A Dark Secret20 / 536

A Dark Secret – Chapter 20

7 min read November 6, 2026

मेरा गला कुछ अजीब सा हो गया। मैंने सिर्फ़ "समझा" कहा, क्योंकि उस वक़्त मेरी आवाज़ छोटी हो गई थी और मुझे पता था वो छोटी आवाज़ पकड़ लेती हैं।

"और अर्जुन।"

"हाँ?"

"उन लोगों से मत उलझना।"

"कौन से लोग, अम्मा?"

वो चुप रहीं।

"अम्मा?"

"बस। तेरे पापा भी कहते थे कि कुछ नहीं हुआ, कुछ नहीं हुआ। और फिर…"

वो रुक गईं। मैंने कुछ नहीं पूछा। कभी-कभी सवाल पूछना सबसे बड़ी बेरुखी होती है।

"फिर क्या, अम्मा?"

"फिर कुछ नहीं। फ़ोन रखती हूँ। पैसा मत खर्च करना। और सो जल्दी।"

फ़ोन कट गया।

मैं फ़ोन हाथ में लिए बैठा रहा। मेरी घड़ी देखी। पाँच मिनट आगे। हमेशा पाँच मिनट आगे। पापा की घड़ी, जो उन्होंने कभी ठीक नहीं करवाई थी। मैंने एक बार पूछा था, पापा, ये आगे क्यों चलती है? वो हँसे थे और बोले थे — "ताकि मैं हमेशा पाँच मिनट पहले पहुँच जाऊँ, और लोग कहें कि रघुवीर सिंह वक़्त का पक्का आदमी है।"

वो वक़्त के पक्के थे। बस वक़्त उनका पक्का नहीं रहा।

मैंने पाँच सौ वापस रुमाल में बाँधे, गाँठ लगाई, और जेब में उतार दिए।

तभी सीढ़ियों पर पैरों की आवाज़ आई। भारी पैर। चाचा।

"अर्जुन!" उनकी आवाज़ सीढ़ी से ही आई, गैराज जितनी बड़ी। "उठा है कि सो रहा है?"

"उठा हूँ, चाचा।"

वो ऊपर आए। एक हाथ में चाय के दो कटोरे, दूसरे हाथ में रुमाल जिसमें कुछ बँधा था। उन्होंने चाय मेरी तरफ़ बढ़ाई और चारपाई के किनारे बैठ गए। चारपाई चरमराई।

"क्या कर रहा था?"

"गिन रहा था।"

उन्होंने चारपाई पर पड़े मेरे चार सौ की तरफ़ देखा। एक पल को उनके चेहरे पर कुछ आया — न जाने क्या — और फिर चला गया।

"चार सौ," उन्होंने कहा। जैसे कोई वज़न नाप रहा हो।

"हाँ।"

"क्या करेगा इतने में?"

"ट्रक लूँगा।"

चाचा का चाय का कटोरा होंठों तक जाते-जाते रुक गया।

फिर वो हँसे।

और ये हँसी गैराज वाली नहीं थी। ये हँसी कमरे की छत से टकराकर लौटी, फिर अलमारी से टकराई, फिर मेरे कानों में आकर बैठ गई। इतनी बड़ी हँसी कि मुझे अपनी चाय फूँकने की ज़रूरत भूल गई।

"ट्रक," उन्होंने कहा, आँखों में पानी आ गया था। "चार सौ में ट्रक। अर्जुन, तू तो वाकई मेरे भईया का बेटा निकला। वो भी ऐसे ही सपने देखते थे। रात को सोते वक़्त कहते थे, महेंद्र, एक दिन मेरे पास अपना ट्रक होगा, अपना नहीं — अपने नाम का।"

मैंने चाय की चुस्की ली। "तो मैं भी वही करूँगा, चाचा।"

चाचा की हँसी धीरे-धीरे उतरी। उन्होंने चाय नीचे रखी।

"सुन अर्जुन। मैं तुझे बुरा नहीं चाहता। मैं तेरे पापा का भाई हूँ।"

"जानता हूँ, चाचा।"

"तो सुन। गैराज में काम कर। महीने का पूरा हिसाब मिलेगा। दो पैसे बचा। छह महीने, साल भर — और फिर देख, तेरे पास चार सौ नहीं, चार हज़ार होंगे। फिर तू किसी की गाड़ी पर हाथ रख सकता है। अभी तू किसी की गाड़ी पर हाथ नहीं रख सकता। अभी तो तू खुद किसी की गाड़ी पर बैठा हुआ मेहमान है।"

"और घर?"

"क्या?"

"आप कहते हैं न, घर ले जा, घर ले जा। चाचा, मैं घर इसीलिए नहीं गया कि मेरे पास कुछ नहीं है। अगर मैं अभी लौटा, तो अम्मा मेरी तरफ़ ऐसे देखेंगी जैसे कोई चीज़ वापस कर दी गई हो।"

चाचा चुप हो गए।

"मुझे अपना ट्रक चाहिए," मैंने कहा। "अपना। समझ रहे हैं न? ऐसा जिसके बोनट पर मैं अपना नाम लिख सकूँ। और बुरा मत मानना, चाचा, पर मैं उस पर अपना नाम ही लिखूँगा।"

चाचा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आवाज़ अब धीमी थी।

"तेरे पापा का नाम लिखेगा?"

