A Dark Secret – Chapter 195
काले कोट के नीचे वही सफ़ेद शर्ट। पर आज कोट की जेब से लाल रुमाल नहीं लटक रहा था। शर्ट गंदी थी। बाल बिखरे। आँखें लाल थीं — वो लाल जो सिर्फ़ रोने से नहीं आती। वो लाल जो आँखों के अंदर किसी चीज़ के टूटने से आती है।
उनके हाथ में वही मोटा लिफ़ाफ़ा था।
“अंदर चलिए,” मैंने कहा।
वो अंदर आए। कुर्सी की तरफ़ देखा, फिर भी नहीं बैठे। खड़े रहे। फाटक बंद था, फिर भी वो आसपास देख रहे थे — दीवारें, औज़ार, चारपाई। जैसे पहली बार आए हों।
“यहाँ?” उन्होंने पूछा।
“यहाँ मैं रहता हूँ,” मैंने कहा।
उन्होंने गैराज की दीवार पर लगे उस पुराने कैलेंडर की तरफ़ देखा — जो दो साल से वही पन्ना दिखा रहा है, ऊपर से नाम काट दिया गया, सिर्फ़ निशान बचा। फिर दीवार पर बड़ी रिंच की तरफ़ देखा, जो तार से बँधी थी।
“तुम्हारे पापा की गैराज है?”
“नहीं। पापा ने यहाँ काम किया था। मैं भी करता हूँ।”
वो कुछ क्षण चुप रहे। फिर कुर्सी की तरफ़ बढ़े और बैठ गए। बैठते वक़्त कुर्सी की एक टाँग चटकी। वो चौंके।
“पुरानी है,” मैंने कहा। “अब मज़बूत करनी पड़ेगी।”
“ऐसे ही हूँ मैं भी,” उन्होंने कहा। “पुराना। अब मज़बूत करने का वक़्त आ गया है।”
मैंने सामने वाली बेंच खींची और बैठ गया।
अमरीक सिंह ने मोटा लिफ़ाफ़ा मेज़ पर रखा।
फिर मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में आँसू नहीं थे — बस वो लाली थी जो आँसुओं के बाद बचती है।
“सुन,” उन्होंने कहा। “पहले मेरी एक बात सुन लो। फिर तू मुझे जो कहना है, कह देना।”
मैंने सिर हिलाया।
उन्होंने लंबी साँस ली। फिर बोले, “मैं यूनियन का अध्यक्ष हूँ। ग्यारह साल से हूँ। मेरे नाम से पूरे शहर के ड्राइवर हड़ताल पर जाते हैं, और मेरे नाम से ही हड़ताल खत्म होती है। मुझे सब इज़्ज़त देते हैं। तुझे पता है, मेरे घर के दरवाज़े पर हर रविवार कितनी गाड़ियाँ खड़ी होती हैं? कोई मुझसे सलाह लेने आता है, कोई फ़ीस के लिए, कोई गाड़ी के काग़ज़ के लिए।”
“पता है,” मैंने कहा।
“तो ये भी जान ले। उसी घर के पीछे वाले कमरे में मेरा बेटा आठ साल से बिस्तर पर है। डॉक्टर कहते हैं अब उठ जाएगा। डॉक्टर यही कहते हैं, हर बार। हर महीने का बिल आता है। ढाई लाख से ज़्यादा का।”
मैं चुप रहा।
“मैंने यूनियन के पैसे से भरने की कोशिश की,” उन्होंने कहा। “दो बार। दोनों बार हिसाब में पकड़ा गया। फिर कोई आया। बोला — तुम हर महीने बिल भरते रहो, हम देख लेंगे। बदले में कुछ नहीं, बस यूनियन में जो भी हो, हमें पहले पता चल जाए।”
“क्या पता चल जाए?”
“हर चीज़। कौन हड़ताल की बात कर रहा है, कौन नाराज़ है, किस ड्राइवर ने काग़ज़ ज़्यादा माँगे, कौन किसके साथ बैठा। हर हफ़्ते मुनीम आता है, दो मिनट बैठता है, काग़ज़ गिनकर ले जाता है, चला जाता है।”
“और पैसा?”
“पैसा सीधे अस्पताल में जाता है। मेरे हाथ में नहीं आता। मैं उसे छू भी नहीं सकता। कोई गवाही नहीं, कोई रसीद नहीं। बस — मेरा बेटा ज़िंदा है।”
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
“फिर ये लिफ़ाफ़ा?” मैंने पूछा।
“ये कल का है,” उन्होंने कहा। “कल वो मुनीम आया और बोला — अब सिर्फ़ पैसे से काम नहीं चलेगा। कुछ और चाहिए। उन्हें वो चीज़ चाहिए जो तेरे पास है। काग़ज़। जो तेरे पापा ने छिपाए थे। कहा — मिलते ही तेरे रहने-खाने का भी हिसाब बंद हो जाएगा।”
“और तुमने लिफ़ाफ़ा रख लिया।”
“मैंने रख लिया।” उन्होंने अपनी तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़। “अब तू जो कहना है, कह दे। मुझे भाषण मत दे। मुझे माफ़ी मत दे। बस — जो कहना है, कह दे।”
मैंने लिफ़ाफ़े को देखा।
फिर उनकी तरफ़ देखा।
मुझे गुस्सा आना चाहिए था। आ रहा था। पर वो गुस्सा किसी और चीज़ पर था। इस आदमी पर भी था, पर किसी ऊपर वाले पर भी, जो इस आदमी को इस कुर्सी पर बैठकर सफ़ेद झूठ बोलने को मजबूर कर रहा था।
मैंने लिफ़ाफ़ा उठाया।
खोला।
अंदर नोटों की गड्डी थी। मोटी। पचास हज़ार, मुझे अंदाज़ा हुआ, पर गिना नहीं। फिर वो काग़ज़ था जो मुनीम ने लिफ़ाफ़े के साथ दिया था — सिर्फ़ सत्ताईस अंक, नीचे नीला गोल निशान।
मैंने वो काग़ज़ जेब में रखा। गड्डी वापस लिफ़ाफ़े में डाली और उनकी तरफ़ सरका दिया।
“ये लौटा रहा हूँ,” मैंने कहा।
अमरीक सिंह ने मेरी तरफ़ देखा।
“क्यों?”
