A Dark Secret – Chapter 19
"मैं चालीस साल से गाड़ी चला रहा हूँ," उसने कहा। "चालीस साल। मेरे कानों में अब भी वो आवाज़ें रहती हैं जो सड़क पर मर चुकी हैं। किसी का इंजन, किसी की ब्रेक, किसी का हॉर्न। मैंने हर आवाज़ सुनी है। पर उस दिन, उस भीड़ में, मैंने जो देखा, वो मैंने कभी नहीं देखा था।"
"क्या देखा?"
"तू खड़ा था," उसने कहा। "और भीड़ शोर कर रही थी। पुलिस चिल्ला रही थी। लोग रो रहे थे। और तू — तू अपनी आँखें बंद किए हुए अपना सिर उठाए खड़ा था, जैसे कोई दुआ नहीं कर रहा, बस सुन रहा है। मैंने उस दिन सोचा, ये लड़का पागल है। फिर मैंने सोचा, नहीं, ये लड़का वो सुन रहा है जो हम सब बंद कर चुके हैं।"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए। पर मैंने चेहरे पर कुछ नहीं आने दिया।
"और अब?" मैंने पूछा।
बूढ़ा सीधा खड़ा हो गया। उसने अपनी बोरी कंधे पर टाँगी, और फिर वो कहा जो मैंने सुना और जो मेरे अंदर कहीं ठहर गया।
"सुन बेटा। तेरे जैसा कान वाला आदमी अगर इस शहर में रह गया, तो या तो ये शहर बदल जाएगा, या तू।"
हवा रुक गई। सड़क पर एक ट्रक गुज़रा, उसका पीछा करती धूल उठी और मेरे मुँह में आ गई। मैंने थूका। फिर मैंने पूछा।
"तीसरा क्या है, भाई?"
बूढ़े ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ था जो पहले नहीं था। पहले वहाँ सिर्फ़ थकान थी। अब वहाँ कुछ और था, कुछ ऐसा जो वो बोलना चाहता था और बोल नहीं सकता था।
उसने अपना मुँह खोला। फिर बंद कर दिया।
फिर उसने अपनी जेब से पान निकाला, होंठों के नीचे रखा, और मुड़कर चल दिया।
"भाई!" मैंने पीछे से आवाज़ दी। "तीसरा क्या है?"
वो रुका। पर मुड़ा नहीं।
"तीसरा वही है जो मैं चालीस साल से देख रहा हूँ," उसने कहा, बिना मुड़े। "और जिसका नाम लेने की हिम्मत मुझमें नहीं।"
और फिर वो चला गया। धूल में। उसकी चाल में वो धीमापन था जो सिर्फ़ उन लोगों में होता है जिन्होंने बहुत कुछ देखा है और बहुत कुछ नहीं बोला।
मैं वहीं खड़ा रहा।
दूर, टोल के पार, मोती पड़ा था। हवा चल रही थी, और उसका टूटा पैनल फिर बोल रहा था — चीं…चीं…चीं।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। दो रुमाल। दोनों तेल में डूबे। एक में दो कटे तार, एक में कुछ और।
और मेरी घड़ी में अभी भी पाँच मिनट बाकी थे। जो हमेशा आगे रहते हैं।
मैंने एक गहरी साँस ली और सड़क की तरफ़ चल पड़ा। सोचते हुए कि दस बजे मुझे उस कमरे में जाना है, जहाँ से लोग अपनी गाड़ी लेकर बाहर नहीं आते। और ये भी सोचते हुए कि अगर शहर बदलना है, तो पहले उसको सुनना पड़ेगा। और अगर मुझे बदलना है, तो पहले उस कमरे में जाना पड़ेगा।
दोनों में से कोई एक बात सच होगी।
पर आज नहीं। आज बस सुनना है।
और मोती अभी भी वहीं पड़ा था, बोल रहा था, चीं…चीं…चीं, जैसे किसी का नाम याद कर रहा हो और नाम जुबान पर न आ रहा हो।
॥
सुबह की पहली किरण टीन की छत पर आकर गिरी और मेरी आँख खुल गई।
कमरे में वो तेल की महक अब भी थी। या शायद वो मेरे हाथों से आ रही थी। मैंने अपनी उँगलियाँ देखीं। काली लकीरें अब भी वहीं थीं। साबुन से नहीं जातीं, ये बात तो अब तय हो चुकी है। ठीक है। रहने दो। जो चीज़ अपने आप नहीं जाती, वो शायद किसी काम की ही होती है।
कमरे में एक चारपाई थी जिसकी रस्सियाँ ढीली थीं, एक अलमारी थी जिसका एक पल्ला टूटा हुआ था और जो खुलने पर ऐसी आवाज़ करती थी जैसे किसी बूढ़े के घुटने चटक रहे हों। और एक बल्ब था जो हर दो मिनट में झपकता था, जैसे खुद भी सो रहा हो।
मैं चारपाई पर बैठ गया और जेब में हाथ डाला।
