A Dark Secret – Chapter 201
“पहली जगह — तेरे पास, दीदी। यहाँ। तेरे आटे के ड्रम के अंदर, जहाँ फ़ोन है। बीमा वाली सातों पर्चियाँ यहीं रहेंगी। कोई यहाँ ढूँढने नहीं आएगा, क्योंकि यहाँ आने वाले रोटी खाने आते हैं, काग़ज़ नहीं ढूँढने।”
रुक्मा ने सिर हिलाया।
“और अगर कोई आया तो?”
“तो तू कुछ नहीं जानती,” मैंने कहा। “तू रोटी बनाती है। बस।”
“दूसरी जगह?”
“नैना,” मैंने कहा। “उसके पास तेरह काग़ज़ हैं। अब उसके पास अस्पताल की सात पर्चियाँ भी होंगी। वो इन्हें अपने दफ़्तर के लॉकर में नहीं रखेगी — वो इन्हें अपने कैमरे के केस में रखेगी, जो हमेशा उसके कंधे पर रहता है। जो चीज़ हमेशा आदमी के साथ चलती है, वो कहीं छिपानी नहीं पड़ती।”
जुगनू ने कहा — “और तीसरी?”
मैंने अपने पापा का काला रजिस्टर उठाया।
“ये,” मैंने कहा। “ये मेरे पास रहेगा। हमेशा। मेरे थैले में, मेरी बाँह में, मेरे सिर के नीचे। जब तक मैं ज़िंदा हूँ, ये मुझसे अलग नहीं होगा।”
चाचा ने कुछ कहना चाहा। होंठ हिले। फिर बंद हो गए।
“बोलो चाचा।”
वो उठकर खड़े हो गए, जैसे किसी अदालत में खड़े हों — जबकि वहाँ सिर्फ़ एक ढाबा था, एक चूल्हा, और चार लोग।
“कल सुबह,” उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ बैठी हुई थी, “मैं खुद चलकर बयान दूँगा।”
रुक्मा ने अपनी कॉपी पकड़ ली।
“तू जानता है इसका मतलब क्या है?” उसने कहा।
“जानता हूँ।”
“तेरे ऊपर केस बनेगा। तेरी दुकान जाएगी। तेरी बेटी के स्कूल में पता चलेगा।”
“जानता हूँ,” चाचा ने कहा। और उनकी आवाज़ अब भी वैसी ही थी, पर कुछ टूटा हुआ भी था। “पर मैं आज रात सो नहीं पाऊँगा अगर ये नहीं किया। और मैं सोना चाहता हूँ, रुक्मा। दो दिन से मैं सो नहीं पाया।”
मैं उठा। मैं उनके पास गया। और मैंने उनके हाथ पर हाथ रखा।
वो सख़्त था — मज़दूर का हाथ। गर्म। काँपता हुआ। मैंने दबाया। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो डर था जो मैंने पापा की आँखों में आख़िरी बार देखा था — उस रात, जब वो घर से निकल रहे थे और माँ कह रही थी, "जल्दी आना।"
“चाचा,” मैंने कहा। “कल तुम अकेले नहीं जाओगे।”
उन्होंने हाथ नहीं छुड़ाया। बस सिर हिलाया।
रुक्मा ने तब कड़ाही के पीछे से वो लिफ़ाफ़ा निकाला।
मैंने उसे पहले नहीं देखा था। पीला, फूला हुआ, कोनों से मुड़ा, और काग़ज़ इतना पुराना कि लिफ़ाफ़े ने ही उसकी शक्ल बदल दी थी। वो उसे मेज़ पर नहीं रखा। हाथ में ही रखा।
“ये ग्यारह साल पुराना है,” उसने कहा। “उस दिन के बाद मैंने इसे नहीं छुआ।”
“उस दिन?”
“वो दिन जब लोग आए और बोले कि दुकान बंद कर दे। दो आदमी थे। एक सफ़ेद कुर्ता पहने था। उसने लिफ़ाफ़ा दिया और कहा — तेरे आदमी ने जो किया, उसका हिसाब इसमें है।”
जुगनू ने घुटने और कसे।
“फिर?”
“फिर मेरा आदमी नहीं लौटा,” रुक्मा ने कहा। “और मैंने लिफ़ाफ़ा नहीं खोला। क्योंकि जो लिफ़ाफ़ा एक मौत के बाद आता है, वो सिर्फ़ हिसाब नहीं होता। वो न्योता होता है।”
उसने लिफ़ाफ़ा धीरे से वापस कड़ाही की तरफ़ बढ़ाया, फिर रोक दिया।
“नहीं,” उसने कहा। “कल। कल यूनियन की मीटिंग के बाद। खुला हुआ। सबके सामने।”
“दीदी —”
“अर्जुन,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ पहली बार धीमी हुई। “मैं ग्यारह साल से इसके साथ सो रही हूँ। मुझे एक दिन और दे।”
मैंने सिर हिलाया।
रात नौ बजे मैं बेंच पर बैठा था। रुक्मा अंदर बर्तन धो रही थी। चाचा बरामदे में बैठे थे, आँखें बंद, हाथ में कुल्हड़ जो ठंडा हो चुका था। जुगनू चौकी पर लेटा था और धीरे-धीरे बोल रहा था — जैसे गिनती कर रहा हो: “दो सफ़ेद, एक पीली, एक भूरी बोलेरो…”
“सो जा जुगनू।”
“सोता हूँ भैया। बस — बस एक बात।”
“क्या?”