“क्योंकि अगर मैं इसे रख लूँगा, तो तुम्हारे पास एक ही रास्ता बचेगा — कल फिर उनके पास जाना। और तुम अभी यहाँ आए हो। मतलब तुम अपने पैरों से आए हो। मतलब तुमने एक रास्ता चुना है। ये लिफ़ाफ़ा वापस ले जाओ और उनके पास उसी तरह लौटा दो जैसे मैंने तुम्हें लौटाया।”
“और अगर मैं लौटाने से मना कर दूँ?”
“तो मैं यही लिफ़ाफ़ा कल सुबह नैना जोशी की कैमरे के सामने खोल दूँगा। तुम तय करो।”
अमरीक सिंह ने लंबी साँस ली।
फिर बोले — “ये मेरे पास नहीं रहेगा। कल सुबह नौ बजे मैं इस लिफ़ाफ़े को वहीं ले जाकर उनके सामने रख दूँगा।”
“कहाँ?”
“जहाँ उनका आदमी मुझे बुलाता है। गोदाम के पीछे।”
“क्यों?”
“क्योंकि मुझे अब यूनियन का अध्यक्ष नहीं रहना।” उन्होंने कहा। “मैं नाम वापस कर दूँगा। और जो जानता हूँ, सब बताऊँगा।”
“अमरीक जी।”
“हाँ।”
“तुम्हारे बेटे का बिल?”
“मैं नहीं जानता,” उन्होंने कहा। और पहली बार उनकी आवाज़ में वो गूँज नहीं थी जो सभा में आती है। बस एक थकी हुई, सीधी आवाज़ थी। “पर मैं ये भी जानता हूँ कि अगर मैं आज नहीं खड़ा हुआ, तो कल मेरे बेटे के बच्चे उसी कुर्सी पर बैठेंगे और वही झूठ बोलेंगे। बस उनके पास मेरी मजबूरी का बहाना नहीं होगा।”
वो उठे। कुर्सी की टाँग फिर चटकी, इस बार थोड़ी तेज़। उन्होंने देखा पर कुछ नहीं बोले।
लिफ़ाफ़ा उठाया। कोट में डाला।
फाटक तक आए। फिर रुके।
“अर्जुन,” उन्होंने कहा।
“हाँ।”
“एक बात कहूँ?”
“कहो।”
“तू जब बड़ा हो जाए, जब तेरे पास भी यूनियन हो, गाड़ियाँ हों, लोग हों — तो एक बात याद रखना। मुझे भूल जाना। मुझे बिल्कुल भूल जाना। पर ये मत भूलना कि मैं तुझे आज रात यहाँ मिला था। बस।”
मैंने कुछ नहीं कहा।
वो चले गए।
मैं गैराज में अकेला रह गया।
मेज़ पर वो काग़ज़ पड़ा था — सिर्फ़ सत्ताईस, नीला गोल निशान। मैंने उसे अपनी सिली कॉपी के पन्नों के बीच रखा।
फिर मैंने चारपाई पर लेटकर आसमान की तरफ़ देखा। गैराज की टीन की छत। ऊपर कुछ नहीं दिखता। पर मुझे लगा कि रात के इस वक़्त इस शहर में कम से कम दो आदमी ऐसे हैं जो अपनी आँखें बंद करके कुछ अलग देख रहे हैं — एक मैं, जो अपने पापा की आवाज़ सुन रहा हूँ, और एक अमरीक सिंह, जो किसी चीज़ से पहली बार लड़ने जा रहा है, और उसके पास कोई हथियार नहीं है।
रात के ग्यारह बजे फोन बजा।
मैंने कोठरी से निकाला — रुक्मा दीदी ने फ़ोन मेरे पास रख लिया था, कहा था आज रात तेरे पास ही ठीक है।
स्क्रीन पर नाम नहीं था। बस एक नंबर।
मैंने उठाया।
दूसरी तरफ़ से आवाज़ आई — वो ठंडी आवाज़ जिसने नैना को कई बार चेताया था। जिसने कहा था, “पापा की तरह जल्दी मत करो।”
“अर्जुन यादव,” उसने कहा।
मैंने कुछ नहीं कहा।
“कल सुबह ग्यारह बजे गोदाम के पीछे। अमरीक सिंह आएगा। उसे अकेला आने देना। अगर तू आया, तो मुझे बुरा लगेगा। और मुझे बुरा लगना, अच्छी खबर नहीं होती।”
लाइन कट गई।
मैंने फ़ोन देखा। स्क्रीन बंद हो गई थी।
मैंने वो फ़ोन जेब में रखा और गैराज के बाहर आकर खड़ा हो गया।
रात बहुत साफ़ थी। दूर टोल की लाइट जल रही थी। कहीं सड़क पर एक ट्रक गुज़रा — उसके इंजन में खराश थी, धीमी घरघराती खराश। मैंने मन में नोट किया — कल इसी आवाज़ को पहचानना है।
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