A Dark Secret18 / 536

A Dark Secret – Chapter 18

7 min read November 6, 2026

मैंने हाथ बढ़ाया। उँगली उस पाइप पर रखी जो इंजन से मैनिफ़ोल्ड तक जाता था। वहाँ एक क्लिप ढीली थी। और उसके ऊपर, बहुत पास, एक नट आधा खुला था।

मैंने औज़ार उठाया। दो मिनट लगे। क्लिप कसी, नट कसा, और उसके बाद मैंने उस पतली पत्ती वाली जगह पर हथौड़े का पिछला हिस्सा टिकाकर हल्का सा ठोका, क्योंकि वहाँ का मेटल पुराना था और उसको बैठना पड़ता था।

इंजन की आवाज़ बदली।

खाँसी रह गई थी, पर वो अब खाँसी नहीं थी। अब वो बस एक पुरानी साँस थी, जो जानती थी कि उसे ठीक होना है, और कोशिश कर रही थी।

ड्राइवर ने कटोरा नीचे रख दिया।

"अरे," बोला। "ये क्या किया तूने?"

"कुछ नहीं," मैंने कहा। "क्लिप ढीली थी। हवा बाहर जा रही थी। नट खुला था। बस।"

उसने इंजन की आवाज़ सुनी। फिर अपना सिर हिलाया।

"भई, ये खाँसी तो अब भी है। पर पहले जैसी नहीं।"

मैंने कपड़े से हाथ पोंछे।

"गाड़ी भी इंसान है जी," मैंने कहा। "उसको भी कभी-कभी सिर्फ़ सुनने वाला चाहिए। कोई ठीक करने वाला नहीं। बस सुनने वाला।"

ड्राइवर हँसा। बड़ी हँसी। पान का रस उसके होंठों पर फैल गया।

"महेंद्र भाई," वो चाचा की तरफ़ मुड़ा, "ये तेरा भतीजा है? कहाँ से लाया?"

चाचा मुस्कुराए। पर उनकी मुस्कान में वो झिझक साफ़ थी। जैसे कोई अपने ही घर में मेहमान की तारीफ़ सुनकर शर्मिंदा हो — ख़ुश भी हो और डरा भी।

"भतीजा है," बोले। "भाई का बेटा।"

"अच्छा कान है इसका," ड्राइवर ने कहा। "मैं तो साल भर से इस गाड़ी को ठीक करवा रहा हूँ। हर बार पैसा लगता है, हर बार खाँसी लौट आती है। और ये दो मिनट में।"

"दो मिनट नहीं," मैंने कहा। "तीन मिनट लगे थे। मैंने गिना था।"

वो फिर हँसा। और इस बार चाचा भी हँसे। पर चाचा की हँसी में कुछ ऐसा था जो मुझे चुभा। जैसे कोई कह रहा हो, बेटा, तू ज़्यादा तेज़ है। तेज़ लोग इस शहर में ज़्यादा दिन नहीं चलते।

दोपहर तक मैंने तीन गाड़ियाँ देखीं। एक ट्रक का क्लच, एक जीप का रेडिएटर, और एक ट्रैक्टर जिसका पिछला पहिया ऐसे घूम रहा था जैसे किसी को नींद में चलना सिखाया गया हो।

काम करते वक़्त मैं कुछ नहीं सोचता। बस हाथ चलते हैं और कान खुले रहते हैं। यही मेरा तरीका है। पापा कहते थे, बेटा, गाड़ी से बात करनी हो तो पहले अपनी बात बंद कर। आदमी जब बोलता रहता है, तब गाड़ी चुप हो जाती है।

दोपहर में चाचा ने मुझे बुलाया। उन्होंने मेरी हथेली पर पैसे रखे। दो नोट। और एक चाय का कटोरा, जो उन्होंने खुद लाकर दिया, जैसे कोई बड़ा इनाम दे रहे हों।

"आज का," बोले। "कम है, पर शुरुआत है।"

मैंने पैसे जेब में रखे। चाय पी।

फिर उन्होंने अपनी जेब से कुछ निकाला। एक रुमाल। पुराना। तेल में डूबा हुआ। रंग पहले कभी सफ़ेद रहा होगा, अब वो कुछ और था — और उस पर कुछ ऐसा था जो रुमाल नहीं था। कोई ज़ंग का धब्बा, कोई तेल की लकीर।

"ये फेंक दे," चाचा ने कहा। "पुराना है। पिछले हफ़्ते से पड़ा है।"

मैंने रुमाल लिया। हाथ में लिया तो मेरी उँगली काँपी। मैंने चाचा की तरफ़ देखा, पर वो मेरी तरफ़ नहीं देख रहे थे। वो औज़ारों की तरफ़ देख रहे थे, जैसे वहाँ कोई बहुत ज़रूरी काम पड़ा हो।

ये वही रुमाल था। या इसका जुड़वाँ। रंग वही, तेल वही, और किनारे पर वही ज़ंग की लकीर।

कल रात उनके औज़ार बैग में भी यही रुमाल था। और अब ये जेब से निकलकर मेरे हाथ में आया है, और कहा जा रहा है कि इसे फेंक दो।

मैंने उसे फेंका नहीं। मैंने उसे अपनी जेब में रख लिया। उसी जेब में जहाँ कटे तारों का रुमाल था। अब दो रुमाल थे। दोनों तेल में डूबे। दोनों एक जैसे।

चाचा ने मेरी जेब की तरफ़ देखा। बस एक पल। फिर नज़र फेर ली। और उस एक पल में मुझे लगा कि उन्होंने देख लिया। पर उन्होंने कुछ नहीं कहा।

"तिवारी से कुछ कहा?" उन्होंने अचानक पूछा।

"नहीं," मैंने कहा।

"अच्छा किया। उनसे दूर रह। वो आदमी काग़ज़ का है। जिसको जहाँ रखे, वहीं रहता है।"

"और कालू?"