“आज दोपहर एक गाड़ी आई थी। बड़ी। वो ढाबे के सामने से नहीं गई, पीछे की तरफ़ से गई।”
मैं उठ बैठा।
“कैसी गाड़ी?”
“बड़ी। इंजन की आवाज़ नरम थी — जैसे किसी ने मुँह पर कपड़ा रखा हो।”
मैंने ग्यारह बजे तक इंतज़ार किया। कुछ नहीं हुआ।जुगनू ढोल के पीछे सो गया। चाचा बेंच पर लेट गए।
और फिर ग्यारह बजकर दस मिनट पर मेरा फ़ोन बजा।
नैना का नाम।
“बोल।”
उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे वो दौड़कर आई हो और अब साँस रोक रही हो।
“अर्जुन, मैं ठाकुर ट्रांसपोर्ट के पीछे हूँ। पीछे वाली गली में, टायरों के ढेर के पास।”
“तू वहाँ क्या कर रही है? अकेली?”
“सुन। सुन मेरी बात,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ पतली हो गई। “दफ़्तार खाली किया जा रहा है। अभी।”
मैं खड़ा हो गया।
“क्या मतलब?”
“मतलब — तीन गाड़ियाँ हैं। दो भारी, एक पीली। आदमी अंदर जा रहे हैं और सामान बाहर ला रहे हैं। मेज़, कुर्सियाँ, रैक, सब। दरवाज़े खुले हैं, बत्ती जल रही है, कोई छिप नहीं रहा। ऐसे खाली करते हैं जैसे कोई घर छोड़ रहा हो।”
“और कितना सामान है?”
“बहुत। पर अर्जुन —”
वो रुकी। मैंने उसकी साँस सुनी। एक। दो।
“बोल नैना।”
“वे लोग काग़ज़ नहीं उठा रहे,” उसने कहा। “काग़ज़ कोई नहीं छू रहा। रैक में सब काग़ज़ वैसे ही पड़े हैं।”
“तो क्या उठा रहे हैं?”
उसने साँस रोककर कहा — और उसका शब्द मेरे कान में ऐसे गिरा जैसे कोई लोहे का डिब्बा सीढ़ियों से लुढ़कता हो।
“अलमारी,” उसने कहा। “वो हरी लोहे की अलमारी। बंद है। ताला लगा है। और उसे चार आदमी मिलकर ट्रक पर चढ़ा रहे हैं। अर्जुन — उन्होंने काग़ज़ छोड़ दिए और अलमारी उठा ली।”
मेरे हाथ से फ़ोन खिसका नहीं। बस कस गया।
“नैना,” मैंने कहा। “दूर रहना। किसी को नहीं दिखना। और कैमरा — कैमरा चालू कर।”
“कर दिया।”
“फिर बोल। क्या दिख रहा है?”
एक पल की चुप्पी।
“अलमारी ट्रक पर रख दी,” उसने कहा। “अब वो रस्सी बाँध रहे हैं। और — रुक — एक आदमी ट्रक के पास खड़ा है, सफ़ेद कुर्ता, हाथ में चाबी। वो अलमारी का ताला देख रहा है। जैसे पहले कभी देखा न हो।”
मेरी छाती में कुछ हुआ।
“वो चाबी जेब से नहीं निकली,” मैंने कहा।
“क्या?”
“देवा भाई की जेब में जो चाबी है, वो अलमारी के अंदर वाले ताले की है,” मैंने कहा। “बाहर वाले का ताला तो दिखावे का है। अगर वो आदमी उस बाहर वाले ताले को देख रहा है, तो मतलब उसे भी नहीं पता कि असली ताला अंदर है।”
“तो इसका मतलब क्या है?”
मैंने आँख बंद की। ढाबे के पीछे ट्रक का हॉर्न बजा, लंबा और थका हुआ। जुगनू करवट बदल रहा था। चाचा की साँस आ रही थी — भारी, टूटी हुई।
“मतलब ये है,” मैंने धीरे से कहा, “कि देवा भाई ने अलमारी उठाई है, ताकि वो चीज़ किसी को न मिले। पर उन्होंने वो चीज़ उठाई है जो सिर्फ़ उनकी जेब की चाबी से खुलती है।”
“तो?”
“तो आज पहली बार,” मैंने कहा, “वो अलमारी मेरी पहुँच में है।”
“अर्जुन —”
“नैना, सुन। ट्रक के पीछे-पीछे नहीं जाना। बस नंबर देखना और दिशा। और मुझे बताना — क्या वो अलमारी उसी रास्ते जा रही है जो टोल की तरफ़ जाता है या उस तरफ़ जो गोदाम की पीठ से होकर निकलता है।”
“देख रही हूँ।”
“और नैना —”
“हाँ।”
“अगर ट्रक तेरे पास से गुज़रे, तो आँख बंद करके सिर्फ़ सुनना। बताना कि उसके पीछे का पहिया अंदर से घिसा है या बाहर से।”
“तू पागल है।”
“हाँ,” मैंने कहा। “पर सुनना।”
मैंने फ़ोन जेब में रखा और थैला उठाया।
रुक्मा बरामदे में खड़ी थी। उसने मेरी तरफ़ देखा — बस एक बार। फिर उसने कुछ नहीं पूछा। उसने सिर्फ़ अंदर जाकर मेरी तरफ़ एक कुल्हड़ बढ़ाया।
“पी ले,” उसने कहा। “खाली पेट मत जा।”
मैंने पी लिया। चाय जल रही थी।
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