दो नोट निकले। दोनों दो-दो सौ के। पहला नोट पुराना था, कोनों से मुड़ा हुआ, जैसे उसने भी मुझसे ज़्यादा सफ़र किए हों। दूसरा नया था। कड़ा, चिकना, जिसे छूकर लगा कि ये अभी-अभी छपकर आया है और अभी ये समझ ही नहीं पाया कि वो किसके हाथ में आ गया है।
मैंने पहला नोट चारपाई पर रखा।
एक।
फिर दूसरा।
दो।
दो नोट, दो-दो सौ के। यानी चार सौ। मैंने एक बार फिर गिना, क्योंकि जेब से निकली चीज़ पर मुझे कभी भरोसा नहीं होता। कल दिन भर की मज़दूरी — मरून ट्रक की हवा, ढीली क्लिप, आधा खुला नट, क्लच, रेडिएटर और वो ट्रैक्टर जिसके बारे में मुझे आज तक समझ नहीं आया कि वो चलता कैसे था। चाचा ने दोपहर में मेरी हथेली पर रखकर कहा था — कम है, पर शुरुआत है।
चार सौ। शुरुआत।
फिर मैंने दूसरी जेब में हाथ डाला।
वहाँ रुमाल में बँधी एक गाँठ थी। मैंने उसे धीरे से खोला, जैसे कोई डिबिया खोल रहा हो जिसमें कोई चीज़ टूटने के डर से रखी गई हो। पाँच नोट। सौ-सौ के। पाँच सौ।
माँ के दिए हुए।
सिमरिया से चलते वक़्त, स्टेशन पर, उन्होंने ये नोट मेरी जेब में ठूँसे थे और मेरा हाथ पकड़कर कहा था — "रख ले। काम आएँगे।"
मैंने उन्हें अपने चार सौ से अलग रखा। दोनों ढेरों के बीच मैंने अपनी उँगली रखी, जैसे सरहद खींच दी हो। चार सौ मेरे थे। पाँच सौ माँ के थे। और जो माँ का है, वो मेरा नहीं होता, चाहे मैं उसका बेटा हूँ।
इसीलिए ये पाँच सौ मैंने आज तक नहीं खोले। दो महीने से यही गाँठ मेरी जेब में घूम रही थी, और हर बार जेब में हाथ डालते वक़्त मुझे लगता कि माँ का हाथ अब भी मेरी जेब में है।
और अलमारी के उस टूटे पल्ले के पीछे, एक और रुमाल में लपेटकर, दो हज़ार रुपये रखे थे। चाचा के दिए हुए।
वो मैंने कभी गिने नहीं। क्योंकि गिनने का मतलब होता है अपना मान लेना। और वो मेरे नहीं थे। उस पैसे के साथ चाचा की एक आवाज़ जुड़ी हुई थी, जिसे मैं सुनते ही पहचान जाता था — हर बार वो चीज़ माँगते वक़्त, हर बार वो पैसा देते वक़्त, चाचा की आवाज़ में एक हल्की चीनी घुल जाती थी। "भईया, तेरे पापा ने मेरे लिए क्या किया, वो मैं जानता हूँ।"
मुझे नहीं पता कि पापा ने चाचा के लिए क्या किया था। पर मुझे ये पता था कि चाचा जब भी ये वाक्य बोलते थे, अपनी गर्दन के पीछे हाथ फेरते थे। और मैंने ये भी देखा था कि जब भी चाचा गर्दन के पीछे हाथ फेरते थे, उसके ठीक पहले या ठीक बाद कोई झूठ बोल चुके होते थे।
खैर।
मैं उठा, मुँह धोया, और उसी पानी से अपने हाथ भी रगड़े, जिससे कम से कम उँगलियों की काली लकीरें हल्की पड़ जाएँ। नहीं पड़ीं।
तभी मोबाइल बजा।
स्क्रीन पर "अम्मा" लिखा था। मैंने फ़ोन उठाया और कान पर रखा।
"हाँ अम्मा।"
"खाना खाया?"
पहला सवाल हमेशा यही होता है। दो महीने से यही सवाल है। मुझे लगता है अगर मैं कभी कह दूँ कि हाँ अम्मा खाया, तो उनके पास पूछने को कुछ नहीं बचेगा और वो फ़ोन रख देंगी।
"खाया।"
"क्या खाया?"
"रोटी।"
"कितनी?"
"अम्मा।"
"कितनी?"
"तीन।"
वो चुप हुईं। फिर बोलीं, "तीन कम हैं। तू दुबला हो रहा है। मुझे पता है तू क्या कर रहा है। तू वहाँ ज़मीन पर सोता है न?"
"चारपाई पर सोता हूँ, अम्मा।"
"झूठ मत बोल।"
मैं हँस पड़ा। और मेरी हँसी सुनकर वो भी हँस पड़ीं, और उनकी हँसी में वो सब था जो वो कभी नहीं कहतीं।
फिर एक खामोशी आई। फिर वो बोलीं, "जो पाँच सौ दिए थे, खर्च मत करना।"
"क्यों?"
"वो तेरे लौटने के लिए हैं।"
मेरे हाथ रुक गए।
"अम्मा—"
"सुन। मैं नहीं कहती कि तू हार गया। मैं ये भी नहीं कहती कि तू वापस आ जा। मैं सिर्फ़ इतना कहती हूँ कि जिस दिन मन करे, उस दिन जेब में टिकट के पैसे हों। किसी का मुँह देखने की ज़रूरत न पड़े। समझा?"
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