चाचा का चेहरा बदला। "कालू से भी दूर रह। वो तेरे पापा का जानने वाला नहीं है। वो किसी का जानने वाला नहीं है। वो बस काम करता है।"

"किसका काम?"

"जो कहता है, उसका।"

मैंने चाय ख़त्म की। कटोरा नीचे रखा। फिर मैंने वो बात कही जो सुबह से मेरे सिर में घूम रही थी।

"चाचा, मुझे आज दस बजे बाईस नंबर टोल के पीछे जाना है। गोदाम के पीछे वाले कमरे में। बुलाया है।"

चाचा ने औज़ार रखा। धीरे से। बहुत धीरे से। फिर वो मेरी तरफ़ मुड़े और उनका चेहरा वैसा था जैसा मैंने कभी नहीं देखा — जैसे किसी ने उनके सामने ही किसी की मौत की ख़बर सुना दी हो।

"मत जा," बोले।

"बुलाया है।"

"मैं कहता हूँ मत जा।"

"क्यों?"

वो चुप रहे। उन्होंने गर्दन के पीछे हाथ फेरा। वही हरकत। जो वो हमेशा करते हैं जब झूठ बोलने वाले होते हैं। पर इस बार उन्होंने झूठ नहीं बोला। इस बार उन्होंने कुछ नहीं बोला।

और चुप्पी झूठ से भी बड़ी चीज़ होती है।

"अर्जुन," वो बोले, और उनकी आवाज़ धीमी थी, "मैंने तेरे पापा को वचन दिया था। उस रात। उनके जाने से पहले। मैंने कहा था, रघुवीर, तेरा बेटा मेरा बेटा है। और जब तक मैं ज़िंदा हूँ, उसको उस रास्ते पर नहीं जाने दूँगा जिस पर तू गया।"

गैराज में सन्नाटा था। बाहर किसी ट्रक ने हॉर्न बजाया, और वो आवाज़ दीवार से टकराकर अंदर आई और फिर मर गई।

"आपने वचन दिया था," मैंने कहा। "पर वो रास्ता कौन सा है, ये आपने नहीं बताया।"

चाचा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें गीली थीं। पर वो रोए नहीं। उन्होंने बस अपना हाथ उठाया और मेरे कंधे पर रखा, और उस हाथ में इतना वज़न था कि मुझे लगा मैं धरती में धँस रहा हूँ।

"जब तेरे पापा उस रात घर से निकले थे," वो बोले, "तो उनके हाथ में एक रजिस्टर था। और उन्होंने मुझसे कहा था — महेंद्र, अगर मैं लौटकर न आऊँ, तो उस रजिस्टर को मत ढूँढना। उसको जलने देना।"

मेरा गला सूख गया।

"और आपने?"

"मैंने कुछ नहीं किया," वो बोले। "न ढूँढा, न जलाया। बस बैठ गया। दस साल से बैठा हूँ।"

वो हाथ मेरे कंधे से उतर गया।

"अब जा," बोले। "काम कर। मैं यहीं हूँ।"

मैं बाहर आया। धूप सिर पर पड़ी तो लगा जैसे सारा पानी शरीर से उड़ गया। गैराज के बाहर सड़क थी, और सड़क पर धूल, और धूल में ट्रकों के पहियों के निशान, जो हवा से मिट रहे थे।

मैंने अपनी कलाई पर पापा की घड़ी देखी। पाँच मिनट आगे थी। जैसे वो अब भी मुझसे कह रही हो, चल, देर मत कर।

मैं कुछ कदम चला ही था कि एक आवाज़ आई।

"बेटा।"

मैं रुका।

एक बूढ़ा आदमी सामने खड़ा था। सत्तर के आसपास। सफ़ेद दाढ़ी, जो पूरी नहीं, बस ठुड्डी पर जमा थी। घुटनों में दर्द साफ़ दिख रहा था, क्योंकि वो एक पैर पर सारा वज़न डालकर खड़ा था और दूसरा पैर आगे रखा था। हाथ में एक बोरी थी जिसमें कुछ धातु की चीज़ें खनक रही थीं।

"हाँ भाई," मैंने कहा। "बोलिए।"

वो मेरे पास आया। चारों तरफ़ देखा। पहले बाईं तरफ़, फिर दाईं तरफ़, फिर पीछे। जैसे कोई ऐसा आदमी हो जिसको आदत हो कि हर बात से पहले ये देख ले कि कोई सुन नहीं रहा।

"तू वो है ना," उसने कहा, "जो उस दिन भीड़ में खड़ा था? ट्रक वाले दिन?"

मैंने उसकी तरफ़ ठीक से देखा।

"हाँ भाई," मैंने कहा। "मैं वही हूँ। जिसको कोई नहीं पूछता।"

वो हँसा। सूखी हँसी। फिर वो मेरे और पास आया और उसकी आवाज़ इतनी धीमी हो गई कि मुझे सुनने के लिए झुकना पड़ा।

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