ड्राइवर यूनियन का अध्यक्ष, जिसकी आवाज़ ढाबे में भी भाषण जैसी गूँजती थी — बैठते ही रो पड़े।

न धीरे-धीरे। न चुपचाप।

एकदम। जैसे किसी ने अंदर से कोई ढक्कन खोल दिया हो।

उन्होंने अपना चेहरा दोनों हाथों में छिपा लिया। उनके कंधे हिल रहे थे। उनके हाथों की उँगलियों के बीच से आवाज़ आ रही थी, जो किसी शब्द जैसी नहीं थी — बस एक टूटी हुई आवाज़। मैं खड़ा रह गया।

मुझे समझ नहीं आया कि क्या करूँ। मेरे पास कोई रूमाल नहीं था — कोई साफ़ रूमाल तो मेरे पास कभी नहीं रहता। जो रुमाल था, वो तेल में डूबा था, और मैं किसी को तेल में डूबा रूमाल नहीं पकड़ाता।

मैंने कुछ नहीं कहा। बस खड़ा रहा।

कुछ देर बाद उन्होंने हाथ नीचे किए। उनकी आँखें लाल थीं, और चेहरे पर वो पसीने की लकीरें थीं, जो शायद आँसुओं से और गहरी हो गई थीं।

“तू कुछ मत पूछ,” उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ फटी हुई थी, जैसे कोई बहुत पुरानी पंप की चमड़ी हो। “आज मैं खुद बोलूँगा। जो मैंने किया, वो बोलूँगा। तू सिर्फ़ सुनना।”

“सुन रहा हूँ,” मैंने कहा।

“मेरे बेटे को तू नहीं जानता,” उन्होंने कहा। “अट्ठारह साल का है। पिछले दो साल से अस्पताल में है। उसकी किडनी काम नहीं करती। हफ़्ते में तीन बार खून साफ़ कराना पड़ता है। मैं उसे दूर से देखता हूँ, वो मुझे देखकर मुस्कुराता है, और मैं उसके पास जाकर बैठ नहीं सकता — क्योंकि जब वो मुस्कुराता है, तो मेरा गला ऐसा हो जाता है कि मैं कुछ बोल नहीं सकता।”

मैंने कुछ नहीं कहा।

“शुरू में मैंने अपनी गाड़ी बेची,” उन्होंने कहा। “फिर यूनियन के काग़ज़ किसी को गिरवी रखे। फिर एक लिफ़ाफ़ा आया।”

“किसका?”

“मुनीम का। देवा भाई का मुनीम। पतला, चटके चश्मे वाला। वो अस्पताल आकर खड़ा हुआ, बोला — भाई साहब कह रहे हैं, बच्चे का इलाज चलने दो। और अगले हफ़्ते बिल अपने आप भर गया।”

मैंने उनके हाथ में पकड़े लिफ़ाफ़े को देखा।

“हर महीने?” मैंने पूछा।

“हर महीने।” उन्होंने कहा, और मुँह फेर लिया। “मुनीम हर महीने के सात तारीख़ को अस्पताल जाता है, बिल भरता है, रसीद अपने पास रखता है। मुझे कभी रसीद नहीं दी। कहता है, तुम्हें रसीद की ज़रूरत नहीं। तुम्हें सिर्फ़ मेरी एक बात माननी है।”

“कौन सी बात?”

“यूनियन की हिसाब कॉपी।” उन्होंने अपना सिर उठाया और पहली बार सीधे मेरी आँखों में देखा। “हर महीने मुझे यूनियन की कॉपी पर मोहर लगानी पड़ती है। झूठी मोहर।”

“कैसी झूठी मोहर?”

“कॉपी में हिसाब लिखा होता है — कितने ड्राइवर, कितना चंदा, कितना खर्चा। मुनीम मुझे एक पर्ची देता है, जिस पर वो हिसाब लिखा होता है जो उन्हें चाहिए। मैं उस पर्ची को कॉपी पर रखकर मोहर लगाता हूँ। मोहर लगी कॉपी अगले दिन देवा भाई के दफ़्तर चली जाती है।”

“क्यों?”

“क्योंकि जब कभी मुनीम किसी ड्राइवर का हिसाब साफ़ करना चाहता है, तो वो उस ड्राइवर से पूछता है — तेरा हिसाब तो यूनियन की कॉपी में साफ़ है न? और ड्राइवर क्या करेगा? वो यूनियन के दफ़्तर आएगा, कॉपी देखेगा, और उसके हिसाब में वो रकम होगी जो कभी उसने नहीं दी, या वो खर्चा जो कभी हुआ ही नहीं। मैं खुद उस कॉपी पर मोहर लगाता हूँ। मेरी ही मोहर। और ड्राइवर मेरी तरफ़ देखता है।”

उनकी आवाज़ फिर रुक गई। इस बार उन्होंने अपने हाथों से अपनी जाँघ पकड़ी। उँगलियाँ सफ़ेद हो गई थीं।

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