मैंने उनकी तरफ़ देखा। वो मुस्कुरा रहे थे, पर आँखें मुस्कुरा नहीं रही थीं। और उनका दायाँ हाथ, जो चारपाई के किनारे पर टिका था, धीरे-धीरे ऊपर उठकर गर्दन के पीछे जाने ही वाला था।

फिर वो रुक गया। नीचे आ गया।

"लिखूँगा," मैंने कहा।

चाचा खड़े हो गए। "अच्छा। तो सुन। ट्रांसपोर्ट नगरी से आगे, कबाड़ बाज़ार है। गाड़ी महल कहते हैं उसे। हम जैसे लोग वहाँ जाते हैं तो जेब में पैसा लेकर नहीं जाते, सिर्फ़ आँख लेकर जाते हैं। वहाँ कबाड़ के भाव पर पहाड़ जैसे ट्रक पड़े हैं। कोई बिना इंजन, कोई बिना पहिए, कोई बिना नाम। जा। अपनी क़िस्मत आज़मा।"

"सच, चाचा?"

"सच।" वो हँसे, इस बार छोटी हँसी। "पर एक बात याद रखना। वहाँ कबीर बैठता है। पंचर और पार्ट्स की दुकान है उसकी। दुबला-पतला नहीं, समझदार लड़का है। जेब में कैलकुलेटर रखता है और दो पेन। और जब भी बात करे, 'देख भाई, आँकड़े झूठ नहीं बोलते' कहकर शुरू करता है।"

"तो?"

"तो उसके पास पैसा लेकर जाना, अर्जुन। बिना पैसे के वो तेरी एक नहीं सुनेगा। वो आदमी भावुक नहीं है। वो हिसाब वाला है। और हिसाब वाले आदमी से मैं डरता हूँ।"

चाचा सीढ़ियों की तरफ़ बढ़े। फिर रुके।

"और अर्जुन।"

"हाँ?"

"दस बजे वाली बात।"

मेरा हाथ चाय के कटोरे पर रुक गया।

"उस कमरे में मत जा," चाचा ने कहा। उनकी आवाज़ में वो चीज़ नहीं थी जो सुबह की हँसी में थी। इसमें सिर्फ़ डर था। सादा, बिना मिलावट का डर। "जो आदमी कहे कि आ जा, बात कर लेंगे, वो अक्सर बात नहीं करता। वो सिर्फ़ देखता है कि तू कितना डरता है। और अगर तू एक बार डरकर गया, तो फिर हर बार डरकर जाएगा।"

"तो मैं नहीं जाऊँ?"

चाचा ने मेरी तरफ़ देखा। बहुत देर तक देखा। फिर बोले, "मैं नहीं कह सकता कि तू क्या कर। मैं सिर्फ़ इतना कह सकता हूँ कि मैं तेरी उम्र में उस कमरे में गया था। और मैं आज भी वहीं खड़ा हूँ।"

वो उतर गए।

मैं चारपाई पर बैठा रहा, चाय ठंडी होती रही और मेरी घड़ी पाँच मिनट आगे भागती रही।

मैंने सोचा — दस बजे मुझे उस कमरे में जाना है। पर उस कमरे में जाने से पहले मुझे एक चीज़ पता होनी चाहिए।

एक ट्रक कितने का होता है।

क्योंकि अगर वहाँ बात पैसे की होगी — और ऐसी जगहों पर बात हमेशा पैसे की होती है — तो मुझे कम से कम इतना तो पता होना चाहिए कि मेरे चार सौ किस दीवार से टकराएँगे।

मैंने चाय खत्म की, रुमाल से मुँह पोंछा, और उतर गया।

गाड़ी महल।

रास्ता ट्रांसपोर्ट नगरी की पक्की सड़क से निकलता है और फिर अचानक टूट जाता है। पहले पत्थर, फिर मिट्टी, फिर धूल। इतनी धूल कि जूते का रंग पता नहीं चलता। सड़क के दोनों तरफ़ कबाड़ की दुकानें हैं — लोहे के दरवाज़े, टूटे पंखे, पुराने पहिये, बोरियों में भरे पुरज़े जिन्हें देखकर समझ नहीं आता कि ये किसी गाड़ी के हैं या किसी जहाज़ के।

और फिर आती है वो महक।

लोहे की। जंग की। जले हुए तेल की। पुराने टायर की, जिसमें बरसात का पानी भरा रह जाता है और महीनों तक सड़ता है।

मैं रुका। आँखें बंद कीं।

यहाँ शोर नहीं था।

और यही सबसे अजीब बात थी।

ट्रांसपोर्ट नगरी में शोर ही शोर है — हॉर्न, इंजन, चिल्लाते हमाल, टोल की घंटी। वहाँ चुप्पी नहीं मिलती। पर यहाँ, इस कबाड़ बाज़ार में, एक अजीब सी खामोशी थी।

जो खामोशी नहीं थी।

क्योंकि मुझे सुनाई दे रहा था।

बाईं तरफ़, कोई तीस कदम दूर, एक ट्रक खड़ा था जिसका बोनट खुला था और इंजन गायब था। उसकी छत का पैनल हवा में हिल रहा था — ढक…ढक…ढक — जैसे कोई बूढ़ा आदमी सीने पर हाथ रखकर खाँस रहा हो।

दाईं तरफ़, टायरों का एक पहाड़ था। उनके बीच से हवा निकल रही थी — सूँ…सूँ…सूँ — एक पतली, लगातार सीटी, जैसे कोई सोते हुए दाँत पीस रहा हो।

और आगे, बहुत आगे, एक ऐसी आवाज़ थी जो मुझे रोक गई।

क्लिक। क्लिक। क्लिक।

धातु पर धातु। धीमी। नियमित। जैसे कोई ठंडी हो चुकी मशीन भी अपनी आदत से मजबूर होकर अपने आप को याद कर रही हो।

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